परी लोक का कोल्हू
परी लोक का कोल्हू
रानी साहिबा के जगली बंगले के मालिक बनकर मोटू पतलू की ख़ुशी का ठिकाना न रहा।
"मजा आ गया पतलू देख आज हम भी एक बड़े से बंगले के मालिक है।" मोटू ने उस विशाल जंगली बंगले के मेन गेट को खोलते हुए कहा।
"मोटू यार तुझे समझ क्यों नहीं आ रहा, रानी साहिबा ने हमे आज तक जो भी दिया है वो या तो उनके लिए बेकार था या उनके लिए एक मुसीबत था, ये जंगली बंगला भी मुझे ऐसी ही कोई बला लग रहा है जिससे रानी साहिबा छुटकारा पाना चाहती थी।"
"चुप कर ओये बड़ी मुश्किल से अच्छी जिंदगी जीने का मौका मिला है, इसे मत गवां, चल मजा लेते है इस बंगले की जिंदगी का।"
"ख़ाक मजा आएगा; इतना बड़ा मकान लेकिन खाने-पीने का कोई जुगाड़ नहीं। नौकर के नाम पर एक खड़ूस बुड्ढा है जो काम करने के लिए नहीं बल्कि डरने के काम जरूर आ सकता है।"
"चुप हो जा पतीले, आज का खाना तो हम पैक करा कर ले आए है, कल की कल देखेंगे।"
शाम के ढलते ही वो पूरा बंगला अँधेरे में डूब गया और उस खड़ूस नौकर ने तेल से जलने वाली एक लालटेन बंगले के अंदर जला दी और खांसते हुए बोला, "अब मैं जाता हूँ कल सुबह वापिस आऊंगा; अगर सुबह का नाश्ता चाहिए तो पैसा दो।"
"हमे कुछ नहीं चाहिए अब तुम चलते-फिरते नजर आओ।" पतलू ने उस भयानक शक्ल के बुड्ढे की तरफ गौर से देखते हुए कहा।
बुड्ढे ने पतलू की तरफ घूर कर देखा और फिर बिना किसी दुआ सलाम के बंगले से बाहर चला गया।
बंगले में कमरे बहुत थे लेकिन मोटू पतलू ने दो बिस्तर वाला कमरा चुना और खाना खाकर नींद में खो गए।
एक अजीब सी आवाज से मोटू पतलू की नींद खुल गई और उन्होंने चारो तरफ देखा तो उन्हें हवा में उड़ते चमगादड़ो के अलावा कुछ नहीं दिखा।
तभी कुछ चमगादड़ उनके कमरे की परछत्ती में जा घुसे और परछत्ती पर रखा कबाड़ मोटू पतलू के ऊपर गिरने लगा। उसी कबाड़ में से एक पुराना सा चिराग मोटू की गंजी खोपड़ी से टकराते हुए कमरे के फर्स पर जा गिरा। मोटू अपनी खोपड़ी पर लगी चोट का मातम भी नहीं मना सका था कि फर्श पर गिरे उस चिराग से धुआँ निकलने लगा और वो धुआँ एक दैत्य की आकृति में परिवर्तित हो गया।
दैत्य ने चिराग से निकलते ही एक जोर का ठहाका लगाया और अपनी भयानक आवाज में बोला।
"बोलो कहाँ चलना है मेरे आका।"
"कैसे चिराग के भूत हो भाई हमारी इच्छा पूरी करने की बात करने की बजाय चलने की बात कर रहे हो।" पतलू ने आश्चर्य से पुछा।
"सुन बे पतलू हमेशा हराम का माल खाने के सपने क्यों देखते हो, मैं इच्छा पूरी करने वाला दैत्य नहीं हूँ मैं तो घूमने-फिरने वाला दैत्य हूँ, बोलो कहाँ घूमने चलना है।" दैत्य जोर से हँसते हुए बोला।
"अच्छा पागल बनाता है हमे, घुमाना ही है तो हमें परियो की नगरी में ले चलो।" मोटू दाँत फाड़ते हुए बोला।
"जो हुक्म मेरे मालिकों।" कहते हुए उस दैत्य ने मोटू पतलू की एक एक टाँग पकड़ी और आसमान में उड़ चला।
उलटे लटके मोटू पतलू के मुँह से उस दैत्य के लिए गालियां निकल रही थी जिनका दैत्य के ऊपर कोई फर्क नहीं पड रहा था।
"सुनो मालिकों यहाँ से १०० फिट नीचे परी लोक है, जाओ मजा करो, मैं तुम्हे लेने के लिए सुबह आऊंगा।" कहते हुए उस दैत्य ने उन दोनों के पैर छोड़ दिए और खुद उड़न छू हो गया।
