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V Aarya

Inspirational


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V Aarya

Inspirational


मैं ज़्यादा अच्छी हूँ

मैं ज़्यादा अच्छी हूँ

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कभी कभी ज़िन्दगी में किसी छोटी सी गलती से अपने नज़दीकी रिश्ते में ऐसी दरार पड़ जाती है कि वो रिश्ता खो जाता है,और उसके खोने का दुख ताउम्र रहता है.


नीति जब शादी के बाद ससुराल आई तो हर तरफ से सिर्फ उसकी जेठानी श्वेता की ही तारीफ सुनने को मिली. शुरू में तो नई शादी और अनंत के असीम प्यार में उसका इस तरफ ज़्यादा ध्यान नहीं गया. पर बाद में एक बार किसी रिश्तेदार महिला से उसने अपनी सास से कहते सुना, "प्रतिभा ने तो बहुत अच्छे से घर संभाला हुआ है, अब देखते हैँ, ये छोटी बहू कैसी निकलती है."

सुनकर अपनी तुलना किया जाना उसे खटक तो गया, पर उसे एक बात बहुत अच्छी लगी कि सास ने उस बात का कोई जवाब नहीं दिया.फिर वह और अनंत दो दिन बाद ही हनीमून पर शिमला निकल गए. वहाँ आठ दिन अनंत के प्यार में आकंठ डूबकर उसे और कुछ याद नहीं रहा.


जब वह हनीमून से वापस आई तब तक अधिकांश मेहमान जा चुके थे. सिर्फ बड़ी ननद लतिका रह गई थी.जितनी भी बातें उसने लतिका से की थी, वो उसे थोड़ी तेज़ स्वाभाव की लगी. प्रतिभा का व्यवहार सबसे बहुत ही अच्छा और सौहार्द भरा हुआ था. वो नीति से भी अपनी छोटी बहन की तरह स्नेह करती थी. यह बात शायद उसकी ननद लतिका को कुछ खटक सी रही थी. पर ऊपर से वह सामान्य रहने की कोशिश करती थी.


इधर कुछ दिनों से नीति को एक बात थोड़ी खटकती थी कि घर का सारा कार्यभार उसकी जेठानी प्रतिभा ने संभाल रखा था और सब उसीसे पूछकर कोई निर्णय लेते थे. पर चूँकि वो नीति से भी बहुत स्नेह करती थी और अनंत का व्यवहार उसके प्रति बहुत प्रेमपूर्ण था इसलिए नीति इस ओर ज़्यादा ध्यान नहीं देती थी.नीति की पहली रसोई में मीठा बनाने में गाज़र का हलवा बनाने में उसकी जेठानी ने उसकी बहुत मदद की तो नीति ने उसका जब धन्यवाद किया तो प्रतिभा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और बड़े प्यार से हँसते हुए कहा , ये उसकी पहली रसोई है इसलिए उसने उसकी मदद की है, आगे से नहीं करेगी. इसी बात पर दोनों देवरानी जेठानी हँस रहीथीं कि तभी किसी काम से लतिका ने रसोई में प्रवेश किया और दोनों को ख़ुशी ख़ुशी एक साथ काम करते देख जलभुन गई.


थोड़ी देर में जब सब डाइनिंग टेबल पर नीति के बनाए हलवे की तारीफ कर रहे थे तो लतिका ने चिढ़कर कहा,

"अरे! हलवा खाकर तो लग रहा है कि ये प्रतिभा भाभी ने बनाया है."

बस सबका ध्यान इस पर चला गया पर नीति को ये बात थोड़ी ठीक नहीं लगी.बहरहाल, सबने उसे बड़े अच्छे अच्छे नेग दिए और अनंत ने भी उसे अकेला पाकर चुबनों की बौछार कर दी.

दोपहर में जब पापा, भैया और अनंत अपने अपने ऑफिस जा चुके थे तब नीति ने लतिका को अकेले पाकर पूछा, "लतिका दी, आज आपने सुबह सबको क्यूँ बताया कि हलवा प्रतिभा दीदी ने बनाया है, जबकि वो तो सिर्फ मेरी मदद कर रही थीं.


