मैं अब लौटकर नहीं आऊँगा
मैं अब लौटकर नहीं आऊँगा
कुमार शानू के कैसेट लाता था शौंटू उर्फ़ सुशांत और किशोरवस्था को पार करके यौवन में कदम रखती मुनमुन उर्फ़ मृणालिनी खो सी जाती उन गानों में 90 रूपये का वो कैसेट उसे बड़ी महँगी लगती। खुद के लिए नहीं बल्कि सुशांत के लिए। इसलिए बहाने से कहती,
"सुनो शौंटू तुम किसी फ़िल्म के सारे गानों की कैसेट मत लाया करो। मुझे सारे गाने थोड़े ना पसंद आते हैं। तुम तो बस वो वो तीस रूपये के खाली कैसेट खरीदकर दे दिया करो मैं उसमें अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड करा लिया करुँगी। या फिर तुम ऐसा करो कोई खाली कैसेट खरीदकर अपनी पसंद के गाने रिकॉर्ड करके ले आओ। ज़रा देखूँ तो हमारी पसंद कितनी मिलती जुलती है।
सुशांत समझ जाता कि मृणालिनी उसके पैसे ज़्यादा ना खर्च हों इसलिए ऐसा कह रही है। क्यूँकि उन दिनों एक गाना एक रूपये में रिकॉर्ड होता था, और एक कैसेट में पंद्रह गाने बड़ी आसानी से आ जाते थे।। इस तरह नब्बे रूपये का कैसेट पैंतालिस का पड़ता था। इस तरह समझदार मृणालिनी सुशांत के पैसे बचा दिया करती थी बिना उसे किसी कमतरी का एहसास कराए।
सुशांत धन्यवाद देता भगवान को कि उसे मृणालिनी का जिगरी दोस्त बनाया और मृणालिनी को नाज़ था अपनी पसंद पर। मेहनती, ईमानदार और भावुक सुशांत बहुत पसंद था मृणालिनी को।
दोनों की दोस्ती में ज़ब कुछ कुछ प्यार के एहसास घुलने लगे तब वह संग जीने मरने के वादे करने लगे।
उन दिनों प्रेम उतना मुखर नहीं था। आँखों को पढ़ने का हुनर लगभग हर प्रेमी युगल सीख लेता था। विवाह से पूर्व शारीरिक समर्पक पाप समझा जाता था। तो उस समय के शाब्दिक परिभाषा में उनका प्रेम पवित्र था।
सुशांत के पिताजी बिजली विभाग में एक निम्न कर्मचारी थे और मृणालिनी एक सरकारी अफसर की बेटी। मृणालिनी के भाई का दोस्त सुशांत कब उसके दिल के इतने करीब आ गया इसका पता तब चला ज़ब मृणालिनी को स्कूल से आने के बाद भी सुशांत की याद आने लगी थी।
कैसेट का आदान प्रदान और परस्पर
गाना सुनना गुनगुनाना चलता रहता।स्कूल में भी दोनों ज़्यादा बात कहाँ कर पाते थे। दोनों एक ही क्लास में ज़रूर पढ़ते थे पर सेक्शन अलग अलग होने की वज़ह से एक दूसरे से बात करने के लिए सैकड़ों जतन करने पड़ते थे। कभी कॉपीयाँ देने पहुँचाने अगर एक दूसरे के क्लास जाना होता तो एक नज़र देख लेना ही काफ़ी होता था। फिर वो नज़रें रात को सपने में भी पीछा करती थी।
ऐसा अनोखा, अलबेला, पवित्र प्यार था मृणालिनी और सुशांत का.
दसवीं के प्री बोर्ड के बाद फेयरबेल के दिन सभी लड़कियों को साड़ी पहनना होता था और लड़कों को सूट। सुशांत बड़ी मुश्किल से पापा से ज़िद करवाकर बनवा पाया था ब्राउन रंग का डबल कॉलर वाला कोट जिसमें उसे देखकर एक पल को मृणालिनी अपना सुध बुध खो बैठी थी तो उधर मम्मी की मैरून साड़ी में मृणालिनी किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। उस दिन स्कूल को बाय बाय कहते हुए दोनों एक दूसरे को देखकर हाय हाय कर रहे थे।
उस दिन दोनों ने प्यार का इज़हार कर दिया था। अब शुरु हो रहा था इम्तिहान का दौर। बोर्ड के इम्तिहान का भी और इन दोनों के प्यार का भी। अब तो रोज़ स्कूल आना भी नहीं होगा। फिर कैसे रहेंगे दोनों इतने दिन एक दूसरे को देखे बिना...?
