Dheerja Sharma

Inspirational

4.9  

Dheerja Sharma

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परिवार

परिवार

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परिवार "पापा पापा, मेरा सेलेक्शन हो गया। देखो मेरा अप्पोइन्टमेन्ट लेटर। "मुग्धा हाथ में लेटर लहराते हुए तूफान की तरह घर मे घुसी। "अरे वाह मेरी शाइनिंग स्टार! मुबारक हो! कब जॉइन करना है?" शर्मा जी उत्साह से बोले फिर पत्नी से आंखें मिलते ही उनके चेहरे के भाव बदल गए। मुग्धा रेणु जी के गले मे बाहें डालती हुई बोली," देखो मम्मा, तुम्हारी लायक बेटी को ये प्रोजेक्ट मिल ही गया। अस्सी लोगों में से मेरी सेलेक्शन हुई है। आप खुश नहीं हो?" " ठीक है! भारत में सारे प्रोजेक्ट खत्म हो गए जो मेरी बेटी को अमेरिका जाना पड़ रहा है। " रेणु ठंडे स्वर में बोली। रात को शर्मा जी देख रहे थे कि रेणु बहुत परेशान है। बिस्तर पर करवटें बदले जा रही है। पर उसकी नाराज़गी के डर से चुपचाप दुबके रहे, बोले कुछ नहीं। रेणु प्रश्नों के जाल में उलझी हुई थी। " ऐसा भी होता है कहीं ! जवान लड़की परदेस में निपट अकेली !

कहाँ रहेगी , कैसे हर चीज़ की व्यवस्था करेगी! शाकाहारी भोजन न मिला तो ? बीमार पड़ गयी तो? इकलौती संतान होने के कारण खूब लाड़ प्यार में पली है। यहाँ तो ज़रा से सिरदर्द में भी सिर बांध कर पड़ जाती है। माँ पापा को को रात भर सिरहाने से उठने नहीं देती। हर चीज़ हाथ में चाहिए। परीक्षा के दिनों में रात रात भर जाग कर पढ़ाई करती। रात के दो बजे भूख लगती तो माँ से बेसन का हलवा बनाने की फ़रमाईश कर देती। एक एक घंटे बाद कॉफ़ी मांगती। वहां विदेश में राजकुमारी जी का ध्यान कौन रखेगा, कौन इसके नखरे पालेगा? सिवाय मैगी के कुछ बनाना नहीं आता। सुना है, विदेश में महरी भी नहीं मिलती। क्या करेगी यह लड़की! कपड़े कैसे धोएगी! गर्म कपड़े अलग से इजी में धोने है, इसको कैसे पता चलेगा! इसे तो बिजली,ए सी, हीटर कुछ भी बंद करना याद नहीं रहता। क्या होगा? मकान मालिक तो दूसरे दिन ही मकान खाली करने को बोल देंगे। सुना है ये गोरे लोग , भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते हैं। और फिर मुग्धा गयी भी अपने पिता पर है--रूप रंग ढला ढला है। ऐसा ना हो इसके साथ बुरा सुलूक करें। रेणु के मन में अनगिनत सवाल और उलझने थीं। पिछले एक महीने में शर्मा जी और मुग्धा समझा समझा कर थक गए लेकिन....माँ का मन था, कैसे समझता! और आखिर जाने का दिन आ ही गया। मां दस दिन से पैकिंग में लगी है। वो हर ज़रूरत की चीज़ बेटी को देना चाहती है।

