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Vikrant Kumar

Inspirational


4.8  

Vikrant Kumar

Inspirational


राजा- द स्ट्रांग मैन

राजा- द स्ट्रांग मैन

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मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि मेरे पड़ौस की दुकान पर डब्ल्यूडब्ल्यूई की फाइट देखने के लिए आने वाला एक साधारण सा ग्रामीण युवक एक दिन पत्थर पे वो अमिट लकीर खींच देगा जो हर उस व्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगी जो कुछ कर गुजरने की चाह मन में लिए परिस्थियों से हार मान कर बैठा हो।


 आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व मेरा परिचय मेरे ननिहाल निवासी हमउम्र राजेंद्र श्योराण से हुआ।मैं उस समय पड़ोस की एक दुकान पर सरजीत भाई के पास बैठकर टीवी देखा करता था और अक्सर उसी समय राजेंद्र उर्फ राजा भी वहाँ कुछ समय के लिए टीवी देखने आया करते थे। वहीं परिचय और फिर दोस्ती हुई। चूँकि वो मेरे ननिहाल के गाँव के थे तो उनका महत्व भी मेरे लिए विशेष था।

खैर... बात है उस शख्सियत की जिसने अपने दृढ़ निश्चय और आत्म विश्वास से 14 वर्ष संघर्ष करने के बाद वो मुकाम हासिल किया जो शायद किसी और के लिए ताउम्र ख्वाब ही रहता। लोक प्रशासन से स्नातकोत्तर करने के बाद राजेन्द्र भाई के मन में एलएलबी करने की तीव्र इच्छा हुई और बड़े चाव से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की। तुरंत बाद एक नामी वकील के पास प्रैक्टिस शुरू कर दी। लेकिन कुछ दिनों में ही कोर्ट और केस की यथास्थितियों के अवगत होने के बाद, आपको लगा कि ये फील्ड मेरे लिए फिट नहीं है।इस बारे में मेरे साथ कई बार चर्चा भी हुई। गाँव में अच्छी जमीन जयदाद होने के बावजूद भी आप परम्परागत खेती के साथ कुछ अलग करने की चाह मन दबाए हुए थे। फिर अचानक एक दिन आपने वकील,प्रैक्टिस और उस फील्ड को अलविदा बोल कर बीएड प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश ले लिया। मुझे भी समझ नहीं आया कि अधिवक्ता बनते बनते आप कहाँ अध्यापक बनने को चले?? बातचीत हुई तो पता चला कि स्कूल शिक्षा के उस गणित शिक्षक की अमिट छाप आपके मन पर गहरी छपी है जो कभी बच्चों को डाँटते मारते नहीं थे लेकिन फिर भी न पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी गणित सीखा दिया। सिखाया ही नहीं बल्कि ऐसी रुचि पैदा कर दी कि विद्यार्थी गणित के अलावा कुछ पढ़ना ही नहीं चाहते थे।


शायद प्रेरणा ही उत्कर्ष परिणाम की सूचक होती है।मैं पहले ही बीएसटीसी उतीर्ण कर चुका था। आपकी बीएड भी पूर्ण होने को ही थी कि 2006 में सरकार द्वारा अध्यापक भर्ती हेतु विज्ञापन जारी हुआ। हम दोनों ने एक साथ अध्यापक भर्ती परीक्षा दी। मेरा चयन हो गया लेकिन दुर्भाग्यवंश आपका चयन नहीं हो पाया।फिर भी आपके मन में शिक्षक बनने की प्रबल इच्छा ज्यों की त्यों विराजित रही। 


