STORYMIRROR

Amitosh Sharma

Inspirational Others

4.5  

Amitosh Sharma

Inspirational Others

राम — एक पंडितों के, एक संतों के

राम — एक पंडितों के, एक संतों के

4 mins
22

एक बागेश्वर (पंडितों) वाले राम हैं, और दूसरे हमारे (संतों) के मन में बसे दास कबीर या तुलसी के राम।
दोनों की छवि अद्भुत है।

एक के पीछे दुनिया कर्मकांड के रास्ते मंदिर-मंदिर भटक रही है,
और दूसरे को पाने मैं खुद के समंदर में दिन-प्रतिदिन गहराइयों में गोते मार रहा हूँ।

मज़े दोनों के आनंदमयी हैं।
बागेश्वर वाले राम के लिए दुनिया शरीर से खुशी मनाती है, पर कबीर वाले राम के लिए सोच बनकर मैं मन से गुदगुदाता हूँ।

बागेश्वर वाले राम को पाने के लिए शरीर से तैयारी करनी पड़ती है, जैसे भगवा वस्त्र, पीला जनेऊ, माथे पर तिलक, हाथ में लोटा, गंगाजल, अगरबत्ती और फल, जुबान पर बाबा के साथ राम-राम की रट।

पर बंधुओं, दास के राम को पाने में शरीर की आहुति देकर, उसको शून्य बनाकर, केवल पवित्र सोच और मन से राम बनकर जीना पड़ता है। दिन-प्रतिदिन आपको राम की मर्यादा निभानी पड़ती है।

इसे अगर रामायण की एक कथा की झलक से समझना हो तो ऐसे समझो—
"रामायण से हम जानते हैं कि रावण सीता को पाने के लिए किस-किस हद तक गया कि पूरी लंका उजड़ गई। उसी की एक झलक देता हूँ।

एक बार रावण की पत्नी मंदोदरी से रावण की हालत देखी नहीं जा रही थी। वह पैसे से, शक्ति से, डर से, प्यार से हर कोशिश कर परेशान हो चुका था, पर पवित्र सीता उसकी तरफ नजर तक नहीं फेर रही थीं। तब वह शोक में जा चुका था।

पर ऐसी हालत अपने पति की एक पतिव्रता पत्नी कैसे देख सकती है? चाहे पति पापी ही क्यों न हो, समाज में पत्नी को तो पति धर्म निभाना ही पड़ता है।

तो वह अपने कलेजे पर पत्थर रखकर रावण से कहती है— सुनिए, मैं जैसा बोलती हूँ वैसा कीजिए, शायद सीता प्रस्ताव स्वीकार कर लें।

एकतरफा आशिकी में डूबे रावण का चेहरा मानो फिर खिल उठा, क्योंकि उम्मीद की किरण उसे मंदोदरी जैसी पवित्र प्रेमिका से मिली।

रावण बोला— जल्दी बताओ जी,
मंदोदरी बोली— रावण बनकर तो तुम सीता को नहीं पा सके, यह सिद्ध हो गया। ऐसा करो, तुम्हारे पास अद्भुत शक्ति है, तुम किसी का भी वेश बदल सकते हो, तो इस बार राम बनकर चले जाओ, वह मिल जाएँगी।

रावण के फेफड़ों में जान आ गई कि वाह भाई, क्या मस्त सुझाव है! अब तो सीता मिल गई। वह पागल होकर नाचा, मनाया खुशियाँ। था तो लंकेश पति, तो खुशियों का दुकान कैसा सजा होगा, सोचकर देखो ज़रा— मौज के नाम पर क्या-क्या किया होगा।

और आखिर वह दिन आया जब रावण को वेश बदलना था और राम बनना था, और मंदोदरी भी इस बार सामने ही थी।

तभी रावण राम बनता है— भूलना मत कि आप कहानी सुन रहे हो, तो बस कहानी का मर्म निकालना, क्यों-कैसे मत पूछना, वैसे मैं बताऊँगा नहीं क्योंकि मैं भी तो कहानी में ही हूँ।

जैसे ही रावण अपनी दिव्य दानवीय शक्तियों से राम बनता है, बस दुनिया ही बदल जाती है उसकी। मंदोदरी देखकर हैरान हो गई कि यह क्या हो गया, क्या यह वही रावण है?

क्योंकि रावण की हालत फिर से खराब थी और वह राम बनकर एक सेकंड भी नहीं रह पाया, इसलिए तुरंत अपने रूप में आ गया।

मंदोदरी पूछती है— ऐसा क्या हो गया स्वामी जो एक सेकंड भी राम बनकर न रह पाए? कैसे जाओगे एकतरफा प्रस्ताव लेकर सीता के पास?

तब रावण जो कहता है, वही इस कहानी का निचोड़ है—
रावण कहता है कि "राम बनकर किसी भी स्त्री की ओर देखने पर एक ही भाव आता है— स्त्री माने पवित्रता की एक ऐसी मूर्ति, मानो साक्षात दुर्गा या सरस्वती का रूप हो!

और इस भाव से रावण जैसा पापी,
सीता जैसी पवित्र सोच के निकट भी नहीं जा सकता था। इसलिए राम बनकर एक सेकंड बिताने मात्र से रावण जैसे पापी की दुनिया हिल गई।

सोचिए, जो राम बनकर जीता हो, उसको अच्छाई की क्या लत लग जाती होगी, क्या परम आनंद आता होगा! वह तो खुद को दुनिया का मालिक ही समझेगा।

इसलिए मैंने बोला न— बागेश्वर वाले राम बनकर जीने से बस शरीर की दिखावटी, बाहरी सस्ती खुशी मिलेगी, मन अंदर से बेचैन ही रहेगा।

पर दास कबीर या तुलसी के राम बनकर जीने से मन परम आनंद से गदगद महसूस होगा और आत्मा प्रफुल्लित होगी।

और मन के इसी स्थिति को गीता में आत्मा-परमात्मा, कृष्ण-पार्थ बंधन कहा गया है।

अब तय आपको करना है कि आपको कौन सी राम की छवि चाहिए—
या तो बागेश्वर वाले राम, या हमारे मन में बसे दास कबीर या तुलसी के राम।

बंधुओं, मेरी मानिए— पूजा सब ठीक है, खूब कीजिए, पर राम बनकर जीना सबसे बड़ी रामभक्ति होगी।

जब रावण की दुनिया बदल गई, तो आपकी क्यों नहीं बदल सकती? बनकर तो देखिए।

राम नाम सदैव सत्य है।

राम राम।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational