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Vibha Rani Shrivastava

Inspirational

4  

Vibha Rani Shrivastava

Inspirational

'प्रतिकार'

'प्रतिकार'

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गुरु/बाबा/अभिभावक का महाप्रयाण हुए तेरह दिन गुजर चुके थे। बेटे-बेटियाँ, शिष्य सभी पितृ-शोक से उबरने के लिए प्रयासरत थे। दो सत्र में शब्दांजली-कार्यक्रम रखा गया था। स्थानीय सशरीर उपस्थिति देने वाले थे तो अस्थानीय गूगल मिट से वर्चुअल। सभी अपने-अपने संस्मरण के संग उनकी ही लिखी रचनाओं का पाठकर श्रद्धांजली दे रहे थे। एक विभा ही थी जो दोनों सत्र में अपनी उपस्थिति निर्धारित की हुई थी। दोनों कार्यक्रमों में और रोती बेटियों को एक ही बात समझाने का प्रयास कर रही थी कि "बाबा/गुरु/अभिभावक कहीं नहीं गए हैं बाहर वालों समझों कि वे बिहार में हैं और बिहार वाले समझें कि वे दिल्ली में हैं। आज टेक्नोलॉजी के उन्नति होने से पल झपकते हम किसी से बात कर लेते हैं। किसी को वीडियो कॉल में देख लेते हैं। जब हमारी शादी हुई थी तो हफ्तों/महीनों एक पत्र की प्रतीक्षा में गुजर जाते थे तो चन्द शब्द पढ़ने को मिलते थे। हम उसी पुराने ज़माने को मान कर चलते हैं।

कविता, ग़ज़ल, हाइकु, तांका, कहानियाँ, उपन्यास के साथ-साथ असंख्य लघुकथाओं के संग आलेख-समीक्षाओं में हमारे सारे प्रश्नों के हल मौजूद हैं। हमारी पीढ़ी तो उसमें ही डूबते-उतराते बाबा/गुरु/अभिभावक की उपस्थिति का अनुभव करते गुजर जाएगी। हमारा अनवरत पढ़ना-लिखना चलता रहे। इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं। हमारे बाद की पीढ़ी जो चाहेगा वह भी पा लेगा। बस! सँजोना ही तो है।"

"आप भुलावे में हैं। आपलोगों के गुरु/बाबा सशरीर जा चुके हैं। आपलोग अब अपने लिखे पर उनसे सुझाव नहीं मांग सकते! उनसे कहा नहीं जा सकता कि आप हमारी त्रुटि बता दें। बाऊ जी जब तक थे आपलोगों ने श्रम कम किया।" बाबा/गुरु के पुत्तर जी ने कहा।

"थोड़ी देर पहले आपने कहा आपके विचार और बाऊ जी के विचार में बहुत समानता है।  लत्तर/बेल सी हम बेटियाँ हमें चिन्ता नहीं उनकी पगड़ी आपके सिर पर ! मैं यही तो कह रही थी कि,"बाबा/गुरु कहीं गए नहीं हैं ! उनकी उपस्थिति को महसूस करना है।"


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