चीखते चिल्लाते वो दोनों परी लोक में किसी मुलायम चीज पर जा गिरे और फिर जोर से डकारने की आवाज आई।
उन दोनों ने देखा वो ऊपर से कोल्हू में जुते एक भैंसे के ऊपर गिरे थे और वो भैंसा डकार कर जमीन पर गिर पड़ा था।
तभी वहां अजीब सा शोर मच गया और दस या बीस परियाँ उन दोनों को बुरी तरह कोसने लगी और थोड़ी ही देर में उन्होंने मोटू पतलू को रस्सियों से बाँध लिया और उन दोनों को लेकर आसमान में उड़ते हुए एक ऊँचे से पहाड़ पर बने महल की तरफ ले चली।
थोड़ी देर की हवाई सैर के बाद परियों ने उन दोनों को उस महल में जा पटका। महल में एक मुस्टंडा लेटा हुआ था। उन दोनों को देखकर वो मुस्टंडा भड़क उठा और एक अजीब से आवाज में उन्हें देख कर एक भाषण सा देने लगा।
वो क्या बोल रहा यह तो मोटू पतलू समझ नहीं पा रहे थे लेकिन इतना तो उन्हें भी समझ आ रहा था कि उस मुस्टंडे का भाषण उन दोनों पर ही हो रहा था जिसे परियों का झुंड मुँह खोले सुन रहा था।
करीब एक घंटे के भाषण के बाद उसने परियों की तरफ अजीब सा इशारा किया जिसके कारण परियों ने रस्सियों में बंधे मोटू पतलू को हवा में उतना ऊपर उठा लिया कि उनके पैर जमीन से ऊपर हवा में हो गए।
देखते ही देखते उस मुस्टंडे ने एक मोटा सा डंडा उठाया और मोटू पतलू को गिनकर १०० डंडे मारे।
"मार डाला बे इस मुस्टंडे ने, पहले एक घंटा भाषण देकर पकाया अब डंडो से हमारी देह को तोड़ रहा है।" मोटू पतलू चीख रहे थे लेकिन उनकी चीख सुनने वाला कोई भी नहीं था।
१५ मिनट की डंडा परेड के बाद मोटू पतलू को फिर उस जगह लाया गया जहाँ वो आसमान से गिरकर उस भैंसे की ऊपर गिरे थे। भैंसे को कोल्हू से खोल दिया गया था अब वो जमीन पर बैठा हुआ जुगाली कर रहा था।
देखते ही देखते उस परियों के झुंड ने मोटू पतलू को उस कोल्हू में जोत दिया और डंडा मरकर उन्हें कोल्हू चलाने का इशारा किया। मोटू पतलू जो डंडे की मार खाने के बाद बिलकुल भी चलने की हालत में नहीं थे वो वहीँ जमीन पर बैठ गए।
उन्हें जमीन पर बैठे देख कर परियों में कुछ खुसर पुसर हुई और फिर वो परियाँ जोर-जोर से चिल्लाई। चिल्लाहट के जवाब में वो महल वाला मुस्टंडा उड़ता हुआ आया और जमीन पर बैठे मोटू पतलू को देख कर अपने डंडे को तेल पिलाने लगा।
उस मुस्टंडे को देखते ही मोटू पतलू के शरीर में अचानक ताकत आ गई और वो तेजी से दौड़ते हुए कोल्हू चलाने लगे।
उस कोल्हू से परीलोक में क्या निकला जा रहा था ये तो पता नहीं लेकिन उस कोल्हू को चलाने में मोटू पतलू की एडी से लेकर चोटी तक पसीना निकल रहा था।
लगभग पाँच घंटे कोल्हू चलने के बाद आसमान में वो दैत्य नजर आया और उसने मोटू पतलू की हालत को देखकर एक जोर का ठहाका लगाया और अपने हाथ का एक इशारा किया उसके हाथ के इशारे से मोटू पतलू के बंधन खुल गए। बंधन खुलते ही दैत्य के दूसरे इशारे पर वो दोनों फिर से दैत्य के हाथों में उलटे लटके हुए थे। दैत्य ने एक जोर का ठहाका लगाया और मोटू पतलू को लेकर वो उड़ चला। एक घंटे की तेज रफ्तार उड़ान के बाद दैत्य ने उन दोनों को उनके जंगली बंगले के दरवाजे पर जा पटका।
"अब कहाँ घूमने चलना है मेरे आका?" दैत्य ने फिर से हँसकर पुछा।
"कहीं नहीं जाना हमारे बाप।" मोटू पतलू ने एक स्वर में कहा और उस जंगली बंगले से मायापुरी जाने वाली सड़क की तरफ दौड़ पड़े।
