Husan Ara

Inspirational


5.0  

Husan Ara

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ममता

ममता

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रात का समय था रोहित गाड़ी को पूरी तेज़ी से भगा रहा था। जंगल के इलाके से गुजरता हुआ वह जल्दी ही किसी होटल पर जाकर रुकना चाहता था।


"मैंने आपसे कितनी बार कहा है कि रात में सफर मत किया करो। देखो रात का एक बजे चुका है ।" गोद मे दो महीने का बच्चा लिए सविता रोहित पर गुस्सा कर रही थी।


अरे , आगे किसी होटल में रात गुज़ार लेंगे । सुबह में चलेंगे फिर। सविता को समझाने के लिए रोहित बोल पड़ा था।


कुछ दूर एक गाँव मे वे दोनों गाड़ी से उतरे कि कोई मिल जाए जो बता सके कि कोई होटल है या नही यहाँ। मगर सारा गांव मानो सो चुका था।

पास के एक मंदिर में जाकर रोहित किसी को ढूंढने की कोशिश कर रहा था। मगर पुजारी जी वहाँ या तो थे नही या सो चुके थे।

तभी मंदिर की सीढ़ियों पर से किसी बच्चे की रोने की आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा। वह सविता को लेकर वहाँ पहुंचा।

ये तो कोई नवजात थी जिसे बेटी होने के कारण शायद कोई छोड़ गया था।

सविता उसे इस हालत में छोड़कर जाना नही चाहती थी। और न ही उसे साथ ले जा सकती थी क्या पता उसकी मां उसे ढूंढती घूम रही हो।


मगर आसपास कोई भी नही था कहाँ जाए किसका दरवाज़ा खटखटाए?


वह उस बच्ची को लेकर कार में आ बैठी, बेटा रोहित को पकड़ाया ।

बैग से अपने बेटे के कपड़े निकालकर उसे पहनाए। मगर वह शायद भूखी थी रोये ही जा रही थी। कोई चारा न पाकर अपना दूध पिलाकर उसकी जान बचाई।


सुबह सुबह एक औरत रोती हुई वहां पहुंची। उस समय सविता और रोहित पुजारी जी से उस बच्ची के विषय में पूछ ही रहे थे कि वह औरत गिड़गिड़ाती हुई पूछने लगी कि किसी ने उसकी बच्ची को देखा क्या?


इतने अच्छे कपड़ो में मुस्कुराती हुई बच्ची को देखकर वह पहचान ही न पाई थी कि यही उसकी बेटी थी।


सच जानने के बाद उसका सब दुख दर्द जैसे गायब हो चुका था। वह तो यही सोचकर इस हालत में घर से भागी थी कि क्या पता अब भी कुछ सांस बच्ची में बाकी हों। वरना वह चलने की हालत में भी नही थी।


"जिस बच्ची को उसके बाप ने भी अपनाने से मना कर दिया , आपने उस अभागी बच्ची पर ममता कैसे दिखाई? आप तो यहां के हैं भी नहीं मैं आपका एहसान कैसे उतारूँ। कैसे आपकी ममता का बदला अदा करू।" रोते रोते वह औरत बोले जा रही थी।


सविता उसे समझाते हुए बोल पड़ी " बहन पूरी दुनिया एक परिवार के समान ही तो है। जब ईश्वर ने हमें बनाने में कोई फर्क नही किया , तो हम कौन होते हैं एक दूसरे को अलग -अलग समझने वाले। हमारे परिवार में यदि किसी को हमारी ज़रूरत होगी तो क्या उस समय भी हम स्वार्थ की भावना दर्शायेंगे? मेरी ममता कोई एहसान नही बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम की जीती जागती तस्वीर थी।



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