पहली मुलाकात....
पहली मुलाकात....
नलिनी और पराशर की कार जैसे गाँव की हवेली के सामने रूकी शिवगामी जी ने अपने नौकर रामचरण को पुकारा....
अरे, ओ..रामचरण ! जल्दी आ देख दरवाज़े पर कार आकर खड़ी हो गई है, जा जल्दी से समान उतार।
हाँ, मालकिन! अभी आया..., रामचरण जल्दी से बाहर आकर आया और हवेली के गेट की ओर मुड़ गया,
सभी कार से उतरें, शिवगामी जी का बेटा पराशर, बहु नलिनी, पोती अग्रणी और पोता स्नेह सबको इतने दिनों बाद देखकर, शिवगामी जी की आँखें भर आईं, सब बहुत ही सालों बाद गाँव आएं है, हमेशा शिवगामी देवी ही उन सब से मिलने विदेश चली जातीं थीं, लेकिन अब थोड़ा बीमारी ने परेशान कर रखा है इसलिए अभी दो सालों से उन सब से मिलने नहीं जा पाईं थीं, पराशर भी कम ही आ पाता है अपनी माँ से मिलने लेकिन इस बार अवसर ही ऐसा था कि सबको आना पड़ा।
शिवगामी देवी की ननद की पोती का ब्याह है, उनके घर की पहली शादी है इसलिए सबका आना जरूरी भी था और फिर शिवगामी जी की ननद की ननद का इंजीनियर पोता भा गया था अपनी अग्रणी के लिए लेकिन ये बात अग्रणी को अच्छी नहीं लगीं क्योंकि वो तो नए ख्यालात की लड़की, वो तो लवमैरिज में ही बिलीव करती है, उसे ये बुजुर्गों के हिसाब से शादी रचाना, रूढ़िवादी और पुराने विचारों का लगता है।
सब कार से उतरें, शिवगामी जी ने अपनी नौकरानी रधिया को पुकारा और बोली महाराजिन से कहो कि चाय नाश्ते का इंतज़ाम करें और जो जो मैंने कहा था खानें में वही बनना चाहिए....
जी मालकिन! और इतना कहकर रधिया भीतर चली गई।
सबने फ्रैश होकर चाय नाश्ता किया, सबको भैंस के शुद्ध दूध की चाय पीकर बहुत आनन्द आया, स्नेह और अग्रणी तो बस पकौड़ों पर टूट पड़े, पराशर को दूध जलेबी का नाश्ता पसंद है तो उसने वही किया, नलिनी ने भी सबके साथ नाश्ते का भरपूर आनन्द उठाया।
कुछ देर इधर उधर की बातें हुई, फिर सब एक एक करके नहाने चले गए, इसके बाद दोपहर के खाने का समय हो गया, दोपहर का खाना खाके सबको बहुत संतुष्टि मिली, अरहर की तड़के वाली दाल, आलू की तरी वाली सब्जी, बैंगन का भरता, अचार, पापड़ और रोटी इतना सब था खानें में और चूल्हे में पका होने से खाने का मजा दुगना हो गया।
फिर सब आकर बरामदे में बैठ गए, जहाँ बोगेनवेलिया की घनी बेलें छाई हुई थीं और उसके फूल झड़ झड़कर यहाँ वहाँ बरामदे में बिखरे थे।
तभी शिवगामी जी ने पराशर से पूछा___
तूने अग्रणी को तो सब बता दिया है ना!
तभी अग्रणी बोल पड़ी___
क्या? दादी! आप इस जमाने में भी मेरी ऐसी शादी करवाना चाहतीं हैं।
अच्छा, ठीक है! एक बार लड़के को देखने में क्या बुराई है? नहीं पसंद आया तो मत करना शादी, कोई जबरदस्ती थोड़े ही है, जिसे पसंद आना होता है ना तो वो पहली ही नज़र में भा जाता है, शिवगामी जी बोलीं।
मतलब दादी! आप कहना क्या चाहतीं हैं? अग्रणी ने पूछा।
कुछ नहीं! तेरे दादा और मेरी मुलाकात भी ऐसे ही हुई थी, सच में उनका जाना मेरे जीवन में एक सूनापन दे गया, उनकी कमी कोई भी पूरी नहीं कर सकता, शिवगामी जी बोलीं।
अच्छा, तो सुनाइए ना अपनी और दादा जी की कहानी, अग्रणी बोली।
लेकिन तुम्हें बाजार भी तो जाना है, देर हो जाएगी और कल ही तो शादी है, शिवगामी जी बोलीं।
अरे, मैं चली जाऊँगी बाजार, यहाँ बाजार भी तो छोटा सा ही है, मैंने आते समय देखा था और फिर रिक्शे से ही तो जाना है, आप सुनाइए कहानी बस, अग्रणी जि़द करते हुए बोली।
ठीक है तो सुन, शिवगामी देवी बोलीं____
