Krishna Sinha

Romance


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Krishna Sinha

Romance


ऑफिस वाली लव स्टोरी

ऑफिस वाली लव स्टोरी

11 mins 205 11 mins 205

ऋतू टेबल पर बिखरी फाइल्स को समेट कर टेबल व्यवस्थित करने लगी। वैसे तो औपचारिक फ़ोन कर ही बुलाया था उसने 'अनु' को। प्यार से अनिमेष को अनु ही कहती थी वो। पर अनु उसके शहर में ही था ये सूचना मिलते ही उसके मन में प्रेम की सुषुप्त प्रायः तरंगे हिलोरे लेने लगी। जिसे सहज करने का असफल प्रयास करते हुए वह झटपट टेबल पर बिखरे पन्ने समेटने में लगी थी। टेबल व्यवस्थित होने पर भी जब अनु नहीं आया उसने असहजता महसूस की, दिवार घड़ी पर बरबस ही निगाह चली गयी। 1:20 हुए थे 10 मिनट में लंच होने वाला था, उसे नन्हे बेटे को संभालने भी जाना था। चेहरे पर चिंता की रेखा उभरी, फिर सोचा करने दो उसे भी थोड़ा इंतज़ार, आखिर letter लिए बिना तो वो जा नहीं सकता। फिर उससे बिछुड़ कर भी वो सामान्य है ऐसा मैसेज भी अनु तक पहुंच जायेगा। 

पांच मिनिट में ही वो घर पर थी। कानो में बेवजह ही परिचित सी रिंग टोन गूंजने लगी। फ़ोन उठाकर देखा कोई कॉल नहीं थी। बेमन से खाना खाया, बेटे को संभाला और तुरंत स्कूटी स्टार्ट कर पहुंच गयी ऑफिस। 

दिखाने को काम करने लगी, पर जो सहजता अनु को दिखाना चाहती थी, ना चाहकर भी वो सहजता चेहरे से विलुप्त हो रही थी, मन खिन्न सा होने लगा। 

अचानक उसके कदमो की आहट कानो में पड़ी, मन की नदी विस्तार पा सागर में तब्दील हो गयी। 

अनु उसके सामने खड़ा था। धड़कन इतनी तीव्र हो चुकी थी की लगा अनु को आवाज़ सुनाई ही ना दे जाये, पर अनु सहज था। उसने कार्यालय आदेश की प्रति अनु की ओर बढ़ा दी, "मेरी प्रतिनियुक्ति अपने ऑफिस से कैंसिल हो कर यही हो गयी है, इस माह का अंतिम वेतन तुम्हे बनाना है " बमुश्किल कहा ऋतू ने। अनु अकाउंटेंट जो था, उसने कागज हाथ में लिया, जल्द ही वेतन बनाने का आश्वासन दिया, और काम होने का कहकर जाने की औपचारिक इजाजत मांगी। वो चाहते हुए भी ना ना कर सकी। अनु चला गया सच में। लौटकर नहीं आया किसी बहाने से भी नहीं जैसे वो पहले आता था, जाते जाते एक बार फिर से उसकी झलक देखने। 

आज पांच बढ़ी ही मुश्किल से बजे, कानो में रिंगटोन गूंजती रही, की अनु उसे कॉल कर मिलने को कहेगा, पर ऐसा कुछ ना हुआ। 

घर पहुंचते ही उसका सब्र जवाब दे गया, उनसे अनु को कॉल किया, "कहाँ हो " इनता ही कह पायी। आवाज आयी " बस में ", | दिल धक् सा रह गया, अनु उससे बिना बात किये चला गया, उसे इतने दिनों बाद देखने पर भी उससे मिलने को बैचेन नहीं हुआ। उसका अनु इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है। 

वो अनु जो एक दिन उसकी आवाज़ नहीं सुनने पर बैचेन हो जाता था, बच्चों की तरह पाँव पीटकर मचलने लगता था। उसके छुट्टी पर होने पर ऑफिस से काम का बहाना कर उसके घर चला आता था, उसे रिझाने को बालो में डाई लगाता था, ब्लैक टीशर्ट पहनता था। वो अनु उससे मिले बिना वापस चला गया...... 

