Medharthi Sharma

Drama


4.7  

Medharthi Sharma

Drama


बहू की विदा

बहू की विदा

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एक दिन मैं सुबह धूप में अखबार पढ़ रहा था। 

पत्नी चाय देकर वापस मुड़ी तो डोरबेल बज गयी।

पत्नी ने दरवाजा खोला। उसकी बहन यानी हमारी छोटी साली आयी थी। 

दीदी को नमस्ते किया तो मुझपर नजर पड़ गयी। 

सीधी भागकर आयी और मेरे गले में बाहें डाल दी। जीजाजी, क्या कमाल लिखते हैं आप। मेरी सारी सहेलियां आपकी फैन हैं।

दरअसल मेरी एक कहानी को पुरस्कार मिला था। मुझसे ज्यादा वो खुश थी।

पत्नी दो चाय और ले आयी। मैंने उससे कहा अच्छा अब बैठो चाय पियो।

चाय पीते हुए पूछने लगी, 'जीजाजी, मैंने जो कहानी पूरी करने को दी थी पूरी कर दी ?'

कर दी भाई कर दी। पहले चाय पियो। अभी आयी हो फ्रेश हो लो।

दरअसल उसने एक दृश्य लिखकर दिया था और वो चाहती थी कि मैं उसके आगे की कहानी लिखूं।


दृश्य कुछ इस तरह था।

एक पिता अपनी बेटी को विदा कर रहा है।

बेटी से लिपटकर रोने के बाद सम्पन्न समधी जी की ओर हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है।

कहता है,"समधीजी, मेरी बेटी को सुख न दे सको तो थोड़ा जहर दे देना। वो दुख नहीं सह पाएगी।"

समधीजी अकड़कर कहते हैं, "हाँ ठीक है। लेकिन मेरी बात याद रखना।"

"जी हुजूर", यह कहकर बाप समधीजी के कदमों में गिर जाता है। लेकिन तब तक समधीजी कार में बैठकर चले जाते हैं।


इसके आगे कहानी मुझे लिखनी थी।

नाश्ता वगैरह करके हम बैठे थे। मैंने वो कहानी उसे दी।

पत्नी ने कहा जोर से पढ़ो मैं भी तो सुनूँ।

उसने पढ़ना शुरू किया।



पहले मैंने साभी पात्रों को नाम दिए।

बेटी का पिता : दीनानाथ

बेटी का ससुर: द्वारका प्रसाद

बेटी: लक्ष्मी

दामाद (लक्ष्मी का पति): रमेश


बेटी का पिता उठ नहीं पता। इस सदमे में उसे दिल का दौरा पड़ जाता है कि समधीजी की माँग कैसे पूरी करूंगा।

उसे अस्पताल पहुंचा दिया जाता है।


उधर द्वारका प्रसाद अपने घर में अपना फरमान सबको सुना देते हैं कि जब तक वो दीनानाथ 10 लाख का इंतजाम न कर दे बहू कहीं नहीं जायेगी।

कोई उनका विरोध नहीं कर सकता। बेटा रमेश पढ़ा लिखा समझदार है। लेकिन पिता तो पिता हैं। पिता के विरुद्ध कैसे जाए ?


उधर सभी परेशान हैं कैसे बेटी को खबर पहुंचाएं।

किसी में हिम्मत नहीं है बेटी के ससुर द्वारका प्रसाद से बात करने की।

जैसे तैसे भाई उनको फोन करता है और बताता है कि पिताजी को दिल का दौरा पड़ा है। दूसरी तरफ से दहाड़ सुनाई देती है मुझे पता था बुड्ढा ऐसा ही कुछ नाटक करेगा। और हाँ अपनी बहन को कुछ भी बताया तो हमेशा के लिए तुम्हारे पास भेज दूँगा। चलो रखो फ़ोन।

भाई को कुछ नही सूझता आखिरी उम्मीद बाकी है उसका बहनोई रमेश।

वो उसे फ़ोन करता है और सब कुछ बता देता है। उसका बहनोई उसे कहता है तुम घबराओ मत ईश्वर पर भरोसा रखो सब ठीक हो जाएगा।

डॉक्टर रमेश का परिचित है। वह उनके इलाज की पूरी व्यवस्था कर देता है। लेकिन अपनी पत्नी को कुछ न बताने की सलाह दे देता है। भाई बुझे दिल से संतुष्ट हो जाता है।


दो दिन बाद रमेश पिता से बात करने की हिम्मत जुटाता है और कहता है पिताजी, लक्ष्मी के पिता हस्पताल में हैं उसे भेज दीजिये। लेकिन पिता गरजते हैं नालायक मैंने तेरी पढ़ाई पर इतना खर्च किया वो कौन चुकाएगा ?

