Medharthi Sharma

Abstract


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साक्षात देवता

साक्षात देवता

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मेरे जीवन में एक घटना में मुझे साक्षात देवता के दर्शन हो गए। बात उस समय की है जब मेरा एक मात्र बेटा डेंगू से पीड़ित था। 

मेरे बेट को बुखार हुआ था। डॉक्टर ने टैस्ट करवाया। सब ठीक था। लेकिन जब दोबारा टैस्ट कराया तो प्लेटलेट काउंट 75000 हो गयीं। तब डॉक्टर ने डेंगू बता दिया और किसी और हॉस्पिटल में एडमिट कराने को कह दिया।

थोड़ा डर तो लगा लेकिन घबराने वाली बात नहीं थी। मेरे बॉस को पता चला तो उन्होंने अपन कार भेज दी और बोला कि जहाँ भी जाना चाहो ले जा सकते हो। लेकिन मेरी सैलरी जो बिना माँगे मिल जाती थी, बकाया थी, नहीं भेजी। बुरा तो लगा लेकिन मैंने भी ये सोचकर नहीं माँगी कि जरूरत पड़ने पर माँग लूँगा।

भरतपुर लेकर गए वहाँ डॉक्टर ने टैस्ट कराया और तुरन्त जयपुर या आगरा ले जाने की सलाह दी।

जयपुर एस एम एस में पता किया कोई बेड खाली नहीं था। हम आगरा ले गए। 

जब उसकी प्लेटलेट्स काउंट तेजी से गिर रही थी। प्लेटलेट काउंट 20000 रह गयी थी। चूंकि बेटे को भयावहता का ज्ञान नहीं था उसे देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वह बीमार है। लेकिन मुझे उसका मतलब पता था। ड्यूटी पर उपस्थित दूसरे डॉक्टर ने उसका मतलब बता दिया था। मुझे दुनिया उजड़ती नजर आ रह थी।

डॉक्टर ने एक दवा लिखी जिसकी कीमत 10000 थी। यही समस्या थी। पैसे थे नहीं। जो थे वो खर्च हो चुके थे। मेडिकल वाला उधार नहीं देना चाहता था। दो महीने की तनख्वाह रुकी हुई थी। मालिकों ने किसी भी हॉस्पिटल में लेजाने के लिए कार तो भेज दी थी। लेकिन पैसे नही भेजे थे और पूछा भी नहीं कि पैसे की जरूरत है या नहीं। कारण कुछ भी रहा हो मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहींं की।

ऐसा नहीं था कि पैसे का इंतजाम नहीं हो सकता था। अपने फंड्स को इकट्ठा करने में समय लगता। उस समय तुरंत कोई व्यवस्था नहीं थी। किससे माँगूँ। सभी से तो पूछ चुका था। सबकी कोई न कोई मजबूरी थी। पत्नी खुद मुझपर आश्रित थी।

अपने सभी हमारे हाथ फैलाने का इंतजार कर रहे थे। ATM से 8000 रुपये निकल सकते थे क्योंकि थे ही उतने।

अभी मैं हाथ फैलाने का फैसला करने ही वाला था कि काले सूट में वो देवता आ गया जिसकी मुझे आने की उम्मीद न थी।

उसने आते ही हाल चाल पूछा। मैं क्या बताता। जो बताना था आंसुओं के रूप में बह निकला। फिर उन्होंने पूछा कोई परेशानी है ?

मैं कैसे कहता पैसे नहीं हैं। मैंने नहीं में सिर हिला दिया।

फिर किस लिए रोते हो ? उन्होंने कई बार पूछा कोई परेशानी ?

लेकिन आत्मसम्मान आड़े आ रहा था। मैं रो रहा था और न में सिर हिला रहा था। जबकि मुझे पैसे की सख्त जरुरत थी। लेकिन उनसे मिलने की उम्मीद न थी। जब अपनों ने बहाने बना दिए तो उनसे क्या कहता।

लेकिन उस देवता को तो खुद ईश्वर ने भेजा था। शायद ईश्वर ने उनको पहले ही बता दिया था कि मुझे 10000 रुपये की जरूरत है।

उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं जानता हूँ तुम नहीं कहोगे। मेरे पास अभी दस हजार रुपये पड़े हैं। ये लो दस हजार रुपये काम चलाओ और जरूरत हो तो बता देना।'

मुझे यकीन नही हो रहा था। जी चाह रहा था कदमों में गिर जाऊं। लेकिन यह न उन्हें अच्छा लगता और न ही मैं कर पाता।

लेकिन दोपहर तक ब्लड रिपोर्ट आई जिसमें प्लेटलेट काउंट बढ़ने लगीं।

वो दस हजार रुपए बच गए जो अस्पताल का हिसाब करने में काम आ गए।

वो देवता थे फर्म में मेरे सीनियर रह चुके मि. संतोष सक्सेना। जो वहां से जॉब छोड़ चुके थे। परन्तु सम्बन्ध कायम थे।


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