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Ragini Pathak

Inspirational Others


4.0  

Ragini Pathak

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मेंहदी लगे हाथ

मेंहदी लगे हाथ

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"रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाये मन" गाना कमरे में बज रहा था, रमा अपने हाथ में कॉफी का कप लिए,अपने मेंहदी लगे हाथों से खिड़की पर पड़ी बारिश की बूंदों को हटा रही थी, अभी कुछ दिनों पहले ही उसके पति अर्जुन ने अपने हाथों से रमा के हाथों पर मेंहदी लगाया था....इन यादों के साथ मन में आंसूओं का समंदर दबाए... अपने मन के उलझनों को सुलझाने की कोशिश कर रही थी।


तभी उसकी नजर खिड़की के बाहर एक औरत पर पड़ी। जो गर्भवती थी, और उसके साथ उसका 3 साल का छोटा बच्चा भी थाजिसे वो प्लास्टिक की थैलियों से ढक के बारिश से बचाने की कोशिश कर रही थीं। अंधेरा काफी था स्ट्रीट लाइट जो लूका छुपी खेल रही थी। ये अंधेरा भी उस माँ के चेहरे पर मौजूद अपने बच्चे के लिये प्यार और विश्वास के चमक छुपा नहीं पा रहा था।

रमा नीचे उतर कर गयी। और उस औरत को ला के अपने घर के बरामदे में रुकने के लिए कहा। साथ ही कुछ खाने के लिए और छाता दिया।

तभी उस औरत ने मेंहदी देख के पूछा" मैम साहब! नयी नयी शादी हैं क्या?"

रमा ने कहा "नहीं" जब बारिश रुके तभी जाना।

और वहाँ से चली आयी।

आज उसकी सभी उलझनें इस बारिश के साथ ही खत्म हो गयी थी। उसने सोच लिया था उसे क्या करना है?

अगली सुबह उसकी माँ उसके कमरे मे आयी। और कहा "चल बेटा चलते है, सब इंतजार कर रहे हैं।"

"जी माँ"! "रमा अपनी माँ के साथ बाहर आ गयी।"

रमा!" तुम्हारा बैग कहां हैं?" रमा के बड़े भाई ने कहा


भाई !"मैं नहीं जा रही।"


रमा !"तू पागल हो गयी हैं।" बेटा

पहाड़ की तरह लंबी जिंदगी अकेली कैसे काटेगी?

अर्जुन !"अब इस दुनिया में नहीं है, ना ही वो अब लौट के आ सकता है।"

बहनजी! आप ही समझाइये सास भी तो माँ समान ही होती हैं। विमला जी !"बोलिये यू चुप मत रहिये।"

अभी तो इसने दुनिया देखी ही कहाँ है? जिंदगी में रंग भरे कुछ महीने ही पूरे हुए की भाग्य ने सब रंग छीन लिए।

विमला जी एक कोने में खड़ी चुपचाप रोये जा रही थी। क्योंकि उन्होंने अपना जवान इकलौता बेटा खोया था और अब बहु भी जा रही थी। पति को तो भगवान ने बहुत पहले ही छीन लिया था।

माँ! "मैं आपकी चिंता समझती हूँ।"

लेकिन मैंने अर्जुन से सच्चा प्यार किया था वो मेरे लिए आज भी जिंदा हैं, क्योंकि वो मरा नही शहीद हुआ हैं।

और शहीद हमेशा अमर रहते हैं।

माँ! मैंने अर्जुन से वादा किया था कि मैं परिवार का पूरा ख्याल रखूंगी। तो अब माँजी मेरी जिम्मेदारी हैं। अब मुझे बहु होने के साथ साथ उनका बेटा भी बनना होगा, और पिता होने की भी जिम्मेदारी निभानी हैं।


"क्या बोल रही हैं?" रमा

"हाँ! माँ ये सच है मैं गर्भवती हूं।"

हाँ! ये खुशखबरी मैं सबसे पहले अर्जुन को देना चाहती थी। लेकिन उससे पहले ही वो शहीद हो गए।

विमला जी की रोती हुई बूढ़ी आंखों में जैसे चमक आ गयी।

लेकिन अगले ही पल रमा के बारे में सोच के विमला जी बोली "रमा!बहु कोई भी फैसला बहुत सोच समझ कर लेना। क्योंकि ये तुम्हारी पूरी ज़िंदगी का सवाल हैं। मैं तो कहूंगी। अपनी मां की बात मान लो।"


माँजी !आप दोनों मुझे मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो। फिर मैं आपकी बात मान लूंगी ।

क्या सच मे एक औरत बिना शादी के नही रह सकती? क्या बिना शादी उसका कोई अस्तित्व नही?

