Dheerja Sharma

Drama

4.8  

Dheerja Sharma

Drama

रॉंग नंबर

रॉंग नंबर

3 mins
411


"हलो...हलो..."पंकज लगातार हलो हलो कर रहा था।

हेलो...कौs"sन? रोहित? रूठा है क्या बेटा?छः महीने हो गए, फ़ोन क्यों नहीं किया?"उधर से किसी वृद्धा की काँपती हुई आवाज़ आयी।

हलो.... क्या ये मन्नू प्लम्बर का नंबर है? पंकज ने झल्लाहट से पूछा।

"मन्नू? नहीं तो.".. वृद्धा की आवाज़ में उदासी घिर आयी।

"सॉरी रॉंग नंबर"-पंकज ने फ़ोन पटक दिया।

किसी दोस्त से एक और प्लम्बर का नंबर लिया और बाथरूम की लीकेज ठीक करवाई।

बिस्तर पर करवटें लेते लेते सुबह की घटना याद आ गयी।रॉंग नंबर था किंतु उस माँ की आवाज़ दिल को भिगो गयी।कौन है रोहित? छः महीने से उसने माँ को फ़ोन क्यूँ नहीं किया? कुछ अनहोनी हुई क्या उसके साथ? कहीं कोरोना का शिकार तो नहीं...नहीं नहीँ ! लेकिन,अगर वो ठीक होता तो फिर क्यों बुज़ुर्ग माँ को यूँ ही अपने हाल पर छोड़ता? कितनी उम्मीद से उस माँ ने फ़ोन उठाया था।रॉंग नंबर सुन कर दिल टूट गया होगा बेचारी का।

पंकज बेचैन हो गया। एक माँ की कीमत एक अनाथ से ज़्यादा कौन समझ सकता है? घड़ी पर निगाह डाली।रात के दस बज रहे थे।

मिलाऊँ फ़ोन?

"नहीं, नहीं,... ये कोई समय है?कल करना फोन" दिमाग ने कहा।

"बेटे की याद में माँ को नींद कहाँ।चल मिला दे फ़ोन!" दिल ने कहा।

पंकज ने फ़ोन उठा कर रीसेंट लिस्ट से रॉंग नंबर मिलाया।

हलो....

काफी देर रिंग जाती रही। सो गयीं शायद ! 

काट देता हूँ फ़ोन.. मन में सोचा।

इतने में दूसरी तरफ से वही आवाज़ आयी।

"हेलो...कौs"sन? रोहित? मेरा बच्चा..

हेलो.. तू कुछ बोल क्यूँ नहीं रहा? तू ठीक तो है बेटा?" वृद्धा की आवाज़ में चिंता झलक रही थी।

बहुत साहस जुटा कर पंकज बोला," हलो.. माँ ! हाँ माँ मैं ही बोल रहा हूँ - तुम्हारा रोहित "।

" रोहित? मेरा बच्चा ! मुझे पता था तेरा ही फ़ोन होगा।कोई अपनी माँ को भूल सकता है भला क्या? ये तेरी आवाज़ को क्या हुआ बेटा? तू ठीक तो है? 

" माँ मैं बिल्कुल ठीक हूँ।बस ज़रा गला खराब है।इस लिए आवाज़ बैठी हुई है।" पंकज ने गला साफ करते हुए "कहा।

" गला खराब है ? बुखार तो नहीं? डॉक्टर को दिखाया? दवा ली?" फ़ोन पर माँ की चिंता साफ सुनाई दे रही थी।

पंकज भूल गया कि वह पंकज है, रोहित नहीं।उसकी माँ होती तो इस माँ जैसी ही होती।हर माँ शायद ऐसी ही होती है।

"तुम चिंता मत करो।मैं बिल्कुल ठीक हूँ।तुम्हारी बहुत याद आती है,माँ। बस काम काज से फुरसत ही नहीं मिलती।अब से हर रोज़ तुम्हें फ़ोन करूंगा, सुबह उठते ही सबसे पहले। पक्का !अच्छा तुम बताओ ,सेहत ठीक है न?"

" तेरी आवाज़ सुन ली।अब अच्छी हो जाऊंगी।बस तू जल्दी घर आजा।आँख का मोतिया पक गया है।अब साफ दिखाई भी नही देता।तुझे देखने को आंखे तरस गयी हैं।अब तो यादाश्त भी कमजोर हो गयी है।" माँ की आवाज़ में दर्द उमड़ आया।

" यादाश्त तो तुम्हारी बहुत अच्छी है।अच्छा माँ, भला अपने घर का पता बोलो तो,वो भी तो नहीं भूल गई? "पंकज ने फौरन कागज़ पेन उठाते हुए पूछा।

माँ ने एक साँस में घर का पता सुना दिया।

"देखा, मैं कह रहा हूँ न कि यादाश्त तो तुम्हारी बहुत अच्छी है।अच्छा माँ, अब तुम सो जाओ।बहुत रात हो गयी है।कल फिर बात करूंगा।और हाँ, अभी छुट्टी नहीं मिल रही।कुछ रुपये भेज दूंगा कल।अपने लिए दवा और ज़रूरी चीजें ले लेना। जल्दी ही आऊँगा माँ।अपना ध्यान रखना"।बोलते बोलते पंकज का मन भर आया।

फ़ोन रख कर नंबर सेव करने लगा।नाम की जगह लिखा... रॉन्ग नंबर... फिर एडिट कर के लिखा ... रोहित की माँ।

और फिर..फिर से... एडिट कर के लिख दिया.. मेरी माँ !


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