मैं तब सोलह की पूरी हुई थी और सत्रहवीं में कदम रखा था, पड़ोस के गाँव में दशहरे का मेला लगा, मैं अपनी सहेलियों के संग वहाँ गई, सब सहेलियाँ दुकानों में अपने लिए कुछ ना कुछ खरीदने लगी, मैंने अपने लिए हरी हरी काँच की चूड़ियाँ ली और दुकान से बाहर आ गई, तभी मुझे गरम गरम गुड की जलेबियाँ बनती दिखी और मैं उस ओर चली गई क्योंकि गुड़ की जलेबियाँ मुझे बहुत पसंद हैं, मैंने जलेबियाँ खाई और प्याऊ से पानी पिया, तब मुझे याद आया कि इन सबके बीच में मैं अपनी सहेलियों से बिछड़ गई हूँ।
और मुझे रोना आ गया, मैं बहुत घबरा गई, मैं कुछ सोच ही रही थी कि तभी अचानक से मेले में लगा लाउडस्पीकर बोल पड़ा, मैं डरकर चीख पड़ी और बगल में खड़े एक लड़के का हार जोर से पकड़ लिया, उस लड़के ने कहा कि घबराओ मत, डरो नहीं कुछ नहीं होगा।
तुम चुप रहो जी! एक तो मेरी सहेलियाँ खो गई है और तुम हो कि मुझे नसीहत दिए चले जा रहे हो, मैंने उसे डाँटते हुए कहा।
वो हँसते हुए बोला, अच्छा! ये बात है चलो, मैं तुम्हें तुम्हारी सहेलियाँ ढुँढवा देता हूँ।
मैनें कहा, कोई जरूरत नहीं है, मैं ख़ुद ढूंढ लूँगीं।
तभी मेरी सहेलियाँ मुझे ढूँढते हुए आ पहुँची और उनमें से एक बोलीं___
तू इसके साथ गुलछर्रे उड़ा रही है और हम वहाँ तुझे ढूंढ ढूंढ कर परेशान हो गए, कौन है ये?
मैंने कहा, कोई नहीं है ये मेरा, मैं तो इसे जानती भी नहीं, बेवजह ही पीछे पड़ गया।
और हम सब मेले से चले आएं लेकिन जब मेरा ब्याह हुआ तो तब मुझे पता चला कि ये तो वही हैं जिनसे मेले में मेरी पहली मुलाकात हो चुकी है।
तो इसलिए कह रही हूँ कि कब कौन मन को भा जाए कह नहीं सकते, हो सकता है वही हमारा जीवनसाथी बन जाएं, शिवगामी जी बोली।
दादी! ये तो पुराने जमाने में होता था, अब ऐसा नहीं होता, अग्रणी बोली।
होता है बिटिया! प्यार तो सभी जमाने में ऐसा ही होता आया है्, शिवगामी जी बोलीं।
तभी अग्रणी बोली , मैं बाजार जाती हूँ, देर हो रही हैं।
अच्छा, ठीक है ले ये पैसे ले जा, जो तुझे पसंद आए तो खरीद लेना, शिवगामी जी बोलीं।
अग्रणी रिक्शे से बाजार पहुँची और उसने अपनी पसंद की साड़ी खरीदी, कुछ चूड़ियाँ और झुमके खरीदे, देर ह़ो रही थी , उसने अपना सामान समेटा और रोड पर आ गई, तभी उसने देखा कि एक लड़का पीछे पीछे चला आ रहा है, शायद ये लड़का अभी वहीं दुकान में मौजूद था, लफंगा कहीं का पीछा कर रहा है शायद, अग्रणी ने सोचा।
तभी अग्रणी ने रिक्शा रूकवाया और बैठने वाली थीं कि उस लड़के ने आवाज दी__
ठहरिए...जरा रुकिए....
अग्रणी रूक गई और जब वो करीब आया तो गुस्से से बोली....
क्यों ?मिस्टर! पीछा क्यों कर रहें हों?
जी आप गलत समझ रहीं हैं, ये आपका कुछ सामान आप दुकान में भूल आईं थीं तो दुकान वाले ने कहा कि आपको दे दूँ लेकिन आप तो तूफान मेल बन कर भागी जा रहीं हैं, उस लड़के ने कहा।
ओह....साँरी! थैंक्यू! जो आपको इतनी तकलीफ़ उठानी पड़ी, अग्रणी बोली।
कोई बात नहीं और इतना कहकर व़ो चला गया।
अग्रणी भी घर आ गई और दूसरे दिन रात के समय सब शादी में जाने के लिए तैयार हुए, अग्रणी ने लहँगा पहना जो वो वहीं से तैयार करवाकर लाई थी, कानों में बड़े बड़े झुमके डालकर और माथे पर बिन्दी लगाकर वो बहुत प्यारी लग रही थी, पराशर, नलिनी और शिवगामी सब उसे देखते ही रह गए क्योंकि उसने पहली बार लहँगा पहना था।
सब शादी में पहुँचे, शिवगामी जी ने उस लड़के की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये वही लड़का है, अग्रणी ने देखा तो बोली , मैं तो इससे मिल चुकी हूँ कल बाजार में, मेरा कुछ सामान छूट गया था, तो ये देने आया था।
अच्छा तो पहली मुलाकात हो चुकी है, लड़का पसंद है ना तुझे, शिवगामी जी ने पूछा।
और अग्रणी ने शरमाते हुए, अपना सिर नीचे झुका लिया।
समाप्त___