क्या वाकई औरत को पुरूष के सहारे की जरूरत है।

माँ!"मेरी जिंदगी में अर्जुन की जगह कोई नही ले सकता।" मैं शहीद की पत्नी कहलाना पसंद करूँगी।

शहीद की पत्नी कांच की चूड़ियों की तरह बिखर कर रोने का अधिकार नही रखती। उसको चट्टान की तरह मजबूत होना होता है।

माफ़ी चाहूँगी... माँ! लेकिन मैं आप के साथ नही आ सकती। मैं अर्जुन की यादों के साथ ही रहना पसंद करूँगी।

निराश हो के। रमा की माँ वहाँ से चली गयी।

रमा ने नौ महीने बाद एक पुत्र को जन्म दिया। रमा ने अर्जुन की फ़ोटो के पास बच्चे को ले जाकर कहा "ये देखो "अर्जुन! ये हमारा अभिमन्यु हैं। इसे मैं वैसे ही पालूंगी जैसे तुम चाहते थे बस अपना साथ देते रहना।" अब रमा और उसकी सास की ज़िंदगी उसी के इर्दगिर्द रहती। रमा हर रोज अर्जुन की तस्वीर से बात करती। कभी मन बेचैन होता। तो उसकी वर्दी को सीने से लगा लेती। धीरे धीरे समय बीतता गया।

एकदिन अभिमन्यु स्कूल से आते समय बहुत रो रहा था। रमा ने पूछा" क्या हुआ मेरे बेटे को?"

माँ !"क्या मेरे पापा मर गए है? स्कूल में सभी बच्चें आज बोल रहे थे।"

अच्छा ! तो ये बात हैं। बताती हूं। पहले ये पन्द्रह अगस्त के मिले लड्डू तो खा लो।

हाँ !अब बताओ...

ये झंडे को देख रहे हो ।

ये हमारा मान, अभिमान , सम्मान और हमारे देश की शान हैं।

हाँ ! तो माँ.....

तो ! ये बेटा की इसकी रक्षा करने के लिए आप के पापा ने अपनी जान दी और अमर हो गए।

अमर! मतलब

मतलब !जिसका अस्तित्व मर के भी जिंदा रहे।

बाकी आप बड़े हो जाओगे। तो खुद समझ जाओगे।


माँ..माँ...

रमा जैसे गहरी नींद से जगी हो। आज उसकी सारी पुरानी यादें ताजा हो गयी अपने बेटे को वापिस फौजी की वर्दी में देख के..... कितनी तकलीफ़ सह के अभिमन्यु को बड़ा किया।

रमा! "क्या सोचने लगी?"..."आज तो खुशी का दिन हैं।"आज तो अपना अभिमन्यु कैप्टन बन गया। विमला जी ने कहा

माँ! कहाँ"खो गयी।" वहाँ अभिमन्यु भी आ गया।


माँ !"ये मेरे लिए बहुत खुशी का दिन है। मैं पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्य निभाउंगा। जैसे मेरे पिता कैप्टन अर्जुन ने निभाया था।"


हाँ!बेटा हमेशा ख़ुश रहो।

सभी अभिमन्यु को बधाई दे रहे थे। और आज रमा की आंखों में आँसू थे।


तभी विमला जी ने रमा का हाथ पकड़ते हुए कहा "आज तो रो ले रमा। इतने सालों तक खुद को पत्थर का बना के रखा था।

रमा आज अर्जुन की तस्वीर के आगे खड़ी हो के रोने लगी। कैप्टन अर्जुन देख लो । तुम्हारा बेटा भी बिलकुल तुम्हारी तरह है। वैसे ही मैंने हमारे बेटे को पाला जैसे तुम चाहते थे।


दोस्तों ना जाने कितनी रमा इस दुनिया में मौजूद हैं। जो इस दर्द से गुजरती हैं। ना जाने कितने अभिमन्यु बिना पिता का चेहरा देखे ही इस दुनिया मे आये। ना जाने कितने असहनीय तकलीफ़ सहता हैं एक सैनिक का परिवार।

ये मेरी कहानी शहीद सैनिक के परिवार को समर्पित हैं।


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