Sandeep Murarka

Inspirational


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Sandeep Murarka

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निलाम्बर पीताम्बर

निलाम्बर पीताम्बर

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जन्म : 10 जनवरी 1823

जन्म स्थान: भंडरिया प्रखंड के चेमू-सनेया ग्राम, गढ़वा जिला, झारखण्ड

निधन: 28 मार्च 1859 में फाँसी दी गई 

मृत्यु स्थल : लेस्लीगंज, पलामू

पिता : चेमू सिंह 

जीवन परिचय - पीताम्बर साही और नीलाम्बर साही का जन्म झारखंड राज्य के गढवा जिला के चेमो-सनेया गांव में खरवार की उपजाति भोक्ता जाति में हुआ था। इनके पिता चेमू सिंह पराक्रमी जागीरदार थे। उनको व खरवार जाति को शांत रखा जा सके इसलिए अंग्रेजो ने उन्हें दो जागीर दी हुई थी, किन्तु चेमू सिंह का सम्बन्ध अंग्रेज सरकार से सदैव कड़वाहट भरा रहा। यहीं घर से ही दोनोँ भाइयों के मन में अंग्रेजो के विरुद्ध बीज पनपने लगा। नीलाम्बर के किशोरावस्था में पहुँचते-पहुँचते पिता चेमू सिंह की मृत्यु हो गयी थी और नीलाम्बर ने ही पीताम्बर को पाला। कुशाग्रबुद्धि के साथ साथ दोनोँ भाई पराक्रमी वीर एवं गुरिल्ला युद्ध’ में निपुण थे।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान- 1857 के विद्रोह के समय पीताम्बर रांची में थे, उन्होंने आन्दोलन को नजदीक से देखा और पलामू लौटकर अपने भाई निलाम्बर से देश की स्थिति पर गहन विमर्श किया। निलाम्बर पीताम्बर भाईयों ने पलामू में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की योजना तैयार की और उसी क्रम में स्थानीय खरवार, चेरो तथा भोगता समुदाय की जनजातियों को बड़े पैमाने पर संगठित किया। दोनोँ भाइयों के नेतृत्व में 21 अक्टूबर 1857 को चैनपुर, शाहपुर तथा लेस्लीगंज स्थित अंग्रेजों के कैंप पर आक्रमण कर दिया गया। इन्होंने नवम्बर, 1857 को ‘राजहरा कोयला कम्पनी’ पर हमला कर दिया, जिसके कारण अंग्रेज़ों को बहुत क्षति पहुँची। इनका संपर्क रांची के प्रमुख क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ शाही एवं पांडेय गणपत राय तथा बिहार के बाबू कुंवर सिंह से भी था।

जिससे घबराकर कमिश्नर डाल्टन मद्रास इंफेंट्री के 140 सैनिक, रामगढ़ घुड़सवार की छाेटी टुकड़ी तथा कुछ बंदुकचीयो के साथ 16 जनवरी 1858 काे पलामू आ गए एवं इनके आन्दोलन को कुचलने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया। परन्तु निलाम्बर पीताम्बर के नेतृत्व में ट्राइबल्स आंदोलनकारियों ने कर्नल डाल्टन जैसे दमनकारी अंग्रेज को छक्के छुड़ा दिए। डाल्टन ने 12 फरवरी काे चेमू-सेनया स्थित नीलांबर-पीतांबर के गढ़ सहित पूरे गांव में लूट-पाट कर सभी घराें काे जला दिया, इनके संपत्ति, मवेशियाें तथा जागीराें काे जब्त कर लिया और लाेहरदगा के तरफ बढ़ गया। जनवरी 1859 में कप्तान नेशन और लेफ्टीनेंट ग्राहम पलामू विद्रोह को दबाने में सक्रिय हो गए, साथ साथ ब्रिगेडियर डाेग्लाज एवं शाहाबाद की सीमा पर कर्नल टर्नर सक्रिय थे। अंग्रेज खरवार एवं चेरवा समुदाय के बीच फूट डालने में सफल रहे, लगातार चौतरफा हमलों से निलाम्बर पीताम्बर की शक्ति घटती चली गयी। जासूसाें की सूचना पर अंगरेजी सेना ने पलामू में आंदाेलन के सूत्रधार नीलांबर-पीतांबर काे एक संबंधी के यहां से गिरफ्तार कर लिया, फिर बिना मुकदमा चलाये ही 28 मार्च 1859 काे लेस्लीगंज में इन्हें सरेआम पहाड़ी गुफा के सामने आम के पेड़ पर फाँसी दे दी गयी।

सम्मान - वर्ष 2009 में इनके नाम पर झारखण्ड सरकार ने मेदिनीनगर डालटेनगंज में नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविद्यालय की स्थापना की है। झारखंड के रामगढ़ जिले के दुलमी प्रखंड इलाके में आसना टांड माथागोड़ा में, रांची के मोरहाबादी मैदान में , खलारी प्रखण्ड के बड़काटांड,लातेहार जिला में सदर थाना के कोने गांव एवं अन्य कई स्थानों पर अमर शहीद वीर नीलाम्बर-पीताम्बर की प्रतिमा स्थापित की गई है।


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