2006 से 2017 तक आपने कई बार अध्यापक भर्ती हेतु परीक्षा दी परन्तु कामयाबी हासिल ना हो सकी।बार बार हो रही असफलताओं से दोस्त रिश्तेदार भी दबी जुबान से कहने लगे कि सरकारी नोकरी तुम्हारे बस की नहीं है अब तो प्रयास निर्थक है। इसी बीच आपकी शादी हो गयी घर परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ने लगी। घर परिवार में कोई बीमार हो उसकी दवा-दारू का इंतजाम आपकी जिम्मेदारी हो चली। छोटे भाई की पत्नी और जीजा की अचानक हुई जवान मृत्यु ने भी पूरे परिवार को सदमे में ला दिया।परन्तु विकट परिस्थितियों में भी आपका हौंसला कभी कम नहीं हुआ। परिवार की जिम्मेदारी और जीवन में आये उतार चढ़ाव के बावजूद आप अपने लक्ष्य पर अटल रहे। शिक्षक बनने की चाह में आपने राजनीति विज्ञान से एमए उतीर्ण कर नेट भी पास कर लिया। 


कई बार असफलता का दीदार करने के बाद 2018 में आपको उस समय एक मौका और मिला जब राज्य सरकार ने फिर एक बार द्वितीय श्रेणी व प्रथम श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा हेतु ज्ञापन जारी किया। भर्ती परीक्षा से पूर्व मुझसे फोन पर लगभग एक घण्टे बातचीत हुई। आपने बताया कि "ये मेरा अंतिम प्रयास है क्योंकि इसके बाद अगली भर्ती से पूर्व मेरी भर्ती योग्य आयु सीमा पार हो जाएगी। अबकी बार मुझे चयनित होने के लिए आरपार की लड़ाई लड़नी है"। 

आपने परीक्षा की तैयारी के लिए घर परिवार दोस्त रिश्तेदार भूख-प्यास,नींद सब का त्याग कर दिया। दिन-रात केवल एक ही कार्य-पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई।लक्ष्य भी केवल एक-चयन, चयन और सिर्फ चयन। 


मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। 14 वर्ष के लम्बे इंतजार के बाद 2020 में आखिर वो पल आया जब गाँव के उस साधारण से दिखने वाले युवक ने अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय से आसमान में छेद कर दिया। द्वितीय श्रेणी में सामाजिक विज्ञान शिक्षक के चयन की खबर के बाद राजनीति विज्ञान के व्याख्याता के पद पर चयन और फिर पूरे राज्य में महज पांच पद की भर्ती में लोकप्रशासन के व्याख्याता के रूप में चयन ने सफलता की बाढ़ सी ला दी। आपका चयन घर परिवार और आपसे जुड़े हर उस व्यक्ति के लिए असीम खुशियों के पल ले आया जो आपके दृढ़ निश्चय को जानते थे।

आपकी इस कामयाबी ने घर परिवार और समाज में प्रेरणा की वो आग लगा दी जो किसी अन्य दृढ़ निश्चयी व्यक्ति के लिए सदैव रास्ते के उजाले का काम करेगी।


सोचता हूँ भगवान भी उसी की सहायता करते हैं जो स्वयं की सहायता का हौसला रखते हों । घर में सब साधन संपन्न होने व 40 बीघा खेती की ज़मीन का इकलौता वारिस होने के बावजूद अपने लक्ष्य से अड़िग रहना भी कोई छोटी बात नहीं है। अक्सर लोग एक दो प्रयास में ही हार मानकर अपने लक्ष्य से भटक जाते है और अपने वर्तमान जीवन में व्यस्त हो जाते हैं।


राजा भाई आपका हौसला वाकई तारीफ के काबिल है। प्रधानाध्यापक, किकरचक का पद सुशोभित करने के लिए आपको असीम शुभकामनाएं एवं बधाई।


ये जीत न केवल आपकी व्यक्तिगत जीत है 

बल्कि जीत है दृढ़ निश्चय की....

जीत है हौसले की...

जीत है उन सपनों की जो हमने मन की आँखों से देखे हों और हासिल किए हों ...

जीत है उस हर शख्स की जो आपकी तरह ही अपने कर्म से पत्थर पर अमिट लकीर खींचने का हौसला रखता हो।


निश्चय ही आपकी उपलब्धि हम सबका मार्ग प्रशस्त करेगी।



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