मृणालिनी से साफ साफ कह दिया कि,
"देखो शौंटू, मैं इतने दिन तुम्हें देखे बिना नहीं रह सकती। फेल हो जाऊँगी मैं!"
"मैं भी तो तुम्हारे मुस्कुराते चेहरे को देखे बिना खुश नहीं रह पाउँगा। और अगर मैं फेल हो गया तो मेरी तो कभी भी किसीसे भी शादी नहीं होगी!"
सुशांत की इस बात से दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। तय हुआ कि सप्ताह में एक दिन सुशांत मृणालिनी के भाई मयंक से थोड़ी देर के लिए खेलने आया करेगा और मृणालिनी भी किसी एक दिन रेलवे स्टेशन पर जो बुक स्टॉल है वहाँ अपनी सहेली नम्रता के संग जाया करेगी। दूर से ही सही दोनों एक दूसरे को देखकर, नज़रों से प्यार करके वापस आ जाया करेंगे।
तब इन दिनों की तरह मोबाइल तो होते नहीं थे। लैंडलाईन फोन सुशांत के घर नहीं था. वह कभी किसी पी. सी. ओ. से बात करता भी तो कभी मृणालिनी को छोड़कर कोई और फोन उठा लेता तो फिर सुशांत बिना कुछ बोले रख देता और मृणालिनी की आवाज़ सुने बिना पाँच रूपये पी. सी. ओ. वाले भैया को देना उसे बड़ा आखरी सा जाता। ऐसे ही चल रही थी और आगे दो महीना और काटना था।
ज्यों ज्यों दसवीं बोर्ड की परीक्षा नज़दीक आती जा रही थी सुशांत और मृणालिनी का बहुत सारा वक़्त पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई में गुजरने लगा।
सुशांत आगे साइंस पढ़ कर इंज़ीनियर बनना चाहता था। गरीब घर का बड़ा लड़का होने की वजह से उस पर एक दबाव सा भी बना हुआ था कि कैसे भी उसे अच्छे नंबर लाने थे ताकि उसे आगे स्कॉलरशिप मिलेगी ताकि वह आगे अपनी पढ़ाई पूरी कर सके।
नौकरी मिलने के बाद फिर मृणालिनी का हाथ माँगने जायेगा।
दोनों प्रेमी युगल में यही बात तय हुई थी।
बड़े घर की बेटी थी। जब तक अच्छी नौकरी नहीं होगी उसके सरकारी अफसर पापा सुशांत के साथ मृणालिनी की शादी करने को कैसे राज़ी हो जाते। एक तरह से सुशांत और मृणालिनी की प्रेम कहानी का दरमोदार सुशांत की दसवीं के रिज़ल्ट पर निर्भर करता था।
पता नहीं भविष्य के गर्त में क्या छुपा था।
उस दिन सुबह सुबह उठकर मृणालिनी ने नहा धोकर दादी के ठाकुरजी को धूप बत्ती दिखाई और सुशांत के अच्छे रिज़ल्ट के लिए भगवान की प्रार्थना करने लगी। उसे अपने रिज़ल्ट से ज़्यादा सुशांत की रिज़ल्ट की चिंता थी। मृणालिनी को तो उसकी माँ ने पहले ही डांटकर कह रखा था कि अगर वह पास हो गई तो ग्रेजुएट करवा देंगी फिर उसकी शादी करवाएंगी और जो पास ना हो पाए तो इसी साल उसकी शादी करवा देंगी।
उस दिन सुबह उठ तो सुशांत भी गया था। उसका दिल बहुत तेज़ी से धड़क रहा था। उसका गणित का परचा उतना अच्छा नहीं हुआ था। उसे अंदर ही अंदर थोड़ा डर तो लग ही रहा था। जैसे ही पड़ोस में अख़बार आया, सुशांत दौड़कर जाकर अंकल से अख़बार माँग लाया।
धड़कते दिल से सुशांत ने अख़बार में अपना रोल नंबर ढूंढना चालू किया। पहली बार तो सरसरी तौर पर देख गया। ज़ब उसे अपना रोल नंबर नहीं दिखा तो फिर दुबारा देखा, फिर नहीं मिला तो दिल धड़कने के साथ उसका सर भी चकराने लगा। उसके बाद तो तीन बार... चार बार... ना जाने कितनी बार पर सुशांत का रोल नंबर कहीं नहीं था। यानि की सुशांत फेल हो गया था।
अब....?
