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Savita Singh

Children Stories


4.8  

Savita Singh

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कुछ यादें मेरे बचपन की

कुछ यादें मेरे बचपन की

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बचपन के दिन भुला न देना, आज हँसे कल रुला न देना भाग ४

शाम का समय एक इंसान बहुत सुन्दर गोरा चिट्टा लंबा चौड़ा चारपाई पर तकिये पर कुहनी लगाए आधा लेटा हाथ में उपन्यास और एक लड़की आठ नौ साल की पीठ की तरफ़ बैठी लेटे हुए इंसान के कभी बालों में खुजली करती कभी पीठ में खुजली करती कभी हाथ वाला पंखा झलती और धीरे धीरे कुछ बोलती भी जाती, कि कोई और न सुने और वो कभी बोलते हूँ कभी हाँ कभी अच्छा !

तब तक भाइयों का प्रवेश होता है, ये मैं और मेरे पिताजी थे, भाई बोलते हुए ही आते पिताजी ! ये यहाँ चापलूसी कर के क्या पढ़ा रही है, आपको जरूर हम लोगों के साथ शिकार पर जाने के लिए पटा रही होगी। इसको नहीं ले जाया जायेगा, सब भगा देती है शोर करके ! तब बोले पिताजी तो क्या हुआ, ले चलेंगे, तुम लोग चुप रहो। उधर अम्मा गुस्सा हो रही थी कि इसको आप बिगाड़ रहे हैं, लेकिन पिताजी की हाँ तो हाँ !

दरअसल मैंने पहले ही भाई लोगों को पिताजी से बात करते सुन लिया था कि कल शिकार पर चलेंगे, तो मुझे खलबली मची थी और मैं पिताजी को मना रही थी, मेरे पिताजी को कोई बालों में धीरे धीरे खुजली करे तो बहुत अच्छा लगता था मैं अक्सर करती !

ख़ैर ! दूसरे दिन गए हम सब शिकार पर दूर दूर तक जंगल झाड़ियों में, तीतर, बटेर, पनडुब्बी या जंगली खरगोश और धनेच मिल जाती वही लाते लोग और उस समय तक मुझे तो केवल एयरगन ही चलाने को मिलती। वो भी निशाना सही नहीं लगता दूसरी बंदूकें तो पिताजी बोलते जब सँभालने लायक और उसका धक्का खाने लायक हो जाना तब सब सिखाऊंगा और उन्होंने सिखाया भी बाद में दो नाली और मज़िल लोडिंग (इस बन्दूक की नली बड़ी लंबी और मोटी होती थी। इसमें बारूद छर्रें सब एक लोहे की रॉड सी होती थी आगे एक गोल सा बना होता था उसी से ख़ूब ठोंक ठोंक कर भरा जाता था और ये झुण्ड पर फायर करने के काम आता था क्योंकि उससे सिर्फ एक फायर होता था) भी चलवाया मुझसे वो तो मैं नवीं क्लास में पहुँच गई तब सिखाया क्योंकि धक्का भी उसका बहुत तेज़ होता था !ऐसी वाली बन्दुक का तो शायद बहुतलोगों ने नाम भी नहीं सुना होगा क्योंकि अब ये कहीँ मिउज़ियम में भले दिख जाये !

हम सब लौट के आते तो हाथ मुँह साफ़ कर थोड़ा आराम कर आँगन में चारपाइयाँ लगती क्योंकि आँगन बहुत बड़ा था सबकी चारपाई आ जाती थीपिताजी मझले बाबा को बोलते कक्का आज होई जाय कुछ क्योंकि मेरे मझले बाबा हारमुनियम और ढोलक बहुत अच्छा बजाते थे तो जाहिर है कि गाते भी थे तो रात देर तक हम सब गाते बजाते जिसे जो आता और बीच में चुपके से जुगनू पकड़ लाना यही सब मौज मस्ती चलती गाँव में !

कुछ दिन होते तो फिर मानो मेरे सर पर पहाड़ टूट पड़ता छोटी बुआ के आने की ख़बर से (मेरी छोटी बुआ की दोनों बेटियां लखनऊ में हीहै मेरी फ़ेसबुक दोस्त भी हैं परमिशन ले लिया है तब लिख रही हूँ )क्योंकि बुआ थीं तो बहुत मज़ाकिया जीवंतता से परिपूर्ण लेकिन मुझे बहुत डाँटती थीं मेरी हरकतों की वज़ह से और मेरी दीदी मंजू नाम था बड़ी इंदिरा उन लोगों को ज्यादा प्यार करती वो !

जब बुआ आ जाती तो मेरी मस्ती बंद फिर वही दरवाज़े के बरगद तक ! और दोपहर में जहाँ मैं दबे पाँव निकलने की कोशिश करती बुआ की कड़क आवाज़ --हरे सरितवा कहाँ निकरिउ तू ? चल भीतर ,पिताजी मान लिया कहते भी की जाय दे बच्चिया (हमारे यहाँ पहले लड़कियों को नाम लेकर नहीं बुलाते थे शादी के बाद तो एकदम नहीं ) लेकिन बुआ नहीं भेजतीं बुआ की बात तो कोई नहीं काटता था बेटियों को हमारे यहाँ पहले भी बहुत मान दिया जाता अब भी ,और बुआ मुझे झूठ में जुआं न होते हुए भीअपना जुंआ ढूंढने बिठा देती !


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