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महत्वकांक्षा

महत्वकांक्षा

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कृति बेटा ......

आवाज़ सुनते ही सुकृति चौंक कर बैठ जाती है ..आज ये फ़ोन के अलार्म के बजाय ये माँ की आवाज़ कैसे ??फिर उसे याद आता है ओह !मैं तो घर पर हूँ माँ ,पापा के पास और खो गई वो अपनी पिछली यादों में .....

एक मध्यवर्गीय परिवार विजय नीता उनके घर तीन पीढ़ियों बाद बिटिया ने जन्म लिया पति पत्नी के ख़ुशी का ठिकाना नहीं ,उन्होंने सोच लिया हम अपनी बिटिया को बहुत प्यार से पालेंगे हर वो सुविधा देंगे जो लोग लड़कों को देते हैं ख़ूब पढ़ाये लिखाएँगे !ऐसे ही बहुत लाड़ प्यार में बड़ी होने लगी वो ,बहुत लाड़ में थोड़ी जिद्दी भी हो गई !उस शहर से बारहवीं पास करने के बाद उसने जिद पकड़ ली की दिल्ली से ग्रेजुएशन करेगी पढ़ने में काफ़ी अच्छी थी माता पिता भी तैयार हो गए की भविष्य में अच्छा होगा की अपने पैरों पर खड़ी होगी !वो भी हो गया ,जैसे रिश्तेदारों और छोटे शहरों में पड़ोसियों को ज्यादा चिन्ता हो जाती है की शादी नहीं करोगे क्या बेटी की !लोगों की बातें सुनते नीता और विजय जी के दिमाग़ में आने लगा की शादी कर देना चाहिए आगे जो करना होगा अच्छे घर जाएगी तो वहाँ से भी कर सकती है क्योंकि वो सुन्दर और जहीन थी तो रिश्तेदारियों में कई लोग शादी के लिए जिक्र करते ,उन्होंने सुकृति को कहा बेटा अब शादी कर दे वहीं करेंगे जो तुम्हें पसंद आये और आगे पढ़ने भी दे लेकिन सुकृति बिलकुल नाराज़ हो गई की आप लोग भी वही कर रहे हैं जो सब करते हैं मुझे बिलकुल अभी शादी नहीं करनी शादी में पैसा खर्च करेंगे वो मुझे एम .बी .ए .करने के लिए दीजिये मैं अपने पैरों पर खड़े हुए बिना शादी नहीं करुँगी ,क्या करते उन्हें मानना ही पड़ा !

एम बी ए के लिए चयनित होने वाला टेस्ट पास कर लिया और अच्छा कॉलेज भी मिल गया उसको सिम्बायोसिस पुणे चली गई वो पढ़ने हाँलाकि की कुछ लोन भी लेना पड़ा विजय जी को लेकिन कोई ज्यादा मुश्किल नहीं था !एम बी ए पूरा होने साथ कैम्पस सलेक्शन से नौकरी भी मिल गई उसे ज्वाइन कर लिया मुम्बई में ,अब माता पिता शादियाँ देखने लगे सुकृति को कोई पसंद ही न आये और वो भी थोड़ी महत्वकांछी हो चली थी सारा ध्यान कॅरियर पर जबकि कुछ तो ग़लत उसको सहन करना ही पड़ रहा था ऑफिस में सहयोगियों की अंदर तक चुभती निगाहें ,बॉस का बुलाकर बगल में खड़ा करना किसी बहाने हाथ पकड़ लेना कभी बातें करते करते कंधे पर जानबूझकर हाथ रख देना ,लेकिन लड़कियों को तुरन्त पता चल जाता है की कौन कैसे देख रहा है या हाथ भी छुआ तो ये सब वो सहन कर रही थी तो सोचती की शादी हो जाये तो शायद नज़रें बदल जाएं लोगों की पर समस्या यही की हर लड़के में सबकुछ अपने हिसाब से ही देखती और मना कर देती ऐसे ही दो साल निकल गए वो कम्पनी छोड़ और अच्छी मल्टीनेशनल कम्पनी में और ऊपर जॉब हो गई ,अब तक दो और लड़कियों के साथ पी जी .में थी लेकिन अब उसने छोटा सा फ़्लैट ले लिया अकेले और शाम को खाना बनाने और सफ़ाई वग़ैरह के काम के लिए मेड रख लिया !

