मेरी दादी जी की गौरी
मेरी दादी जी की गौरी
मेरी दादी और उनकी भैंस गौरी का यह अनुभव बहुत ही अनोखा और दिल को छू लेने वाला है। गौरी की समझदारी और दादी के साथ उसके गहरे भावनात्मक जुड़ाव की यह कहानी उन यादगार पलों की साक्षी है। ऐसे पालतू पशु जो अपने मालिकों के संकेतों और भावनाओं को समझते हैं, वो अक्सर परिवार का ही एक हिस्सा बन जाते हैं।
संवेदनशील भैंस गौरी को देखकर ऐसा लगता कि वह सिर्फ एक जानवर नहीं थी, बल्कि मेरी दादी जी की सच्ची सहेली थी। सुबह होते ही जब दादी जी उसे चारागाह चरवाहे के साथ भेजती थीं तो उसके कान में धीरे से कहती गौरी आज नदिया किनारे से तुम काली मिट्टी अपने सींग में ले आना और गौरी बड़ी मगन होकर अपना सिर हिलाती और अपने मुंह को मेरी दादी के कंधे पर रखते हुए ठुमकते चली जाती पहले दिन तो हम सबको बहुत हंसी आई ,दादी जी का वार्तालाप सुनकर हमें लगा वे हमें दिखाने के लिए नाटक कर रही हैं और बात आई गई हो गई ।
असली नाटक का पटाक्षेप तो शाम को ,गौरी के घर लौट कर आने पर देखने को मिला। गौरी का उनकी बात मानकर अपने दोनों सींगों के बीच के भाग में काली मिट्टी लेकर दौड़ते हुए आना यह दिखाता है कि उनके बीच कितना गहरा रिश्ता था। दादी जी का उससे मिट्टी लाने के लिए कहना और उसका हर बार ऐसा करना मानो एक अलिखित समझौता था, जिसमें दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को गहराई से समझती थीं।
मेरे बचपन का वह समय भी यादगार रहा, जब मैं और मेरे परिवार के अन्य सदस्य गौरी की हरकतों को देखकर हंसते और आनंद लेते थे। जब वह दौड़ते हुए दादीजी की ओर आती थी, तो निसंदेह एक डर भी होता था कि कहीं वह उनको चोट न पहुँचा दे, पर फिर वो अपनी मासूमियत और प्यार से हर किसी का दिल जीत लेती थी। यह गौरी की अद्भुत विशेषता थी कि वह अपनी मालिकिन दादी जी की बातें इतनी अच्छी तरह समझ पाती थीं।
यह संबंध बस एक भैंस और मालिक का नहीं था, बल्कि एक ऐसा रिश्ता था जिसमें प्यार, विश्वास और आपसी समझ थी। पालतू पशुओं के ऐसे अनेकों संस्मरण आप सभी की यादों में उभर रहे होंगे । बल्कि हमें यह भी सिखाते हैं कि पशु भी हमारी भावनाओं को समझ सकते हैं उनके अंदर भी भाव संवेदनाएं होती हैं । वे हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
