Rahim Khan

Action Classics


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मारवी

मारवी

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ऐतिहासिक पसमंज़र- जैसा कि आपको मालूम होगा कि ईसा की 8वी सदी के आरंभ तक सिंध पर अरबों ने आधिपत्य कर लिया था। अरबों का यह दौर लगभग 250 वर्षों तक रहा। 11वी सदी के मध्य तक अरबों की पकड़ सिंध में कमजोर होने लगी और वहां फिर से राजपूत देशी रजवाड़े उभरने लगे। इन्हीं मेंं सिंध पंजाब व कच्छ के इलाकों मे दो प्रमुख रजवाड़े उभरे- सूमरा एव सम्मासिंध के इतिहासकारों ने सूमरों को परमार वंश व सम्मोंं को जाड़ेजा वंश से जोड़ा है। 1050 ई. के आसपास कच्छ व दक्षिण पूर्वी सिंध मे सम्मों व थट्टा, नगरपारकर व अमरकोट मे सूमरों ने अपना राज्य स्थापित किया। लगभग 300 वर्षों तक इस इलाके में सूमरों का राज रहा। सिंध के इतिहास में सूमरों का दौर अमन, बहादुरी, साहित्य सांस्कृतिक विरासत का गोल्डेन एरा माना गया हैं। सिंध के साहित्यिक स्रोतों में मौजूद तमाम दास्तानों के पात्र इसी दौर मे हुए हैं। मूमल-राणों,उमर-मारवी, सौरठ, दोदो-चनेसर आदि सभी इसी दौर मे हुए थे।

दास्तान उमार-मारवीसूमरों के दौर मेंं ईसा की 12 सदी मेंं अमरकोट (जिसे आगे चल कर उमरकोट कहा गया) पर हमीर सूमरो का राज था। कहा जाता है कि हमीर सूमरो 25वे सूमरो राजा थे। उस जमाने मे राजघरानों मे पुत्र मोह होता था और पुत्री को जन्मते ही मार दिया जाता था।

हमीर के सबसे पहले पुत्र हुआ जिसका नाम उमर रखा गया, जो आगे चल कर अमरकोट का राजा बना। हमीर की रानी की दूसरी संतान पुत्री हुई, राजमहल मेंं चुपचाप उस नवजात को मारने की तैयारी हुई, यह काम एक धाय को सोंपा गया। उन्हीं दिनों अमरकोट के पास एक निःसंतान थरी चरवाहा रह रहा था। धाय ने सोचा इस बच्ची को मारने की बजाए उस चरवाहे को दे दूं, धाय ने सारा माजरा उस चरवाहे को समझाया और वह बच्ची उसे दी और उसे रातों रात वहां से जाने को कहा। राजमहल मे उसने बताया की उसने बच्ची को मार दिया जैसा कि उसे कहा गया था।   वह थरी चरवाहा जिसका नाम " लाखो "बताया जाता है, बच्ची को लेकर थर की तरफ चल दिया। अभी के नगरपारकर के पास एक जगह थी " भालवा " वहां जाकर वह बस गया। इस इलाके को बाद मे " मलीर "कहा गया। परिवार ने बच्ची का नाम "मारवी" रखा। वक्त गुजरा, मारवी बड़ी हुई, वह बहुत खूबसूरत थी।  एक दिन एक वाक्या हुआ, मारवी अपनी सहेलियों के साथ थर की धरती पर खेल रही थी, वहां से कुछ राहगीरों का गुजर हुआ। कहा जाता है कि उन राहगीरों मे कोई बंदा बड़ा सालख व सुघड़ था(ज्ञानी)। .उसने मारवी को देख कर अपने साथियों से कहा की ये लड़की इस थरी खानदान मे ?यह बड़ी अजीब बात है ? आपस में चर्चा हुई, तैय हुआ कि चलो पता करते हैं, ये लड़की है कौन। उन्होंने लड़की से पूछा, किसकी बैटी हो, लड़की ने कहा लाखे की, सामने मेरा घर है। वो लोग मारवी के साथ उसके घर गए, वहां मारवी की मां यानी लाखे की घरवाली से वे मिले, उन्होंने ने कहा हमें इस लड़की को देख कुछ बात अजीब सी लगी, अगर कोई इसमें राज हो तो बताएं। मारवी की मां ने उन्हें सारा किस्सा सुनाया ओर कहा कि हकीकत मे यह राजा हमीर की बैटी है, इसका भाई उमर है, अमरकोट का राजा। तब तक उमर राजा बन चुका था। मां की सारी बात मारवी सुन रही थी।

