नहीं चाहिए ऐसा मायका
नहीं चाहिए ऐसा मायका
शान्ति देवी के दो बेटे हैं, रवि और सूरज और एक बेटी किरण। शांति देवी के पति ने मरने से पहले अपनी संपत्ति शांति जी के नाम कर दी थी। दोनों बेटों की शादी हो गयी और बेटी भी अपने ससुराल खुश है।
दोनों बेटों की शादी के बाद आये दिन दोनों बहुओं सुमन और सपना में लड़ाई होती रहती। कभी घर के काम को लेकर कभी बिना बात ही। दोनों बहुओं के बीच शांति जी फंस जाती। क्योंकि दोनों में कोई भी झुकने को तैयार नहीं होती, ना शांति जी की बात मानतीं।
ऐसा देखते हुए शांति जी ने अपने तीनों बच्चों में घर का बंटवारा कर दिया। ऊपर वाला हिस्सा बड़े बेटे को नीचे वाला छोटे को। शांति जी की बेटी किरण ने अपना हिस्सा लेने से मना कर दिया। किरण नहीं चाहती थी कि भाई भाभी से रिश्ता खराब हो। अब बात आई शांति जी किस बेटे के पास रहेगी। यह तय हुआ एक महीना बड़े बेटे के पास, एक महीना छोटे बेटे के पास। ऐसे हर महीने अदल बदल होती रहेगी।
शांति जी आज खुद को बहुत अहसाय महसूस कर रही थी। कभी सोचा नहीं था उम्र के इस पड़ाव पर ऐसे जिंदगी बितानी पड़ेगी। सबसे पहले महीने बड़ी बहू के पास रहने आई। शुरू शुरू में तो सब सही चल रहा था लेकिन 15 दिन बीतने के बाद बस महीना खतम होने का इंतजार करती। बातों बातों में बड़ी बहू जली कटी भी सुना देती।
अगले महीने छोटी बहू के घर रहने आई। घर में घुसते ही समझ आ गया कि शांति जी के आने से कोई खुश नहीं है। बस जैसे तैसे महीना खतम होने की प्राथना करते हैं। शांति जी सोचती मैंने ही इन दोनों बेटों को घर मकान दिए, गहने दिए, अपना जीवन दिया, लेकिन आज इनके पास मेरे लिए मेरे घर में जगह नहीं है, शायद संस्कार नहीं दे पायी।
किरण कई दिनो से परेशान थी, एक हफ्ता हो गया माँ से बात नहीं हो पायी। भाभी को फोन करती तो बहाने बना देती लेकिन माँ से बात नहीं कराती। किरण ने मायके जाकर ही माँ से मिलने की सोची। किरण मायके गयी, देखा माँ सो रही है। पास जाके माँ को छुआ तो पता चला कि माँ को बुखार है।
"क्या हुआ माँ, इतनी कमजोर लग रही हो और कितनी तेज बुखार है तुम्हें! डॉक्टर को दिखाया है या नहीं ? दवाई लेती हो ?
"अरे ननद जी हम क्यूँ दिखाए डॉक्टर को ? 2 दिन रहे हैं इस महीने को पूरे होने में, बड़े भैया के घर जाके दिखा लेना। अब सब खर्चा हम ही करें क्या ?"
"कैसी बात कर रही हो भाभी ? आपकी अपनी माँ होती तो मरने छोड़ देती क्या ? आप से क्या बात करनी ?"
बड़ी भाभी को नीचे बुला कर किरण ने पूछा "भाभी आपको तो पता है कितने दिनों से माँ बुखार में तप रही हैं, आपने उनका इलाज नहीं कराया ? ऐसे भी क्या रिश्ते!"
"सुनो ननद रानी, अभी देवरानी के घर का महीना चल रहा है। तो इस महीने के खर्चे की जिम्मेदारी देवर जी पर है। जब तक माँ जी ठीक नहीं हो जाती मैं अपने घर नहीं ले जाउंगी।"
"कैसे हो गए हो आप सब ? भैया आप दोनों भी चुप हो !"
"सुन किरण, अब तू भी सुन ले या तो तू बड़े भैया के घर जाएगी या हमारे घर। दोनों के बीच में तुझे भी चुनाव करना होगा।"
"तो सुनो भैया ना मैं आप के घर आना चाहती हूं ना बड़े भाई के। रिश्तों का बंटवारा करना मेरे संस्कार नहीं हैं। और मैं माँ को भी आप दोनों के भरोसे नहीं छोड़ सकती, मैं माँ को अपने घर ले जाउंगी।"
"सोच ले किरण, अगर आज तू माँ को यहां से ले गयी तो तो तेरे और माँ के लिए हमारे घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जायेंगे। सोच लेना तेरा मायका नहीं है। अपने ससुराल में क्या कहेगी जब कोई तीज त्योहारों में तेरे भाई भाभी नहीं आयेगें, तेरा ही अपमान होगा।"
"मेरा मायका मेरी माँ से है। जहां मेरी माँ के लिए जगह नहीं उनका सम्मान नहीं ऐसे भाईयों के घर तो मैं पैर भी ना रखूं। मेरे ससुराल वाले बहुत समझदार और भले लोग हैं। वो मुझे जरूर समझेंगे और आप जैसे भाई भाभी का साया तीज त्योहारों पर ना ही पड़े तो बेहतर है। वक्त बताएगा सम्मान अपमान की बातें, आपके बच्चे भी कभी बड़े होंगे।"
किरण अपनी माँ को अपने साथ लिए हमेशा के लिए मायके को अलविदा कह दिया। क्या किरण ने सही किया ? क्या माँ पिता से बढ़ कर मायका होता है ? आपकी क्या राय है।
