सांसों का हिसाब
सांसों का हिसाब
शीर्षक: तरक्की की लाश और खोती सांसें दिल्ली की एक शाम, जब आसमान पर सूरज नहीं, धुएं की एक काली चादर बिछी थी। गाड़ियों का शोर ऐसा था कि कान फट जाएं और हवा में घुटन इतनी कि सांस लेना एक जंग जैसा लगे। आर्यन और रिया एक पुरानी, अधूरी इमारत की छत पर खड़े थे, जहाँ से यह शहर किसी जलती हुई भट्टी जैसा लग रहा था। रिया ने खाँसते हुए अपनी रुमाल से नाक ढंकी, उसकी आँखों में जलन और बेबसी साफ दिख रही थी। "आर्यन, ये क्या हाल हो गया है? साँस लेना भी अब एक बड़ी कीमत मांग रहा है। देखो, इन बड़ी इमारतों और चमकती गाड़ियों को, ये तरक्की की निशानी नहीं, ये हमारी मौत का सामान है जो हमने खुद तैयार किया है।" आर्यन ने एक गहरी सांस ली, पर उसके फेफड़ों में सिर्फ ज़हर की कड़वाहट महसूस हुई। उसका दिल भर आया। उसने कड़वाहट और दर्द से भरी आवाज़ में कहा, "रिया, याद है 2001 से पहले का वो वक्त? तब लोगों के पास आज जैसी बड़ी गाड़ियाँ और AC नहीं थे, पर उनके जिस्म लोहे के बने थे। वे कोसों पैदल चलते थे, पसीना बहाते थे और बीमारियां उनके पास फटकती तक नहीं थीं। आज देखो, इंसान के पास सब कुछ है, पर पल्ले कुछ नहीं बचा। किसी को बुखार घेरे रहता है, तो किसी को ऐसी बीमारियां जिनका नाम तक पहले कभी सुना नहीं था। हमने अपनी सेहत और सुकून को इन मशीनों के आगे कुर्बान कर दिया है।" रिया ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में आंसू थे। "तो क्या ये टेक्नोलॉजी हमारे दुखों का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है?" आर्यन ने रिया का हाथ थाम लिया, उसका हाथ ठंडा था। "टेक्नोलॉजी बढ़िया है रिया, पर इसने हमें आलसी और कुदरत का दुश्मन बना दिया है। हमने तरक्की के नाम पर हज़ारों साल पुराने पेड़ काट दिए, फैक्ट्रियों से ज़हर उगला और अब कंक्रीट के इन डिब्बों में बैठकर ऑक्सीजन ढूंढ रहे हैं। पहले का आदमी सादा था पर मज़बूत था, आज का आदमी मशीनों के बीच घिरा है पर अंदर से पूरी तरह खोखला हो चुका है। तरक्की वो नहीं जो हमें बीमार कर दे, तरक्की वो थी जो हमारे बुजुर्गों के पास थी—साफ हवा, मज़बूत जिस्म और लंबी उम्र।" आर्यन की आवाज़ भारी हो गई, जैसे कोई बड़ी चेतावनी दे रहा हो, "अगर अब भी हमने आवाजाही कम नहीं की और पेड़ों को वापस नहीं लाए, तो आने वाला वक्त और भी खौफनाक होगा। इंसान सड़कों पर बेमौत मरेगा और कुदरत खामोशी से अपना हिसाब पूरा करेगी।" रिया खामोश थी, पर उसकी आँखों में वो दर्द और खौफ साफ़ दिख रहा था जो आर्यन ने महसूस किया था। उसे समझ आ गया था कि तरक्की की इस चमक ने इंसान को अंधा कर दिया है और अब हम अपनी ही तबाही की तरफ दौड़ रहे हैं। सुखविंदर की कलम से: "तरक्की के शोर में अपनी जड़ों को न भूलें। मशीनों की गुलामी छोड़ें और कुदरत से नाता जोड़ें, क्योंकि असली दौलत आपकी सेहत है, गाड़ी या बंगला नहीं।" नेक्स्ट
