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Poonam Singh

Inspirational

4  

Poonam Singh

Inspirational

" नई राह"

" नई राह"

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"आ गई बिटिया ..? "


"हाँ माँ..!"


 "चल जल्दी मुँह हाथ धोकर खाना खा ले अभी अभी रोटियाँ सेंकी हैं गर्म ही होंगी । "


"कितनी बार कहा है माँ तेरी तबीयत ठीक नहीं रहती मै खाना बना लूँगी। तूने सबकुछ मुझे सिखा दिया है ना..! अपना ख्याल रखा कर।"

 "अच्छा ये तो बता जिस काम के लिए गई थी हुआ कि नहीं.. ?"


 "नहीं माँ ... आज भी घंटों बैठी रही पर मुझे मौका नहीं मिला। " कहते हुए नैना के चेहरे पर गहरी निराशा के भाव थे , " क्षमा करना माँ... कहना तो नहीं चाहिए .. पर मुझसे कम प्रतिभा वालों को वहाँ अवसर मिला पर मुझे नहीं। "


" मेरी बात मान तू कब तक इस प्रकार भटकती रहेगी ? किसी और गुरु के द्वार क्यों नहीं खटखटाती ? "


"नहीं माँ मुझे नहीं लगता उन जैसा कोई संगीत मर्मज्ञ है। गुरु के रूप में मुझे उन्हीं की शरण में सीखना है । ...कल फिर, एक बार कोशिश करूंगी , कल फिर जाऊँगी मैं।


अगले दिन नैना बाहर निकलते हुए बोली , "माँ.. किवाड़ लगा ले शाम तक आ जाऊंँगी।" 


" हे कृपा सिंधु ! नैना की मदद करना..।" माँ ने प्रार्थना करते हुए नैना को विदा किया।


धूप दीप का समय हो गया लेकिन नैना अभी तक आई नहीं..। माँ सोच ही रही थी कि तभी नैना पहुँच गई । 

"आ गई बिटिया ! बड़ी देर लगा दी.. ! "


"हाँ माँ..."

नैना ने अपना थैला माँ को पकड़ाते हुए कहा।


माँ ने नैना के हाथ से थैला लेकर खुटी में टाँगते हुए कहा .." इसमें कितना समान भर रखा है..! उतना ही रखा कर जितनी जरूरत हो।"


"हाँ माँ... तू ठीक कहती है।"


 " क्या हुआ तेरी आवाज भराई हुई क्यों है ..? " माँ ने नैना की ओर मुखातिब हो चिंतित स्वर में पूछा..!


"तू चिंता ना कर माँ.. कल से अब देर भी नहीं होगी।" कहते हुए नैना का गला रूंध गया और झील भरी आँखों से टप टप आँसू गिरने लगे ।

 "धीरज रख नैना माँ शारदे ही तेरा मार्गदर्शन करेंगी।"


 " पर मुझे समझ नहीं आता नैना... तुझे तो अनेकों संगीत स्पर्धा में पुरस्कार से सम्मानित किया गया है ... फिर भी उनकी पारखी नजर तेरी कला को परख नहीं पाई.. ? "मां ने थोड़ी गंभीर मुद्रा में कहा..।


 " मालूम नहीं मां ! शायद... मेरे वेशभूषा को देखकर उन्होंने कुछ अनुमान लगा लिया हो।"


 कुछ पल खामोशी के पश्चात नैना ने कहा,

 "मैंने सोच लिया है माँ ..! कि मुझे क्या करना है ।"


अगले दिन नैना तैयार होकर बाहर जाने के लिए निकली..।

"अरे संभल के नैना.. अभी गिर जाती तो ....? " कहते हुए माँ ने उसकी तरफ उसकी लाल सफेद छड़ी बढ़ाई।

हाथों से टटोलकर छड़ी वापस अपनी माँ की तरफ बढ़ाते हुए नैना बोली , "अब मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है माँ ! मैंने अब तय कर लिया है। मैं एकलव्य बन कर दिखाऊँगी ! " 

कहते हुए नैना ने अपने कदम आगे बढ़ा दिए और वो एक नई राह पर निकल पड़ी।

उसकी आँखों में दृढ़ संकल्प और चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास झलक रहा था ....।



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