रौशनी
रौशनी
मास्टर साहब की बेटी रौशनी पढ़ने में अव्वल अपनी मास्टर डिग्री की पढ़ाई पुरी कर भविष्य, के रंगीन सपने देखते हुए मन ही मन अपने को सबके सामने प्रशंसनीय और आदर्श दिखाना संकल्प कर ली थी।
समयोपरातं खूब प्रतिष्ठित चौधरी खानदान की पोतहू बन गयी।
कहा जाता है
विवाह पूर्व दुल्हा दुल्हन सहित दोनों के बपौती घर- खानदान की सिर्फ प्रशंसा ही समाज में फैलती है, और बरतुहार (मिडीयेटर )
अगर ज्यादा धुर्त टाइप का चलाक हुआ तो दोनों ही खानदान टाटा बिड़ला जैसे ही चर्चा में होते हैं फर्क सिर्फ, इनका प्रतिष्ठा अन्तराष्ट्रीय होता है।
और चर्चित दोनों परिवार की तथाकथित महिमामंडन। सिर्फ हम और आप तक या दलाल के संपर्क परिधि तक।
लेकिन असली खानदानी परिचय तो शादी के उपरान्त दो तीन साल में ही पता चल पाता है।
जो स्वतः बिना किसी प्रेरक के चर्चा में आता है।
चौधराइन बने रौशनी के अभी दो सप्ताह ही बीते थे, कि घर के नाना किस्म की जिम्मेदारीयाँ उनके हिस्से स्वतः आते गये और हर रोज नयी नयी जिम्मेदारी स्वतः ---!
सुबह के पाँच बजे उठकर जेठ के दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, स्कूल भेजना, फिर जेठ के लिए नाश्ता और टिफीन का इंतज़ाम करना।
सासु अम्मा के लिए गरम पानी, कड़क वाली चाय तथा चिकित्सकीय सलाहनुसार कुछ हल्के अलग प्रकार के नाश्ते का इंतज़ाम होना वो भी अविलम्ब।
चौधरी साहब की जमींदारी ठाठ--बाट का क्या कहना।
उपरोक्त सभी कामों के निपटारे से पूर्व ही चौधरी साहब की जमघट और उनके व्यक्तित्व अनुकूल बंगले की शान शौकत का निर्वाह करना भी तो अब रौशनी के ही जिम्मे थी, घर की नयी पोतहू जो थी और उसमें भी उसे सबकी प्रशंसा पानी थी और अपना आदर्श रूप दिखाना था।
ओह क्या सुन्दर सोच और संकल्प--!
चाय पान और हल्का लेकिन सुन्दर और स्वादिष्ट नाश्ता का निरंतर बंगले पर बखूबी पहुँचते रहना ही नयी बहु के योग्यता, सुंदरता और सद्व्यवहार का परिचायक सा बन गया था। सो यह निरंतर चलता रहता था।
संपूर्ण परिवार अपने अपने कार्यों में व्यस्त रहता था और समय की पाबंदी स्कूल कॉलेज और आँफिस सभी जगह थी इसलिए जरा सी भी विलम्ब मतलब था भविष्य के प्रति लापरवाही। काम के प्रति लापरवाही। और सबसे महत्वपूर्ण जो बातें थी वह बहु की कार्यक्षमता।
ग्यारह बजे तक चौधरी साहब (ससुर) का पूरे साज बाज लाव लस्कर के साथ निकलना तय रहता था, चौक चौराहे के लिए सो उनका पूरा इंतजामात सुन्दर सुस्वादु भोजन, कड़क आयरण युक्त पहनावा, इत्र आदि सब का व्यवस्था समय पूर्व होना ही चाहिए। भला घर और उस एरिया के नामी गिरामी चेहरा तथा भावी मुखिया भी यही तो हैं। ससुर के घर से निकलने के ठीक बाद सासु अम्मा भी तो। फ्रयाड जिरा राइस, मिक्सड फ्रायड दाल,
करैला का भरौवा, पोश्ते की चटनी, पनीर पकौड़ा, जैसे विविध व्यंजन भरे भोजन की थाल होनी ही चाहिए आखिर चौधरी खानदान की इज़्ज़त तो उस थाल में ही अब चिपक सी गयी थी। सासु अम्मा के भोजन उपरान्त बच्चे का विधालय से घर पहुँचना, पुनः उसका नाश्ता -भोजन , सासु अम्मा की सगी बहन का हर रोज आना, अपने बहन से मिलना तथा हर रोज नये अंदाज़ में गर्म जोशी से आतिथ्य स्वागत का होना। आखिर चौधरी खानदान को इज़्ज़त और शान शौकत भी तो यही सब से बनाना है।
अब दिन भर का थके हारे आँफिस की परेशानी लिये जेठ का घर आना हुआ, भूखे प्यासे को चाय नाश्ता पानी आदि, जेठानी तो आखिर जेठानी है,
बड़े घर की बेटी है, घर की बड़ी पोतहू है उनसे चूल्हा और रसोई का काम तो नहीं हो पाता है। देवर जी का कॉलेज से आना तथा भाभी से खाना की माँगा
भाभी आप बहुत अच्छी हैं, बहुत सुन्दर खाना, लेकिन कुछ ना कुछ काम आप भी तो किया कीजिए, परिवार के सभी सदस्य कुछ ना कुछ जरूर कर रहे हैं। रौशनी ने सिर्फ ' हं' में जवाब दिया, ओह हो शाम के तीन बजे तक सिर्फ बिना किसी काम के मेरा समय तो। तभी जमींदारी ठाठ बाट को कन्धे पर सम्भालते हुए दुल्हे राजा प्रकाश का भी आगमन होता है।
रौशनी चलो बहुत भूख लगी है थोड़ा गरमा गरम लेकिन जल्द, दिन भर परेशान हूँ, समय खराब होते जा रहा है जब से साक्षर भारत अभियान चला तभी से कोई किसी को नहीं गुदानता है, हर आदमी पढ़ लिख लिया, कोई कहने में अब रहता नहीं है। तथा रौशनी तुम भी खाना ले लो अपना, तुरंत। दो मिनट रूकिये, खाना का पहला कौर ही तो मुँह में डाली थी--कि पतिदेव भी बोल पड़े, रौशनी तुम भी कुछ तो किया करो कुछ ना कुछ तुझे करना चाहिए।
रौशनी फफक कर रो पड़ी। बस इतना ही बोल पायी हाँ मुझे भी कुछ करना चाहिए।
एक मास्टर की बेटी को बाप की शिक्षा-दीक्षा से ज्यादा पिताजी की इज़्ज़त और अपने आदर्शतम रूप के भावना का ज्यादा ख्याल था। सो घर की सबसे ज्यादा योग्यता धारी रौशनी आज डाइनिग हाल में सुन्दर दुधिया प्रकाश से जगमग वातावरण में रौशनी खोज रही थी और खोज रही थी जवाब अपने ह्रदय तल से...
"कुछ करना चाहिए "
