पहचान हुनर से होती है
पहचान हुनर से होती है
"अरे तुम लेखिका बन गयी हो । तुम्हें अपना हुलिया भी वैसे ही रखना चाहिए । इतना सज -धज कर जाओगी तो ऐसा लगेगा कि कोई मॉडल रैंप वाक करने आयी है । अरुंधति घोष ,ममता कालिया ,अमृता प्रीतम आदि लेखिकाओं जैसा हुलिया बनाओ । लगना चाहिए कि तुम बुद्धिजीवी हो । ",बुक रीडिंग सेशन के लिए तैयार हुई रितु को ऊपर से नीचे तक देखते हुए उसकी नज़दीकी दोस्त शाम्भवी ने कहा ।
शाम्भवी ने अभी तक लेखिकाओं को अक्सर हैंडलूम साड़ी में ट्राइबल ज्वेलरी पहने हुए ही देखा था । हुलिए से देखते ही पहचाना जा सकता था कि ,"अमुक शख्शियत कोई लेखिका है । "
रितु देखने में काफी अच्छी थी और जब से उसने होश सम्हाला तब से ही वह बन -ठनकर रहती थी । उसे मेक -अप करके रखना पसंद था और उसे सजने-सँवरने में ज़रा भी आलस नहीं आता था । लेकिन उसके रिश्तेदारों को लगता था कि जो लड़की हमेशा साज -श्रृंगार में लगी रहती है और जो हमेशा इतना बन -ठनकर रहती है ;वह पढ़ाई -लिखाई में तो अच्छी हो ही नहीं सकती । उसके पड़ौस में रहने वाली ज्यादातर आंटी भी यही सोचती थी ।
हम कई रूढ़ धारणाओं के साथ जीते हैं और उनके विपरीत कुछ भी होता हुआ देखते हैं तो उसे स्वीकार नहीं का पाते । ऐसी ही एक"अरे तुम लेखिका बन गयी हो । तुम्हें अपना हुलिया भी वैसे ही रखना चाहिए । इतना सज -धज कर जाओगी तो ऐसा लगेगा कि कोई मॉडल रैंप वाक करने आयी है । अरुंधति घोष ,ममता कालिया ,अमृता प्रीतम आदि लेखिकाओं जैसा हुलिया बनाओ । लगना चाहिए कि तुम बुद्धिजीवी हो । ",बुक रीडिंग सेशन के लिए तैयार हुई रितु को ऊपर से नीचे तक देखते हुए उसकी नज़दीकी दोस्त शाम्भवी ने कहा ।
शाम्भवी ने अभी तक लेखिकाओं को अक्सर हैंडलूम साड़ी में ट्राइबल ज्वेलरी पहने हुए ही देखा था । हुलिए से देखते ही पहचाना जा सकता था कि ,"अमुक शख्शियत कोई लेखिका है । "
रितु देखने में काफी अच्छी थी और जब से उसने होश सम्हाला तब से ही वह बन -ठनकर रहती थी । उसे मेक -अप करके रखना पसंद था और उसे सजने-सँवरने में ज़रा भी आलस नहीं आता था । लेकिन उसके रिश्तेदारों को लगता था कि जो लड़की हमेशा साज -श्रृंगार में लगी रहती है और जो हमेशा इतना बन -ठनकर रहती है ;वह पढ़ाई -लिखाई में तो अच्छी हो ही नहीं सकती । उसके पड़ौस में रहने वाली ज्यादातर आंटी भी यही सोचती थी ।
हम कई रूढ़ धारणाओं के साथ जीते हैं और उनके विपरीत कुछ भी होता हुआ देखते हैं तो उसे स्वीकार नहीं का पाते । ऐसी ही एक रूढ़ धारणा है कि ,"खूबसूरत लड़कियों में दिमाग नहीं होता है । "
लेकिन रितु खूबसूरत होने के साथ -साथ बुद्धिमान भी थी । वह कई बार अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दे चुकी थी ;लेकिन फिर भी उसे हर बार यह साबित करना पड़ता था कि वह खूबसूरत ही नहीं बुद्धिमान भी है ।
उसे आज भी याद है कि जब उसके दसवीं बोर्ड में नब्बे प्रतिशत अंक आये थे तो उसकी बुआ को विश्वास ही नहीं हुआ था उनका कहना था कि जिस लड़की के दीदे हमेशा क्या पहनूँ और क्या न पहनूँ में लगे रहते हैं ;वह लड़की भला पढ़ाई -लिखाई में क्या ध्यान देगी ?"