और वो पुरानी स्मृतियों में खो गयी, उसे याद आने लगा 15 dec. का वो दिन। अधिकारी उस दिन छुट्टी पर थे, पर आज एक ही रूम में बैठे, हमेशा चहकते से रहने वाले ऋतू अनु के बीच निस्तब्ध चुप्पी ने दुरी बना दी थी। ऋतू की प्रतिनियुक्ति की सुचना आयी थी, अपने छोटे बच्चे को लेकर वो चिंतित थी, सिंगल पेरेंट् होने के नाते उस पर दोहरी जिम्मेदारी थी, ट्रांसफर उसके अनुरोध पर ही हुआ था। दोनों चुप थे, समझदार जो थे, पर दोनों के जेहन में बस यही पंक्तियाँ गूंज रही थी। 

" इसी का नाम है जिंदगी, 

कुछ जिम्मेदारी पूरी, 

कुछ ख्वाहिशे अधूरी।"

अचानक उसके फ़ोन की घंटी बजी थी। कॉल रिसीव करते ही नन्हे बेटे की आवाज़ दर्द भरी आवाज़ गुंजी " मम्मीई जल्दी घर आ जाओ, मेरा पेट जोर से दुख रहा है "। वो तुरंत ऑफिस से बाहर भागी, उसकी पोस्टिंग घर से 30 km.दूर थी| अनु उसे जाते स्तब्ध सा देख रहा था, कुछ पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वो भी कहाँ कह सकी की मुझे घर छोड़ दो अनु, जबकि उसका अंतर चीख चीख कर यही कह रहा था। 

सिक्स लेन रोड बनने से ऑफिस की बिल्डिंग पुलिया के निचे गर्त में धंस गयी थी, जहाँ तक आने जाने को पुल के साइड में लोगो ने कच्चा रास्ता बना रखा था। 

ऋतू के कदम तेजी से उस ढलान पर चढने लगे, उस दिन साड़ी पहने होने से उसे चढ़ने में काफ़ी परेशानी हो रही थी, पर ममता के वशीभूत, असुविधा की परवाह किये बिना वो ऊपर चढ़ी। बेरीकेट्स को बमुश्किल पार किया। उसके दिल के जैसे दो टुकड़े हो गए थे, एक बेटे की तरफ तो दूसरा अनु की तरफ खिंच रहा था, जिसके साथ आज उसका आखिरी दिन था, कल से उसे दूसरे ऑफिस जाना था, जहाँ उसका अनु नहीं होगा। 

यह खिंचाव, यह तनाव उसके दिल से होते हुए सर तक पहुँच गया, दिमाग़ की नसे जैसे फटने लगी। सर दर्द होने लगा, उसे चक्कर से आने लगे। मन से बार आवाज़ आती रही अनु को बुला लो। पर वह अनसुना करती रही, सामने से आते ऑटो में बैठ गयी। ऑटो चल पड़ा, फ़ोन पर अब भी बेटे के रोने की आवाज़ आ रही थी" muuummy....जल्दी आओ, सुबुक.. सुबुक....। उसे ऑटो की धीमी गति बर्दाश्त नहीं हुई, बरबस ही अंगुलियां मोबाईल पर अनु को ढूढ़ने लगी, "अनु जल्दी आओ, बेटे की तबियत बहुत ख़राब है, ऑटो बहुत धीरे चल रहा है, मै ऑटो से उतर रही हूं।" " पर मेरा रजिस्टर तो घर है, शाम को class कैसे अटेंड करूँगा " अनु का जवाब था। " तुम कुछ भी करना पर अभी जल्दी आ जाओ, ऋतू सुबकने लगी थी। 

उसने ऑटो रुकवाया और उतर गयी, ऑटो मंथर गति से आगे बढ़ गया। हाईवे पर सूनापन पसर गया, अचानक वह बैचेन हो गयी, उसने बिना अनु का जवाब सुने इस सुनसान राह पर उतर कर कोई गलती तो नहीं कर दी..... 

सुनसान राह में ऋतू अकेली खड़ी थी, दिल में भीतर तक गड्ढा सा बैठ गया था, इतनी धूप में, हाईवे पर इस तरह अकेली खड़ी देख ट्रक वाला जाते हुए ना जाने क्या कह गया, डर के मारे वो सिहर गयी..... 

ये क्या किया उसने, बेटे के रोने की आवाज़ के साथ उसकी गूंगी चीत्कार मिल कर उसके दिमाग़ में भयावह सा शोर मचाने लगी थी। कोई ऑटो भी नहीं आ रहा था दूसरा, उसने उस छोर नज़र उठाने की हिम्मत जुटाई...... 

दूर बाइक पर कोई आता दिखाई दिया, अनु ही था वो, उसकी तीव्र होती धड़कनो ने जवाब दे दिया था, बाइक उसके पास रुकी, वो आहिस्ता से बिना कुछ कहे बैठ गयी, अनु ने भी कुछ नहीं कहा। बाइक ने तुरंत गति पकड़ ली। उसने फिर बेटे को फ़ोन लगाया, बेटा अब भी सुबकता हुआ कह रहा था " मम्मी, जल्दी आओ...... 

