पूतनावध की कथा
पूतनावध की कथा
पुतना शब्द में पूत का अर्थ है पवित्र और ना का मतलब है नहीं अर्थात जो पवित्र नहीं है वह है पूतना। आत्मस्वरूप का ज्ञान पवित्र है अर्थात् मनुष्य शुद्ध चेतन आत्मा है, परमात्मा का अंश है। पर ‘मैं’ शरीर हूँ यह अज्ञान है। कई आचार्य अविद्या को ही पूतना मानते हैं। पूतना तीन वर्ष तक के शिशु को मारती है। मनुष्य तीन अवस्थाओं–जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में तीन गुणों–सत्व, रज और तम से जुड़ा हुआ है। जब वह परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ता है अर्थात् ब्रह्मसम्बन्ध जोड़ता है तो पूतना उसे त्रास नहीं देती है। ईश्वर से विमुख रहने पर ही पूतना त्रस्त करती है, डराती है।
पूतना पूर्वजन्म में राजा बलि की पुत्री रत्नमाला थी। राजा बलि के यज्ञ में भगवान वामन का रूप धारण करके भिक्षा मांगने गए थे। सात वर्ष के वामनजी अत्यन्त सुन्दर दिख रहे थे। वामनजी को देखकर राजा बलि की पुत्री के मन में वात्सल्य-प्रेम जागा और उसने मन-ही-मन सोचा कि ऐसा बालक मेरी गोद में आ जाए तो कितना अच्छा हो। इतने सुन्दर बालक को मैं खिलाऊँ, स्तनपान कराऊँ, तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। वामन भगवान ने अपने भक्त बलि की पुत्री के इस मनोरथ का मन-ही-मन अनुमोदन किया। पर जब वामनजी ने विराट रूप धारणकर बलि राजा का सर्वस्व हरण कर लिया तो उनकी पुत्री को बहुत बुरा लगा। वह सोचने लगी कि मेरे पिता को इन्होंने कपट से छला है अत: इन्हें मारना चाहिए। एक बार गोद में खिलाने का संकल्प और फिर मारने का संकल्प; दोनों संकल्प मिल गए और राजा बलि की पुत्री अगले जन्म में (द्वापरयुग में) पूतना हुई।
श्रीकृष्ण की षष्ठी-पूजा करके नंदबाबा कंस को वार्षिक कर चुकाने मथुरा गए। उन्होंने सोने की थाली में रखकर पांच हीरों की भेंट कंस को दी। नंदबाबा के घर नारायण बालकृष्ण बनकर आए हैं अत: लक्ष्मीजी भी वैकुण्ठ छोड़कर नंदबाबा के घर पधारी हैं। वसुदेवजी को जब पता चला कि नंदबाबा आए हैं तो वे नंदबाबा से मिलने उनके शिविर में गए। वसुदेवजी शूरसेन के पुत्र हैं और नंदबाबा पर्जन्य के पुत्र हैं। शूरसेन और पर्जन्य के पिता एक ही हैं। अत: दोनों भाई-सरीखे हैं। दो परम-बन्धु बहुत दिनों बाद मिले और वह भी कंस के भय से गुपचुप। एक-दूसरे से कुशल समाचार पूछने के बाद वसुदेवजी ने नंदबाबा से कहा–’नंदरायजी ! आप को अब यहां और अधिक नहीं रुकना चाहिए। गोकुल में बहुत उत्पात हो रहे हैं।’
‘गोकुल में उत्पात–नारायण रक्षा करें।’ नंदबाबा भगवान का स्मरण करते हुए गोपों के साथ छकड़े (बैलगाड़ी) दौड़ाते हुए शीघ्रता से गोकुल की ओर चल पड़े।
कंस ने नवजात शिशुओं का वध करने के लिए जिन असुरों को नियुक्त किया था उनमें पूतना सबसे प्रधान थी। पूतना इच्छानुसार रूप बनाकर दिन-रात अबोध बच्चों का वध करती हुई घूमा करती थी। श्रीकृष्ण की षष्ठी के दिन ही नंदबाबा के मथुरा चले जाने के बाद पूतना ब्रज में पहुंची। उसने देखा कि कंस के भय से नंदबाबा ने सभी ब्रजवासियों को लाला का ध्यान रखने के लिए कहा था। इसलिये बलवान गोप प्रत्येक द्वार पर पहरा दे रहे हैं अत: पूतनाने अपने वस्त्र और श्रृंगार से सभी को मोह लेने के लिए सुन्दर रूप धर लिया! खुद को सुन्दर स्त्री बना लिया। उसकी चोटियों में बेला-चमेली के फूल गुँथे थे। सुन्दर वस्त्र पहने थी। उसके कानों के कर्णफूल की चमक, माथे पर लटकती हुई अलकें, मधुर मुस्कराहट, तिरछी चितवन, बड़े-बड़े नितम्ब, पतली कमर ब्रजवासियों का चित्त चुरा रही थी। आभूषणों की झंकार करती, हाथ में एक कमल लेकर उसे नचाती हुई पूतना जब चली तो ऐसा प्रतीत हुआ कि साक्षात् लक्ष्मीजी अपने पति को देखने के लिए आई हों। सौंदर्य का मोह होते ही विवेक बह जाता है, ज्ञान तब टिकता नहीं। किन्तु अनजान-सी स्त्री नंदभवन के भीतर चली जा रही है फिर-भी सौंदर्य के मोह के वश कोई उसे रोकता नहीं है। सभी होश गंवा बैठे हैं। सोचते हैं कि–ऐसा लगता है कि