"तुम देख नहीं पा रही हो नीति! इस घर में सिर्फ प्रतिभा ही प्रतिभा छाई हुई है. किसीको तुम्हारी खूबी दीखती कहाँ है? "


नीति आश्चर्य से लतिका की बात सुन रही थी, तभी लतिका ने आगे कहा, "तुम्हें क्या लगा वो आज सुबह तुम्हारी मदद कर रही थी, अरे वो सबको दिखाना चाह रही थी कि तुम अकेले हलवा तक नहीं बना सकती."


"ये आप क्या अनाप शनाप बोल रही हो लतिका दी! प्रतिभा दी मुझे कितना तो प्यार करती हैँ, औरवो हैँ भी तो सर्वगुण संपन्न."

नीति को प्रतिभा की बुराई अच्छी नहीं लगी.


"ये प्रतिभा भाभी की स्ट्रेटेजी है. पहले तो तुमसे अपनापन दिखाएगी और बाद में तुमको डोमिनेट कर देगी."


लतिका ने फिर आगे कहा, अब तुम भी तो इस घर की बहू हो, पर सब काम उन्हीं को पूछ कर क्यूँ होता है, ज़रा सोचो तो. तुम बहुत भोली हो, वो बहुत स्मार्ट हैँ, तुम इतनी जल्दी उनकी चालाकी नहीं समझ पाओगी. " लतिका ने अपनी तुरप का अगला पत्ता फेंका.


अब सच में नीति सोच में पड़ गई कि लतिका दी जो कह रही हैँ, उसमें कहाँ तक सच्चाई है. पर प्रकट में उसने लतिका को ज़्यादा बढ़ावा नहीं दिया और अपने कमरे को व्यवस्थित करने में लग गई.लतिका समझ गई कि नीति को उसकी बात कुछ खास पसंद नहीं आ रही है, तो थोड़ा नाराज़ होकर चली गई.


दरअसल लतिका इस घर की इकलौती लाडली बेटी थीं. लाड़ प्यार में थोड़ी नकचढ़ी भी हो गई थी. जब बड़े भाई की शादी के बाद प्रतिभा बहू बनकर आई तो लतिका को अपने एकक्षत्र राज में किसीका प्रवेश अच्छा नहीं लगा. ऊपर से उसके ससुराल वाले थोड़े पुराने ख़्यालात के थे जबकि मायके में उसके माता पिता बेटी तो क्या बहू को भी ज़्यादा रोकटोक नहीं करते थे. यही बात लतिका को और भी ईर्ष्या से भर देती थी.


वो जब भी मायके आती अक्सर प्रतिभा के खिलाफ माँ के कान भरती रहती. पर सुनंदा जी अनुभवी और मितभाषी महिला थीं, वो बेटी की बात सुनती ज़रूर थीं पर उन बातों का अपने दिमाग़ और व्यवहार पर असर नहीं होने देती थीं.पर नीति में इतनी समझदारी और गंभीरता कहाँ थी.


शाम की चाय बनाने जब नीति रसोई में गई तो प्रतिभा ने पहले ही चाय बना रखी थी. यह देखकर नीति थोड़ी रुआँसी हो गई तो अगले ही पल प्रतिभा ने हँसते हुए नीति से कहा,


"अरे, मेरी नादान बहन, मैंने चाय बना दिया तो क्या तुम सबको सर्व कर दो. किसको पता चलेगा कि चाय मैंने बनाई है तुमने नहीं !"


भले ही निर्मल हृदया प्रतिभा ने ये बात उसे लाड़ में आकर कहा हो, नीति को एकदम से लतिका की बात याद आ गई कि प्रतिभा दीदी बहुत चालाक हैँ और अपने रहते किसी और को क्रेडिट नहीं लेने दे सकती.!"और नीति का शक सही निकला, ससुरजी ने चाय का पहला घूंट भरते ही कहा,


"छोटी बहू, प्रतिभा बहू से कहो, मेरी चाय दुबारा बनाकर लाये, उसने आदतन मेरी चाय में फिर से इलायची डाल दी है. अक्सर भूल जाती है, मुझे इलायची पसंद नहीं."


ससुरजी ने अपनी चाय का कप नीति को लौटाते हुए कहा तो नीति को फिर से लतिका दीदी की बात सही लगी, क्यूँकि सब समझ गए थे कि, चाय नीति ने नहीं प्रतिभा ने बनाई थी.

