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Sudha Adesh

Abstract

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Sudha Adesh

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मत खेलो खून की होली

मत खेलो खून की होली

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नफ़रत की ज्वाला में 

क्यों जलता मानव मन

इंसान हो इंसान ही बने रहो

मत खेलो ख़ून की होली।


खुदा ने रचा हरा भरा चमन

कोयलिया कूके डाली-डाली,  

छोड़ो मनोमालिन्य

मत खेलो खून की होली।


इंसा है तो है गुलशन

गुलशन नहीं तो तुम नहीं 

काश ! समझ पाते यह बात

मत खेलो ख़ून की होली।


ज़माने की रेत पर 

अपने निशाँ तो छोड़ो

आत्मघाती बम बन, 

गुमनामी के अंधेरों न खोओ,

मत खेलो ख़ून की होली।


तुम जागोगे तो मानवता जी उठेगी

खेलो ख़ूब खेलो रंगों

प्यार की होली

पर मत खेलो खून की होली।


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