Mitali Mishra

Drama


4.4  

Mitali Mishra

Drama


मनोरमा

मनोरमा

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ज़िन्दगी उस वक्त बेकार सी लगने लगती है जब अपनों का साथ छुट जाता है। अकेलेपन के उस एहसास को मनोरमा(काल्पनिक नाम) बखुबी महसूस कर रही थी।उसे तब कहां पता था कि उसके जिंदगी में कभी ऐसा वक्त भी आएगा जब कोई अपना कहने वाला उसके करीब नहीं होगा।बिते वक्त के साथ-साथ मनोरमा और बुढ़ी हो रही थी परन्तु मन की आश अब तक टुटी नहीं थी, तभी तो रोज अपने रुम के बालकोनी से नजरें एक टक निचे मुख्य द्वार पर लगाये रहती, और इस उम्मीद में रहती कि किसी दिन उससे मिलने भी कोई अपना जरुर आएगा, और इस उम्मीद के दामन को पकड़ कर मनोरमा अक्सर अपने अतित को याद करती रहती, जिसके सहारे वो अपनी जींदगी के बाकी हिस्से को गुजार रही है। मनोरमा आज भी बिते वक्त के लम्हो को याद करती है कि कैसे उसने एक खुशहाल परिवार कि शुरुआत की थी, मनोरमा उस वक्त दिल्ली में रहा करती थी, और उसके पति वही बैंक में कार्यरत थे। मनोरमा तीन बच्चों की मां थी और इस तरह मनोरमा अपनी जिंंदगी को हंसी खुशी से गुजार रही थी।

धीरे-धीरे वक्त बितता गया और इस तरह मनोरमा के बच्चे अब शादी योग्य हो ग‌ए थे।मनोरमा अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए अपने तीनों बच्चों की शादी करा दिया, अब मनोरमा अपनी जिंदगी के बाकी हिस्से अपने पति के साथ व्यतीत कर रही थी, कि एक दिन अचानक उसके पति का देहांत हो गया। मनोरमा अब बिल्कुल अकेली सी हो गई थी। अकेलेपन का एहसास मनोरमा को उस वक्त भी हुआ था जब सारे बच्चे पढ़ लिख कर, शादी कर अपना-अपना घर बसाने निकल पड़े थे, पर आज का अकेलापन मनोरमा को ज्यादा परेशान कर रहा था क्योंकि उस वक्त तो उसके पति ने उसका साथ दिया था अकेलेपन को दूर करने में परन्तु आज मनोरमा बिल्कुल अकेली, असहाय महसूस कर रही थी, क्युंकि वो जो उनके बच्चे थे, जिसे अपने जान से भीी ज्यादा प्यार किया था, जिसके एक-एक ख्वाब को पूरा करने में अपनी पुरी जिंदगी लगा दी,

जिसके सपने पुरे करने के लिए अपने सपने अधूरे छोड़ दिए वो बच्चे आज कहीं नजर नहीं आ रहे थे मनोरमा को, वो अपनी आशुं खुद पोंछ रही थी, अपने अकेलेपन से खुद लड़ रही थी।इतना सब होने के बाद भी मनोरमा नाउम्मीद कभी नहीं हुई उसका भरोसा कभी टुटा ही नहीं तभी तो अपने बनाए सपनों के आशियाना से कब वो वृद्धाआश्रम कि मेहमान बन गई उसे पता ही नहीं चला।और इस तरह

मनोरमा आज वृद्धाआश्रम में अपनी जिंदगी गुजार रही है। जहां न कोई अपना कहने वाला कोई अपना है, ना ही वो घर का आंगन है जहां की खिलखिलाती धुप में कभी मनोरमा अपने बच्चों के साथ बैठा करती, अब तो बस मनोरमा के साथ कुछ बची हुई उम्मीद है जिसे वो शायद जान बुझ कर खत्म नहीं करना चाहती है, क्युकि वो अपने परवरिश पर शर्मींदा महसूस नहीं करना चाहती।आज मनोरमा जैसे कितनी मां है जो समाज के इस विडंबना से जुझ रही है, अतीत के पन्नों को पलट कर होंठों पर मुस्कान तो ला रही है पर कहीं ना कहीं अपने वर्तमान और भविष्य कि चिंता और दर्द आंखों से बयां कर रही है।


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