रँगों में रँग मिल जाते हैं
रँगों में रँग मिल जाते हैं
"मम्मा मम्मा देखो न निशु दी मुझे कितना रँग लगा रही हैं", 6 साल का मेरा बेटा अथर्व मेरे आँचल में छुपने की कोशिश कर रहा था और मेरी 8 साल की बिटिया निशु उसे खिलखिलाते हुए पकडने की कोशिश में थी, और मैं हाथ में छनौटा लिए हुए गुझिया छानती हुई उन पर प्यार भरा गुस्सा दिखा रही थी ।किचेन में काम करते हुए पसीने की बूँदे टपक रही थी पर आँखों में पिछला साल विराजमान था ।आज इन दोनों भाई बहन के प्यार को देखते हुए विश्वास नहीं हो पा रहा था कि कुछ समय पहले ये जानी दुश्मन थे ।
बिटिया 8 साल की हो चुकी थी और परिवार आगे बढ़ाने की चाहत थी पर बेटी को जन्म देते समय ही पता चल गया था कि परिवार बस इतना ही रह जाएगा, पर दिल में एक कसक थी समर्थ थे तो एक बेटे को गोद ले अपना परिवार पूरा कर लिया, परिवार पूरा हुआ पर नयी मुसीबतें खड़ी हो गयी ।निशु किसी तरह उसे अपनाने को तैयार नहीं थी, खाना पीना सब छोड़ दिया, रो रोकर पूरे घर को सिर पर उठा लिया, शायद ममता का बंटवारा सहन नहीं हो पा रहा था उसे, कम तो ये छूटकू महराज भी नहीं थे, दो दिन तो सहमे रहे तीसरे दिन जिद ठान दी कि मुझे वापस मेरे दोस्तों के पास जाना है ।हमारी तो हालत खराब थी दोनों के बीच पर इतने बड़े फैसलों को सही रूप देने के लिए सब्र रखना पड़ता है ।बहुत मुश्किल से दोनों को एक साथ बैठा के खाना खिलाने लगी, कहानियाँ ऐसी सुनाती जहाँ भाई बहन में प्यार हो, राखी की तस्वीरें दिखाती, घर में हर समय फूलों का तारों का, या मेरे भैया मेरे राजा जैसे गाने बजते रहते, दोनों को जोड़ने के लिए खुद बच्ची बन उनके खेल में हिस्से लेने लगी ।अथर्व अब सहज होने लगा था पर निशु को लेकर अभी भी थोड़ा डर था, पर ये शंका जल्दी दूर हो गयी जब वो स्कूल से आते ही अथर्व को खोजती, बड़ी बहन का रौब आ चुका था और अथर्व के प्रति जिम्मेदारी भी आ चुकी थी ।झगड़े तो अभी भी घर में प्रतिदिन होते थे पर दोनों भाई बहन के प्यार भरे ।
"ममा मुझे गुझिया खानी है" और मुझे दहीबड़े दोनों रंग से पुते हुए अपनी फरमाइश कर रहे थे और मैं खुशी से हैरान थी ये सोचकर कि प्यार के रंग ऐसे ही हर रंग में मिल जाते हैं ।