बुआ का कहना था कि ,"रिजल्ट देखने में कोई गलती हुई है । " बुआ स्वयं उसके स्कूल में गयी थी और उसकी अंकतालिका देखकर आयी थी ।
स्कूल से आने के बाद भी उनका यही कहना था कि ,"रितु ,तेरे पापा ने बोर्ड में कोई सेटिंग की होगी । तेरे इतने नंबर आ ही नहीं सकते । "
हर जगह बदलाव आसान है ,लेकिन हम किसी के विचारों को नहीं बदल सकते हैं । रितु लगातार पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करती रही ,लेकिन उसकी बुआ हमेशा उसको लेकर शंकालु ही रही । कॉलेज के बाद रितु लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुई । आज उसके लिखे उपन्यास को पुरस्कार मिल रहा था और वह पुरस्कार लेने जा रही थी । आज उस समारोह में अपनी पुस्तक के कुछ अंश भी पढ़कर सुनाने थे ।
"शाम्भवी ,इंसान की पहचान उसके हुलिए से नहीं उसके हुनर से होती है । मैं क्या पहन रही हूँ ;उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि मैं क्या लिख रही हूँ । तू फ़िक्र मत कर । ",रितु ने कहा ।
रितु ने समारोह में जैसे ही अपने उपन्यास के अंश पढ़ना शुरू किया ;सभी श्रोताओं के कान केवल उसे ही सुन रहे थे । जैसे ही रितु ने बोलना बंद किया ,वैसे ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा । शाम्भवी को अपना जवाब मिल गया था । रितु ने सही कहा था कि ,"पहचान हुनर से होती है । "रूढ़ धारणा है कि ,"खूबसूरत लड़कियों में दिमाग नहीं होता है । "
लेकिन रितु खूबसूरत होने के साथ -साथ बुद्धिमान भी थी । वह कई बार अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दे चुकी थी ;लेकिन फिर भी उसे हर बार यह साबित करना पड़ता था कि वह खूबसूरत ही नहीं बुद्धिमान भी है ।
उसे आज भी याद है कि जब उसके दसवीं बोर्ड में नब्बे प्रतिशत अंक आये थे तो उसकी बुआ को विश्वास ही नहीं हुआ था उनका कहना था कि जिस लड़की के दीदे हमेशा क्या पहनूँ और क्या न पहनूँ में लगे रहते हैं ;वह लड़की भला पढ़ाई -लिखाई में क्या ध्यान देगी ?"
बुआ का कहना था कि ,"रिजल्ट देखने में कोई गलती हुई है । " बुआ स्वयं उसके स्कूल में गयी थी और उसकी अंकतालिका देखकर आयी थी ।
स्कूल से आने के बाद भी उनका यही कहना था कि ,"रितु,तेरे पापा ने बोर्ड में कोई सेटिंग की होगी । तेरे इतने नंबर आ ही नहीं सकते । "
हर जगह बदलाव आसान है ,लेकिन हम किसी के विचारों को नहीं बदल सकते हैं । रितु लगातार पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करती रही ,लेकिन उसकी बुआ हमेशा उसको लेकर शंकालु ही रही । कॉलेज के बाद रितु लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुई । आज उसके लिखे उपन्यास को पुरस्कार मिल रहा था और वह पुरस्कार लेने जा रही थी । आज उस समारोह में अपनी पुस्तक के कुछ अंश भी पढ़कर सुनाने थे ।
"शाम्भवी ,इंसान की पहचान उसके हुलिए से नहीं उसके हुनर से होती है । मैं क्या पहन रही हूँ ;उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है कि मैं क्या लिख रही हूँ । तू फ़िक्र मत कर । ",रितु ने कहा ।
रितु ने समारोह में जैसे ही अपने उपन्यास के अंश पढ़ना शुरू किया ;सभी श्रोताओं के कान केवल उसे ही सुन रहे थे । जैसे ही रितु ने बोलना बंद किया ,वैसे ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा । शाम्भवी को अपना जवाब मिल गया था । रितु ने सही कहा था कि ,"पहचान हुनर से होती है । "