क्या होगा माँ के अरमानों और पिता के सपनों का।
और मुनमुन... के संग जीने मरने की कसमें?
उनका क्या होगा फिर...?
थोड़ी देर सुशांत वैसे ही जड़वत होकर खड़ा रहा। तभी उसने सुना माँ उसे पुकारकर कुछ कह रही थी। उसने झट से अपने हाथ में पकड़ा अख़बार छुपा दिया।
"शौंटू, मुनमुन का फ़ोन आया है, बात कर लो। आज तो तुम्हारा रिज़ल्ट भी आ गया होगा ना। जा पहले मुनमुन का फोन ले ले शायद वह तुझे रिज़ल्ट बतानेवाली हो!"
माँ ने कहा तो शौंटू यन्त्र चालित सा गया उधर से मुनमुन की रोती हुई आवाज़ आई,
"शौंटू तुम्हारा रोल नंबर तो है ही नहीं। लगता है तुम... तुम फेल हो गए!"
बोलकर और रोने लगी मृणालिनी ।
अब और नहीं सुना गया सुशांत से। अब क्या मुँह लेकर जायेगा वह मृणालिनी के सामने। अपनी साइकिल लेकर निकला और माँ से कहता गया जल्दी आएगा।
शाम को पापा ज़ब घर आए तो सोंटू के लिए पुछा तो जवाब माँ ने दिया, सुबह से बाहर गया है।
देर रात तक उसके बाबूजी उसके दोस्तों के घर जा जाकर पूछते रहे। माँ का रो रोकर बहुत बुरा हाल था। मृणालिनी भी बहुत परेशान थी कि सुशांत कहाँ गया होगा।
सुशांत के बाबूजी ने निश्चय किया कि सुबह तड़के ही सुशांत की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाएंगे और उसे और भी मुस्तैदी से ढूंढेंगे। इतना तो वह भी जानते थे कि सुशांत अख़बार में अपना रोल नंबर ना देखकर हताश होकर कहीं चला गया है।
अगले दिन सब जगह एक ही खबर थी...
शहर के पम्पू तालाब से एक लड़के की लाश मिली थी। मतलब सुशांत ने आत्महत्या कर ली थी। वह डर गया था अपनी असफलता से और उसका सामना करने से।
90 के दशक में कोई सी जी पी ए ग्रेडिंग सिस्टम नहीं था और रिजल्ट अख़बार में निकलता था जो सुशांत ने सोच लिया (था की अब वह अपना जंग खत्म करके। अब फिर से पापा की डांट और माँ के आँसू वह ना देख पायेगा!
दोस्तों, यह थी नब्बे के दशक की एक असफल प्रेम कहानी। तब तो अख़बार में रिज़ल्ट ना पाकर ऐसे ही रोया सुशांत और अपनी जिंदगी को छोड़कर मौत को गले गले लगा लिया।
क्षणिक आवेश में सुशांत द्वारा लिये हुए निर्णय ने मृणालिनी को तोड़कर रख दिया था। उसका पहला प्यार उसे छोड़कर जा चुका था। उसकी दुनियाँ सालों तक वीरान रही थी।
अब व्यस्क होकर मृणालिनी सोचती तो उसे तबकी और अबकी शिक्षा व्यवस्था और मूल्यांकन पद्धति में बहुत सकारात्मक बदलाव आते दिखते हैं। जो अच्छे होने के साथ साथ एक स्टूडेंट को सिर्फ एकेडमिक सफलता और मार्क्स परसेंटैज़ के आधार पर नहीं बल्कि उसके चतुर्दिक विकास को ही सफलता का मापदंड मानते हैं।
मृणालिनी की सूनी दुनिया, सुशांत के अम्मा बाबूजी का भविष्य का सपना सब टूट चूका था। तब परीक्षा में आए हुए नंबर से ही छात्र की प्रतिभा का मूल्यांकन होता था। आज का ग्रेडिंग सिस्टम कम से कम एक छात्र के सर्वांगीण सफलता को दर्शाता है।
हर समय के दौर की अपनी खूबियाँ और खामियाँ होती हैं। नब्बे के दशक में परीक्षा में आए हुए नंबर और डिवीजन बहुत महत्व रखते थे और लोगों के तानों, समाज द्वारा बनाए गए सफलता के मापदंड की वजह से कई असफल छात्र अपनी इहलीला समाप्त कर देते थे।
वक़्त बदला है और इस परिपेक्ष में यह
बदलाव अच्छा है।
(समाप्त )