शादी के लिए इतना मना किया की माँ बाप परेशान हो गए उन्होंने कहा तुम्हीं कोई पसंद कर लो हम कर दें क्योंकि उन्हें तो अब दबी जबान में लोग कहने लग गए की बेटी की शादी न करके उसकी कमाई खा रहे हैं और वो शर्म से पानी पानी हो जाते ,लेकिन सुकृति बोलती मेरे पास इतना समय नहीं है की मैं लड़का देखूँ !

समय निकलता रहा सुकृति अपने काम में व्यस्त और लौट के आती तो खाना खा के धड़ाम से सो जाती माँ से भी अब छुट्टी के दिन बात हो पाती कभी थोड़ी बहुत तबियत ख़राब हुई छुट्टी ले लिया खाने वगैरह के लिए फ़ोन से आर्डर कर लिया !धीरे धीरे अब उसकी आदत हो गई अकेले अपनी मर्ज़ी और बिना किसी बंधन के रहने की उसने घर में भी कह दिया मुझे नहीं करनी शादी मैं बंधन में रहना नहीं चाहती पैंतीस साल से ज्यादा की हो चुकी थी वैसे ही लड़के नहीं मिल रहे थे ऊपर सुकृति ने मना कर दिया विजय जी और नीता बहुत दुखी हो गए ,ये इतनी व्यस्त हो गई की बड़ी मुश्किल से बात होती उससे उसका वेतन भी बहुत अच्छा हो गया था अच्छा फ़्लैट उसने किश्तों पर खरीद लिया था माँ बाप को बोला भी की आप लोग यहीं रहिये लेकिन वो राज़ी नहीं हुए एक तो नाराज़ दूसरे अपनी जड़ें छोड़ना उन्हें नहीं मंजूर था !

सुकृति चालीस के करीब हो गई और इसबार बहुत ज्यादा बीमार पड़ गई बुख़ार में तपती हुई अब उसे समझ में आने लगा की काश उसका एक परिवार होता उसकी तकलीफ समझता उसका ख्याल रखता जैसे माँ करती और अगर माँ के पास ही होती तो भी माँ के गोद में सिर रखकर कितनी तसल्ली मिलती ,आखिर माँ बाप को दुखी करके शादी न करके क्या मिला मुझे पैसा ?इसके अलावा एक साथी भी तो नहीं मिला जिससे दुःख सुख में वो बात भी करे और अचानक उसे बहुत तेज रोना आया और ख़ूब रोइ माँ को फोन लगाया बस इतना निकला मुँह से माँ आ जाओ ....आगे के शब्द उसके रोने से रुँध गए !दूसरे दिन घबरा कर दोनों भाग कर आये सुकृति दोनों से लिपट कर ख़ूब रोइ कुछ सामान्य हुई तो बोली आपलोगों का बहुत दिल दुखाया मैंने अब आप जो कहिये मैं वही करुँगी लेकिन आपलोगों के प्यार बिना नहीं रह सकती ,नीता ने उसे पुचकारते हुए कहा ठीक हो जा बेटा फिर जो करना होगा करेंगे !दो तीन दिन में तबियत हल्की हुई तो नीता पन्द्रह दिन की छुट्टी लेने को कहकर घर ले आई उसे और एक छोटी बच्ची की तरह उसकी देखभाल कर रही थी !!

अब मुस्कुराते हुए सुकृति उठी और माँ के पास जाकर लिपट गई आँखे नम हो गईं समझ चुकी थी की बंधन और एक परिवार का क्या महत्त्व है !



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