रात में सोते हुए उसने यूँ ही अनंत से कहा, "प्रतिभा दीदी कितनी अच्छी हैँ ना, कितना सारा काम करती हैँ."यह बोलते हुए कदाचित नीति की मंशा प्रतिभा के बारे में और जानने की थी.

"हाँ ! प्रतिभा भाभी बहुत मेहनती हैँ".अनंत ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई.

" पिछले पाँच सालों में जबसे व्याहकर आईं हैँ तबसे घर को अच्छे से संभाल रखा है. और तुम्हें पता है, जब शादी के बाद इस घर में वो बहू बनकर आईं थीं तो उन्हें भी तुम्हारी तरह घर का कोई काम नहीं आता था, माँ ने ही उन्हें गृहस्थी के काम में इतना ट्रेंड किया है. " अनंत ने कहा.

"तो आप भी मुझे घर के कामों में अनाड़ी समझते हो."

नीति ने थोड़ा उदास होकर कहा तो अनंत ने प्यार से कहा, "अरे तुम बस मुझे प्यार करने में निपुण हो जाओ. घर के काम में तो भाभी तुम्हें अपनी तरह निपुण कर देंगी. "

फिर से प्रतिभा से अपनी तुलना किया जाना देखकर नीति को थोड़ा दुख तो हुआ पर अनंत की मुनहार करती बाहों को और इंतजार कराना उसे सही नहीं लगा.


अगली सुबह नीति अपेक्षाकृत जल्दी उठी और सुबह का नाश्ता बनाने लगी. वो यह देखकर बहुत ख़ुश थी कि अभी तक प्रतिभा रसोई में नहीं आई थी. जब थोड़ी देर में प्रतिभा रसोई में आई तो नीति ने उसे किसी भी काम में हाथ नहीं लगाने दिया. उस दिन सबको उसके बनाए आलू के परांठे पसंद तो आए पर उसे पता नहीं था कि पापा नमक कम खाते हैँ और माँ को पेट में पथरी होने की वजह से अदरख खाने की मनाही है. खैर, धीरे धीरे उसने पूरी रसोई का भार अपने ऊपर ले लिया. सुबह तड़के उठ जाती फिर दिन भर घर का ज़्यादा से ज़्यादा काम अपने हाथ में लेने के चक्कर में ना खुद पर ध्यान दे पाती और ना ही अनंत को ही समुचित समय दे पाती थी. रात में थककर चूर जो हो जाती थी. मन में जैसे प्रतिभा को पीछे छोड़ने और उससे भी अच्छी बहू बनने की होड़ सी लग गई थी.


घर में कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था कि नई बहू सारा काम खुद करने की ज़िद क्यूँ ठाने हुए है. प्रतिभा को तो रसोई में एकदम ही जाने नहीं देती. सिर्फ लतिका समझ रही थी कि नीति ऐसा क्यूँ कर रही है. आखिर ये आग उसीकी लगाई हुई जो थी.जिस दिन लतिका को वापिस ससुराल जाना था, उस दिन नीति ने बहुत ज़्यादा काम किया. नमकीन, मठरी बनाने में उसने सासु माँ या जिठानी की कोई मदद नहीं ली. कदाचित वो चाहती थी कि सब उसे कहें वो बहुत अच्छी और सुघड़ बहू है, बड़ी बहू से भी अच्छी.


जाने से पहले लतिका थोड़ी देर को नीति के कमरे में आई उसकी खूब तारीफ की और फिर से प्रतिभा की खूब चुगली करके नीति को उससे सावधान रहने को कह गई. उसके मन में प्रतिभा के लिए जो भी ईर्ष्या और ज़लन थी वो सब वो स्वाभाव से भोली और कान की कच्ची नीति के मन में सारा ज़हर उगल गई. चूँकि नीति के मुँह पर वो उसकी बहुत तारीफ करती थी इसलिए नीति को उसकी बातें सही लगने लगी थी.


