पारदर्शी हूँ मैं
पारदर्शी हूँ मैं
मैं नदी हूँ। बिल्कुल पारदर्शी साफ़ हल्की ताजगी की महक लिये हुऐ। नदी का अपना कोई रंग नहींं होता। नदी को तो अपने वजूद की भांती बस बहना है। समय से परे अनंत काल से बहती है नदी। नदी खामोश गवाह है, सदियों से अपने बदलते स्वरूप का। वो सब कुछ देखती है,खुद के साथ होते अत्याचार सहती है, प्रतिकार नहींं करती। फिर भी बहती रहती है निःशब्द और अपार। नदी की यही गाथा जब शब्दों में ढलती है तो यमुना नदी की व्यथा कथा सामने आती है।
दिल्ली और मेरा (यमुना) का नाता बहुत पुराना है। पौराणिक नदी यमुना ने जिस दिल्ली को जन्म दिया, उसके ही बाशिंदों ने यमुना को बदहाली की कगार पर पहुँचा दिया है।मै यमुना
यमुना अपने दर्द को शिद्दत से बयाँ करते २ रो देती है…
जिस नदी के किनारे श्रीकृष्ण ने बाल गोपालों के साथ बाललीला की, गोपियों के संग रासलीला की, जिस नदी के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा है, वही पौराणिक नदी यमुना आज सिसक रही है। इसके प्रदूषण का स्तर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। जिस नदी में कालिया नाग के होने की मिथकीय कथा है, उसमें मछलियों समेत तमाम जल-जीवों का अस्तित्व संकट में है। पौराणिक मान्यताओं में जिस नदी में आचमन मात्र कर लेने से सारे पाप धुल जाने का उल्लेख है, अब आलम यह है कि उसी नदी की गन्दगी को धोने की आवश्यकता आन पड़ी है। मैं धीरे -२ अपनी स्वच्छता खोकर नाले में तब्दील होती जा हूँ रोते हुऐ यमुना बोली।
यमुना के इस दर्द को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
मैं यमुना हूँ और जीना चाहती हूँ” मेरी यह दुर्दशा आम लोगों की जागरूकता की कमी के कारण हुई है। अभी पिछले दिनों छट-पूजा पर मैं कितनी बुरी लग रही थी मेरे स्वच्छ जल के स्थान पर मैंने दिल्ली वासियों द्वारा पहनाई गई गन्दगी और प्रदूषण से भरी साड़ी पहनी जो कैमिकल के प्रभाव से पूरी झाग जैसी सफ़ेद हो गई। त्योहार पर सज-सँवर कर लोग सुन्दर कपड़ों में सजते है उत्सव मनाते है। लेकिन मेरे साथ क्या किया इन लोगों ने सफ़ेद विधवा जैसी मैली -कुचैले रगं की साड़ी पहना दी। बिलख बिलख कर रोती यमुना सारे भारत-वासियों से गुहार लगा रही है, मैं मरना ( सूखना) नहीं चाहती, मुझे बचालो।