ऋतू कभी बेटू की आया को हिदायत देती की उसे हींग लगाओ, थपकी दो, कभी बेटे को पुचकारती, उसके दिल का टुकड़ा जैसे शरीर से बाहर निकलना चाह रहा था, वो रोना चाह रही थी, अनु की पीठ पर सर टिकाना चाहती थी पर कुछ उसे रोक रहा था, उससे पीड़ा सहन नहीं हो रही थी। 

अचानक उसके दाएं हाथ ने अनु के हाथ का स्पर्श महसूस किया। अनु ने उसका हाथ अपने सीने पर भींच लिया, वो एक हाथ से बाइक चला रहा था अब। शब्द अब भी नहीं उभरे दोनों के बीच, पर दोनों की ही आँखों की कोरें भीगी थी, उसने अपना सर सुकूँ से अनु की पीठ पर टिका दिया। 

बाइक हवा से बाते करने लगी, पंद्रह मिनिट में वे बस स्टॉप पर थे, जहाँ वो अपनी स्कूटी खड़ी कर बस में बैठती थी, अनु ने उसे ड्राप किया। "तुम घर पहुँचो, मै डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेकर पहुँचता हूं, स्थिति देखकर मुझे कॉल करना "। इतना कह अनु डॉक्टर के यहाँ चल दिया, उसने स्कूटी स्टार्ट की और लगभग उड़ती हुई घर पहुंची। 

बेटू घर पर सामान्य खड़ा था, राधा ने बताया हींग का पानी पीकर उसकी कब्ज़ की परेशानी दूर हो गयी, अब वो ठीक है। उसने बेटे को सीने से लगा लिया। दिल का एक हिस्सा सहज, शांत हो गया था। आँखों से आंसू बहने लगे, उसने आंसू पोंछने की कोशिश भी नहीं की। बेटा भी माँ से लिपट आश्वस्त हो सो गया। उसने बेटे को बिस्तर पर सुलाया, जब वह उससे अलग हुआ तो उसके दिल के दूसरे हिस्से पर फिर पीड़ा महसूस हुई। " अनु, घर आ जाओ, बेटा ठीक है अब " उसने कॉल कर बताया अनु को। 

10 मिनिट बाद अनु घर पर था, अनु के चेहरे पर तनाव आसानी से पढ़ा जा सकता था, वो कुर्सी पर बैठ नहीं पाया, सर पकड़कर बेटू के पास ही लेट गया। उसने बेटू की और देखा फिर अनु की ओर | उसका प्रेम कब वात्सल्य में बदल गया उसे समझ ही नहीं आया| 

उसने अनु के सर को अपनी गोद में रखा और चूम लिया, अनु भी खुद को रोक नहीं पाया और उसे बांहों की आगोश में ले सीने में छिपा लिया। सुकूँ का समंदर दोनों के दिलो में फ़ैल गया। और नींद ने उन्हें कब अपनी आगोश में ले लिया इसका गुमान दोनों को कहाँ था। 

कुछ पलो की वह नींद दोनों को जन्मो की शांति दे गयी, जब आँख खुली तो दोनों जैसे वास्तविकता की धरातल पर गिरे। पर वो सुकूँ नूर बनकर दोनों के चेहरे को दीप्त किये था। उसने अनु को पानी पिलाकर, चाय बनाई, वैसे अनु को उसके हाथ की चाय पसंद नहीं पर आज उसने चाय पिलाई और अनु को class के लिए विदा किया।...... 

अचानक उसकी तन्द्रा भंग हुई जैसे, अनु कही नहीं था, ये बीती बाते थी और आज का सच ये था की अनु उससे मिले बिना वापस जा चुका था। उसने निश्चय किया वो अनु से अब कभी बात नहीं करेंगी, उसका no.रिजेक्ट लिस्ट में डाल दिया। उसका अक्स उस पर ही हंस रहा था, जब अनु ने कॉल किया ही नहीं तो उसका no. रिजेक्ट लिस्ट में डालने से क्या होगा?  