लतिका के जाने के बाद इतना काम करने की आदत ना होने की वज़ह से नीति की तबियत ख़राब हो गई. उस दिन वो देर तक सोई रह गई. जब वो उठी तो रसोई से दमआलू की बहुत तेज़ खुशबू आ रही थी. उसे याद आया, शुरू में उसने प्रतिभा को बताया था कि उसे दमआलू और पूड़ी बहुत पसंद है. तभी उसके कमरे में खाने की प्लेट में दमआलू , पूड़ी और आम के अचार के साथ प्रतिभा कमरे में आई और नीति को हँसते हुए बोली,


"मेरी प्यारी बहना, इतना काम करके बीमार पड़ गई, अब तुम कुछ दिन आराम करो. रसोई की एकदम चिंता मत करो, वो मैं संभाल लूँगी."


इतना सुनते ही नीति को फिर से लतिका की बात याद आ गई और उसने खाने की थाली को परे करते हुए गुस्से और ईर्ष्या की आग में जलते हुए कहा,


"हाँ, हाँ! आप तो चाहती ही हो कि पुरे घर में और रसोई पर सिर्फ आपका एकक्षत्र राज रहे. मैं आपकी सारी चालाकी बहुत अच्छे से समझ गई हूँ. आप चाहती हैँ हमेशा आप ही बेहतर बनी रहें. पर मैं आपको ऐसा नहीं करने दूँगी आपकी असलियत सबके सामने लाकर रहूँगी. आपके रहते इस घर में मेरी कोई पहचान नहीं बन पायेगी. आपके सुन्दर चेहरे और इस बनावटी मीठी बोली के पीछे जो एक गलत इंसान छुपा हुआ है, उसे मैं पहचान चूकी हूँ."


अब तक जितना भी जहर नीति के मन में था वो सब उसने एक साथ उगल दिया. उसकी तेज़ आवाज़ से घर के बाकी लोग भी आ गए थे. सब हक्के बक्के थे कि ये क्या हो रहा है .प्रतिभा तो एकदम सकते में आ गई थी. आँखों में आँसू भरकर सिर्फ इतना ही बोल पाई,


"छोटी, तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है, मेरे मन में ऐसी कोई भावना नहीं है."उसके आगे प्रतिभा से कुछ बोला नहीं गया, वो रोते रोते अपने कमरे में चली गई.

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बाद में नीति को अपनी गलती का एहसास हुआ और एकदम से बहुत अफ़सोस होने लगा.धीरे धीरे घर में तनाव कम होने लगा था पर प्रतिभा की उदासी और नीति का असहज व्यवहार सामान्य नहीं हो पा रहा था.


नीति सब कुछ पहले की तरह करने की भरसक कोशिश कर रही थी कि एक और ब्रज़पात जैसा हुआ. बड़े भैया के बैंक में प्रमोशन के साथ ट्रांसफर का ऑप्शन था, जिसे उन्होंने एक्सेप्ट कर लिया था. इसके पहले भी ये ऑफर आया था पर उन्होंने घरवालों के साथ रहने के लिए ट्रांसफर को मना कर दिया था. नीति को पता नहीं क्यूँ लग रहा था कि ये तबादला स्वीकार करने का निर्णय उन्होंने नीति के उस दिन की बात के बाद लिया था. वैसे इतने सालों बाद पहली बार प्रतिभा भाभी प्रेग्नेंट हुईं थीं, ऐसे में उनको परिवार में रहना ज़्यादा अच्छा रहता पर उनको मानसिक तनाव से बचाने के लिए भाईसाहव ने उनको इस माहौल से दूर रखने का सोचा था.


इस बात को लगभग एक साल हो गए थे. बीच में अपनी गुड़िया को लेकर छुट्टियों में कई बार भैया भाभी घर आए थे पर प्रतिभा नीति के साथ सामान्य नहीं रह पाती थी. उनके रिश्ते में जो खाई आई थी, वो फिर नहीं भर पाई.कई बार कुछ नासमझी और गलतफहमी रिश्तों को आज़ीवन खो देने का कारण बन जाती है ,बाद में अफ़सोस के अलावा कुछ नहीं रह जाता.


अबके होली में फिर से देवरानी जेठानी मिलनेवाली हैँ और दोनों नें अपने आपसी रिश्ते को सुधारने की ठानी है. आइये हम भी इनको शुभकामनायें दें कि इनके रिश्ते होली के रंग से सिरजकर प्रेम से सराबोर होकर बहुत ही बहनों की तरह मधुर हो जाएँ.



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