उसे यह बात बहुत अच्छी लगी कि उमर उसका भाई है जो राजा है, उसे यह सब काल्पनिक ही लगा लेकिन फिर भी उसे बहुत अच्छा लगा। जब वह अपने साथियों से खेल खेल मे झगडा करती तो उन्हें डराती कि मेरा भाई राजा है, तुम्हें तलवार से चीर देगा। वक्त गुजरा, मारवी बड़ी हो रही थी। मारवी के पिता लाखे के पास खूब मवेशी हुआ करती थी। थर का यही कारोबार हुआ करता था। लाखे ने अपनी मवेशी के लिए एक चरवाहा रख रखा था जिसका नाम " फोग "था।  जब मारवी यंग होने लगी तो उसकी सुंदरता देखने लायक थी। वह हर किसी को मोहित कर जाती थी। फोग भी मारवी को चाहने लगा। एक दिन फोग के परिवार ने मारवी का हाथ मांग लिया। फोग जाती से कच्छी रबारी था, लेकिन लाखो जात से फुलपोटरो पंवार था, जो राजपूत थे। इसी जात के आधार पर मारवी का हाथ फोग को नहीं मिला। मारवी का रिश्ता मां बाप ने खेत नाम के अन्य से कर दिया गया। मारवी का रिश्ता फोग को न मिलकर खेत को मिलना फोग को नागवार गुजरा। उसके मन मे ईर्ष्या पैदा हुई। फोग इसका बदला लेने की सोचने लगा। इसी फिराक मे वह अमरकोट जा कर राजा उमर से मिला, उसने उमर को बताया की थर के एक गांव मे एक बहुत खूबसूरत वर है जो आपके लायक है। आपको उसे ला कर सादी करनी चाहिए। फोग के उकसाने पर उमर मान गया और एक दिन ऊंट लेकर मारवी के गांव की तरफ चल दिया। भरी दोपहरी मे वह उमर के गांव भालवा पहुचां ,उसने मारवी के लिए घात लगाया, मारवी पानी भरने के लिए कुंए तरफ निकली, उमर ने देखा वह उस पर.फिदा हो गया। वह मारवी के पास पानी का बहाना बनाकर गया और उसने मारवी को जबदस्ती ऊंट पर उठा अमरकोट की तरफ चल दिया। उमर ने उसे कहा की वह उससे सादी करना चाहता है, तेरे लिए खूब ऐसोआराम की व्यवस्था करूंगा।  मारवी ने कहा -खबरदार, मेरे भाई को पता लगते ही वह तुझे तलवार से चीर देगा।  उसने हा कौन है तेरा भाई ?मारवी ने कहा -मेरा भाई उमर है, अमरकोट का राजा है।

उमर ने कहा वो तो मैं ही हूँ। मारवी ने कहा फिर तो तू मेरा भाई है, भाई बहन की सादी एक बहुत कुरीत हो जाएगी, मुझे वापस मेरे वतन जाने दे। यहीं से दास्तान मे विरह का आगमन होता है। उमर मारवी की बात पर विश्वास नहीं करता है और उसे ले जाकर अमरकोट के किले में बंद कर देता है। उमर ने उसके साथ जबरदस्तती नहीं की लेकिन उसे.मनाने की कोशिश करता रहा। उसने उसे सभी प्रकार के लोभ लालच लिए लेकिन मारवी नहीं मानी। मारवी ने किले मे विरह के विलाप कर दिन गुजारे, उसने वहां एक या दो वर्ष का समय बिताया। इस दौरान उसने वही कपड़ें पहने रखे जिसे पहन कर वह लाई गई थी। उमर के सारे प्रयास नाकाम रहे,

मारवी विरह के इस दुखी समय मे दिन रात आजादी के लिए विलाप करती रही और बिमार हो गई। आखिर मे मारवी ने कहा की मेरी मां ने कहा था की अमरकोट की राजधाय ने मुझे उन्हें सोंपा था, धाय से गवाही ली जाए कि मे उमर की बहन.हूं कि ना ?जब धाय ने सारा किस्सा सुनाया तो उमर मान गया, उसने मारवी को मानसम्मान व पवित्रता के साथ अपने वतन पहूंचा दिया। मारवी खुशी खुशी अपनों से जा मिली। अधिकतर अदिबो व काव्यों ने दास्तान को यहीं समाप्त किया है। कुछ काव्य कारों ने इसे आगे बढ़ाया है, कुछ ने बताया है कि उसके मंगेतर खेत ने उसे स्वीकार नहीं किया और वह सति हो गई, कुछ ने कहा कि खेत ने उसकी अग्नि परीक्षा ली, और उनकी सादी हो गई।

उमार मारवी का दास्तान सिंध व सिंधिभाषियों के लिए बहुत ही अजीम दास्तान है। सिंध के बहुत से काव्य कारोंं ने इस दास्तान का बयान किया है, सबसे प्रसिद्ध है शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई का रिसाला, "सुर उमर मारवी " जिसमें शाह साहब ने बहुत ही सजीव चित्रण अपने बैतों के माध्यम से किया है।


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