पिताजी, मैं दे दूँगा आपकी पाई पाई।

इतना सुनते ही द्वारका प्रसाद आपे से बाहर हो गए। बेटे पर हाथ उठाया, "नालायक।" लेकिन संतुलन बिगड़ जाने के कारण धड़ाम से जमीन पर गिर गए।



सभी दौड़े दौड़े इकट्ठा हो गए। किसी में हिम्मत नहीं थी कि उनको उठा सके। सास तो खुद उठ जाए यही काफी था।

उनका दर्द बहू से न देखा गया। उसने पति से कहा कि ऑटो लेकर आये। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसकर ससुर को उठने में मदद करने को चली।

सास दहाड़ी बहू, तुम्हें शर्म है या नहीं। ये ससुर है तुम्हारे।

बहू ने जवाब दिया। माँ जी, मेरे पिताजी ने कहा था कि अब ये ही पिता हैं मेरे। और आपको जो कहना हो बाद में कह लेना अभी पिताजी को इलाज की जरूरत है। सास अवाक मुंह ताकती रह गयी।


बहू ने ससुर को सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया। तब तक बेटा ऑटो ले आया। दोनों ने मिलकर पिता को ऑटो में बिठाया

लक्ष्मी ने अपने पति से कहा कि वो हॉस्पिटल पहुंचे और इलाज की व्यवस्था करे। खुद ससुर को सहारा देकर ऑटो में बैठ गयी। और हिम्मत बढ़ाती रही। पिताजी घबराइए नहीं हम हैं न सब ठीक हो जाएगा।

ससुर ने कहा बहू तुम जो कर रही हो ठीक नहीं है। लोग क्या कहेंगे ?

लक्ष्मी ने कहा,"पिताजी लोग कुछ नहीं कहेंगे। आप परेशान न हों। आप को जो कहना हो ठीक होने के बाद कह लेना। अभी आपका इलाज जरूरी है।"


हॉस्पिटल पहुंचकर डॉक्टर ने प्राइवेट वार्ड में भर्ती कर लिया। इलाज शुरू हो गया। दर्द महसूस न हो इसलिए नींद की दवा दे दी गयी।

चार दिन बहू ने नर्स बनकर सेवा की। हर समय ससुर के पास उपस्थित रही। खुद अपने हाथों से पानी पिलाया, दवा दी। जब वो पूछती पिताजी दर्द तो नहीं है। ससुर साहब दर्द भूल जाते। सास तो थोड़ी देर को आती और हाल चाल पूछकर वापस चली जाती। शाम को उसका पति रमेश भी काम से लौट आता और उसका साथ देता। चार पांच दिनों में बेटे और बहू की सेवा से ठीक हो गए हड्डी नहीं टूटी थी। सिर्फ मांस फट गया था।


एक हफ्ते में घर ले आये गए।

सारे रिश्तेदार बहू की तारीफ करते नही थक रहे थे। सभी कह रहे थे बहू नहीं है बेटी है। ऐसी बहू सबको मिले। देखो कितनी हिम्मत से काम लिया है। ये न होती तो क्या होता। सास ससुर मन ही मन खुश हो रहे थे।


बहू दूसरे कमरे में आंसू बहा रही थी। तभी किसी का ध्यान गया कि बहू कहाँ है ? सास उसे लेने पहुँची। बहू को रोता देख गले से लगाया, पगली अब ठीक तो हो गए।

लक्ष्मी सास के कंधे से लग कर और जोर से रोने लगी, 'माँजी।'

वह कहना चाहती थी कि उसके पिता को उसी दिन दिल का दौरा पड़ा था। वो उसी दिन से हॉस्पिटल में थे। मैं उनको देखने जाना चाहती थी।


लेकिन इन सब बातों से अनजान सास ने कहा चल बुला रहे हैं सब तुझे।

बहू ने आंसू पौंछे। सास के साथ हाल में पहुंची।


तभी लक्ष्मी के पिता आ गए बेटे का सहारा लिए।

लक्ष्मी दौड़कर पिता से लिपटकर रोने लगी। पिताजी आप ठीक तो हैं। आपको ऐसी हालत में यहां नहीं आना चाहिए था। मैं आ जाती आपसे मिलने।

लक्ष्मी के ससुर द्वारका प्रसाद का माथा ठनका, क्या ? इसको पता था ?


लक्ष्मी के पिता बोले कैसी हालात में बेटी ? मैं ठीक तो हूँ, मुझे क्या हुआ है ?

लक्ष्मी के आंसुओं का सैलाब बह निकला। पिताजी मुझे सब पता है मुझे मेरी सहेली ने सब बता दिया था कि आपको दिल का दौरा पड़ा था लेकिन ....... आगे कुछ न कह सकी।


ससुर और सास के मुँह से निकल "क्या ?"


पिता फफक कर रो पड़े। बेटी ईईईई........ आगे कुछ न कह सके।

फिर थोड़ा सँभल कर बोले समधीजी ने 10 लाख मांगे थे चैक लेकर आया हूँ जितनी चाहें रकम भर लें।



लक्ष्मी समझ न सकी इतनी रकम पिताजी ने कहाँ से जुटाई। वह कुछ पूछती तभी नजर पति पर पड़ी। वो उसे चुप रहने का इशारा कर रहा था।

लक्ष्मी सब समझ गयी कि ये सब उनका किया धरा है।


लक्ष्मी के पिता ने समधीजी की तरफ चैक बढ़ाया और बोले समधीजी अब तो मैं ले जा सकता हूँ अपनी बेटी को ?



समधीजी जी ने चेक फाड़कर फैंक दिया। बोले क्यों शर्मिंदा करते हो बंधु। आपने मुझे अनमोल हीरा दिया है। आपकी बेटी थी अब मेरी बेटी है।



लक्ष्मी का पति छलक आये खुशी के आंसुओं को छिपाने के लिए बाहर निकल गया।


पूजा की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी।

कहानी खत्म करते करते फफक कर रो पड़ी।



मैं खुद अपने आंसुओं को नहीं रोक पा रहा था।

मैं उठा दोनों को रोता छोड़कर बाहर निकल गया।



आप भी आंसुओं को रोकना मत बह जाने देना।


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