यह किसी बड़े घर की स्त्री है। हम इससे पूछेंगे कि आप कौन हैं और भीतर क्यों जा रही हैं तो उसे बुरा लगेगा। पूतना का तन सुन्दर है पर मन मैला है। बाहर से प्रेम का आडम्बर है पर मन में वैर-भाव है। रूप तो उसने पत्नी व माँ का धारण किया है पर मन में मारने की दुर्वृत्ति है। पूतना का सौंदर्य, श्रृंगार, बात करने का ढंग और उसकी शान-शौकत देखकर गोपियां तथा माता रोहिणी और यशोदाजी तक पूतना के सौंदर्य के प्रभाव में आ गईं। यशोदामाता ने सोचा कि यह कोई भले घर की स्त्री है इसलिए उन्होंने कोई विरोध नहीं किया और वह सीधे नंदभवन में चली गई। भगवान की ही लीलाशक्ति ने उसे अन्य किसी घर में जाने से रोककर नंदभवन में जाने की प्रेरणा दी। पूतना ने मखमली म्यान में दुधारी तलवार की तरह कपट से भरा सुन्दर रूप बनाया। पूतना ने देखा कि एक दूध जैसे उज्जवल बिछावन पर नीलमणि जैसा सुकोमल शिशु पीताम्बर ओढ़े सो रहा था। भगवान श्रीकृष्ण दुष्टों के काल हैं। परन्तु जैसे आग राख की ढेरी में अपने को छिपाए हो वैसे ही उन्होंने अपने प्रचण्ड तेज को छिपा रखा था। उन्होंने उसी क्षण जान लिया कि यह बच्चों को मारने वाला पूतना-ग्रह है और अपने नेत्र बंद कर लिए।*
पूतना प्रेम का नाटक करती है और जैसे ही यशोदामाता घर के भीतर जाती हैं वह अपना कालकूट विष लगाया हुआ स्तन बालकृष्ण के मुख में दे देती है। जिसका नाम विष को अमृत कर देता है, उसे विष का क्या पता लगना था। भगवान ने मन में कहा, प्रेम से मुझे जो कुछ भी मिलता है, उसे मैं स्वीकार कर लेता हूँ। पूतना के स्तनों में दूध और विष दोनों विद्यमान थे। संसार में भी विष और अमृत दोनों प्राप्त होते हैं। यहां पाप-पुण्य, हर्ष-शोक, जन्म-मरण जैसे विषमभाव सदैव विद्यमान रहते हैं। बंधन तथा मोक्ष भी रहते हैं। यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह क्या चुनता है। श्रीकृष्ण ने हंस की तरह दूध-पानी अलग करते हुए दूध पी लिया और विष छोड़ दिया मानो वे बताना चाह रहे हैं कि मेरी तरह अच्छाई ग्रहण करो, बुराई छोड़ दो।
बालकृष्ण स्तनपान करते हुए पूतना के प्राण चूसने लगे। पूतना के मर्मस्थान फटने लगे। वह चिल्लायी–अब मुझे छोड़ छोड़। पूतना के दो बार छोड़ छोड़ कहने का अर्थ है कि मुझे पाप-पुण्य, राग-द्वेष, ममता-अहंता से मुक्त कर दो। भगवान ने मन में कहा–मैं जिसे एक बार पकड़ता हूँ उसे कभी छोड़ता नहीं। इसलिए बालकृष्ण ने तो उसे नहीं छोड़ा पर उसकी देह ने उसका साथ छोड़ दिया। वह चीखने लगी उसकी उसकी भयंकर चिल्लाहट से ब्रजवासियों के हृदय, कान और सिर में वेदना होने लगी। आखिरकार तड़पती हुई वह अपने वास्तविक रूप में गोकुल से दूर जा गिरी। पूतना का वास्तविक शरीर इतना बड़ा था कि जब वह गिरी तब छ: कोस के भीतर के वृक्ष टूटकर गिर गए।
गोपियों ने जब पास जाकर देखा तो वेह बेहद डर गई क्योकि पूतना का शरीर बड़ा भयानक था, उसका मुंह हल के समान तीखी और भयंकर दाढ़ों से युक्त था। उसके नथुने पहाड़ की गुफा के समान गहरे थे और स्तन पहाड़ से गिरी हुई चट्टानों की तरह बड़े-बड़े थे। लाल-लाल बाल चारों ओर बिखरे हुए थे। आँखें अंधे कुएं के समान गहरी, नितम्ब नदी के करार की तरह भयंकर, भुजाएं, जाँघें और पैर नदी के पुल के समान तथा पेट सूखे हुए सरोवर की भांति जान पड़ता था। ओर गोपियो के यह देखकर अचरज हुवा की ऐसी भयानक राक्षसी के शरीर पर बालकृष्ण निर्भय होकर खेल रहे हैं, और मानो जेसे कह रहे हो ‘मैं दुधमुँहां शिशु हूँ, स्तनपान ही मेरी जीविका है। तुमने स्वयं ही अपना स्तन मेरे मुँह में दे दिया और मैने पिया। इससे यदि तुम मर जाती हो तो स्वयं तुम्ही बताओ इसमें मेरा क्या अपराध है?’ गोपियों ने झटपट वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण को गोद में उठा लिया और यशोदामाता को बाल कृष्ण सौंप दिया. यशोदामाता ने कृष्ण को छाती से लगाकर बहोत प्रेम किया. जिस दिन पुतना का वध हुआ वह फाल्गुन पूर्णिमा का दिन था अतः पूतनावध की खुशी में होली मनाई जाने लगी।