लेकिन मुग्धा सामान का भार ज़्यादा होने की दुहाई देकर सब निकाले जा रही है। माँ के बात बात पर आंसू निकल जाते। मां को देख कर पिता का दिल भी भर भर आता था। लेकिन वे दिल को मजबूती से थामे थे। माँ को भी लाख समझाया कि बच्चों के भविष्य की राह में भावना के रोड़े नहीं अटकाने चाहिए। मुग्धा कितनी उत्साहित थी इस प्रोजेक्ट को लेकर। रेणु खामोशी से उनकी बातें सुनती पर आंसू थे कि बांध तोड़ बह जाते। एयरपोर्ट पर मुग्धा को छोड़ने के बाद माँ बेहद उदास हो गयी। पति से बोली," देखो जी, अपनी बिटिया तो बड़ी निठुर निकली। झट से अपना परिवार छोड़ कर चली गयी। आँख में एक आँसू नहीं आया। कितनी खुश हो कर हाथ हिला हिला कर टा टा कर रही थी" पापा झूठी हँसी हंसते हुए बोले,"आखिर मेरी बेटी है! बहादुर बेटी! और फिर ये कौन सी जीवन भर को चली गयी। एक साल की बात है, लौट आएगी। " फिर पत्नी की आँखे पौंछते हुए बोले," कल को शादी नहीं करोगी क्या लड़की की? घर बैठा कर रखना है क्या?" अच्छा हुआ, साल भर में उसके बिना रहने की आदत तो पड़ जाएगी"। " घर क्यों बैठा कर रखूँगी ? शादी करके खुशी खुशी भेजूंगी उसे ससुराल ! लेकिन परदेस जाने की क्या ज़रूरत थी।

अगर विदेश जाना भी था तो शादी के बाद अपने पति के साथ जाती। कुछ नाराज़गी से पति से बोलीं," ये सब आपके लाड़ प्यार का नतीजा है। आप इसे हर बात में शह देते हो। नौकरियों की कमी है क्या अपने देश मे ?छोड़ देती ये नौकरी ! अब जब तक इसका पहुंचने का फ़ोन नहीं आएगा, मेरा जी घबराता रहेगा। " पिता पत्नी की बातों को मज़ाक में उड़ाते रहे। रेणु ने न खाना खाया न ढंग से सोयी। कैलिफ़ोर्निया पहुंच कर मुग्धा ने जब बताया कि सभी टीम के लोग बहुत अच्छे और सहयोग देने वाले हैं। एक महिला और एक पुरुष सहकर्मी उसे एयरपोर्ट पर लेने पहुंचे हुए थे। यह सुन माँ की जान में जान आई। भारत और वहां के समय में फर्क होने से मुग्धा कई बार फ़ोन करने में देरी कर देती ,कभी काम की वजह से कभी यह सोच कर की माँ आराम कर रही होगी। एक दिन माँ ने मुग्धा को खूब डांटा क्यों कि 2-3 दिन से उस से बात ही नहीं हुई थी। मुग्धा ने बताया कि उसकी तबीयत खराब हो गयी थी। किस तरह उसकी तबीयत बिगड़ने पर वहां रहने वाली उसकी अमेरिकन मकान मालकिन ने उसकी देखभाल की। उसके पाकिस्तानी सहयोगी ने अपनी पत्नी से उसके लिए दलिया ,खिचड़ी आदि बनवाई। और उसकी जर्मन रूममेट उसे अस्पताल ले जाती रही। उसके लिए शाकाहारी भोजन की व्यवस्था भी करती रही। रेणु के चेहरे पर एक रंग आ रहा था ,एक रंग जा रहा था। सारी बात सुनकर शर्मा जी ने कहा," देखा रेणु ,मैं न कहता था हमारी मुग्धा बहुत सयानी है। कितनी जल्दी उसने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया। खून से जुड़े रिश्तों से हटकर बना उसका नया परिवार कितना काम आया। ये जात पात धर्म की दीवारें बेमानी हैं। असली धर्म मानवता है। इंसान का इंसान से रिश्ता महत्वपूर्ण है। बच्चे जब घर से बाहर निकलते हैं तब उनका एक और परिवार होता है- उनके मित्र और सहकर्मी। फिर वे चाहे देस के हों या विदेश के। "वसुधैव कुटुम्बकम"। सारी धरती एक कुटुम्ब ही तो है। और रेणु हाँ -हाँ में सिर हिलाते हिलाते पति के सीने लग कर फिर रो पड़ी। लेकिन इस बार ये आँसू खुशी और संतोष के थे।


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