उसे खुद पर खीज हुई, झुंझुलाहट भी, क्या वह किसी के जीवन में दूसरी स्त्री का दर्जा लेना चाहती है, अनु अब उसका नहीं था, उसकी शादी हो चुकी थी,और मना भी तो ऋतू ने ही किया था| दूसरी स्त्री होने के विचार मात्र ने खुद के प्रति घृणित सा भाव ऋतू के मन में पैदा किया। 

लेकिन अगले ही पल वो संयमित थी। नहीं, अनु के प्रति उसका प्रेम निष्कलंक, निश्छल और विशुद्ध प्रेम है बस वो सदैव उसके मन में रहेगा। उसने अनु का no. अपने फ़ोन से delete कर दिया। ना ही उसे कभी कॉल किया। 

दिन तो काम की व्यस्तता में फिर भी बीत जाता, पर रात को ज्यूही वह सोने जाती, उसका मन "अनु " में तब्दील हो जाता, वह खुद से घंटो बाते करती, और अनु का अक्स कभी कुर्सी खींच उसके सामने बैठ जाता, कभी उसके बगल में, कभी वो उसका हाथ पकड़ सडक पार कर रही होती, तो कभी नीलगाय से अनु को, खुद की तुलना करते पाती, (जैसा अनु ने एक बार नीलगाय के झुण्ड को देखकर कहा था, देखो अपनी मादा के पीछे कैसे घूम रहा है, मै भी अगले जन्म नील गाय बनूँगा और बिना डर, बिना शर्म तुम्हारे पीछे पीछे घूमूँगा ) उसके चेहरे पर बरबस ही स्मित मुस्कान आ जाती। 

कभी खेतो की पगडण्डी पर अनु के साथ खुदको घूमता पाती, तो कभी नदी में पानी उछालते, मस्ती करते, कभी हंसती तो कभी जोर जोर से रोने लगती, अनु उसके मन का पर्याय बन चुका था। पर सूरज की किरण के साथ ही वो सामान्य हो जाती, उसके भीतर का अनु तब सो जाता। 

पर आज जब उसे अनु के ऑफिस हेतु कोई लेटर डिस्पैच करना था तो स्वतः ही उसकी उँगलियाँ अपने लिखें अक्षरों को स्पर्श करने लगी, वो जानती थी उसका अनु दुनिया को दिखाने कितना ही निष्ठुर क्यों ना हो जाये, उसके हस्तलिखित पत्र देख उसे स्पर्श जरूर करेगा, वह भी उसे याद करेगा क्युकी विशुद्ध प्रेम एकतरफा हो ही नहीं सकता। 

18 तारीख हो चुकी थी, उसका वेतन अब तक नहीं बना था, ना ही उसने अनु को कॉल किया, ना अनु ने उसे। पर राधा को रुपयों की जरुरत थी, जब उसने ऋतू से मांगे तो उसे मजबूरन वेतन के लिए अनु को कॉल करना ही पड़ा। अनु अब भी औपचारिक ही था, शायद उससे ही डरता था, उसने तकनिकी समस्या के कारण वेतन ना बन पाना बताया, पर साथ ही आश्वस्त किया की वह कल ही कुछ रूपये उसके अकाउंट में डाल देगा। 

ऋतू ने फोन रखना चाहा पर अनु ने पूछ ही लिया आजकल कुछ लेटर मेरे ऑफिस के लिए तुम हाथ से लिखती हो ना जानबूझ कर, कंप्यूटर की बजाय.... 

चंद शब्दों ने सूरज बन दोनों के भीतर जमीं बर्फ पिघला दी। ऋतू ने स्वीकार किया की उन पत्रों को भेजते वक़्त उसने भी वही महसूस किया जो अनु ने पत्र पाकर किया, जबकि वे official letter थे, उसके शब्द कुछ ओर कहते थे और भावनाये कुछ और.... 

अनु ने पुरानी आदतानुसार फ़िल्मी गीत की पंक्तियाँ अपनी मीठी आवाज़ में गुनगुना दी 

" तेरे letter से तेरी महक महके..... ♥️♥️♥️"

वही सुरीली आवाज़ जिसे सुनकर वह झूम उठती थी, आज कितने दिनों बाद उसके कानो में पड़ी थी। उसके धड़कनो की गति बढ़ गयी। वो अनु से और बात नहीं कर पायी, उसने तुरंत फ़ोन काट दिया। लेकिन वो इस खूबसूरत पल में कैद हो जाना चाहती थी, हमेशा के लिए। उसने कस कर अपनी आँखे बंद कर ली, और महसूस किया जैसे वो अनु के बांहो के आगोश में उसके सीने से लिपट कर खड़ी है। अनु स्नेह से उसके माथे को सहला रहा है। उसके भीतर की कवयित्री जागृत हो गयी और उसकी स्वयं की लिखी पंक्तियाँ उसके जेहन में गूंज गयी।

" तुम हकीकत नहीं, 

एक एहसास हो प्यारा सा, 🥰

ये अब हमने जाना है.... 

तुम खुद भी जुदा ना कर सको, 

तुमसे अब हमें, 

बस तुमसे इतनी दूर चले जाना है।


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