STORYMIRROR

Navya Agrawal

Inspirational

4  

Navya Agrawal

Inspirational

मानवता की ओर एक कदम

मानवता की ओर एक कदम

6 mins
618

सर्दी की वो काली रात और कड़कड़ाती हुई ठंड। कानों को चीरती हुई तेज हवाएं चल रही थी। चारो तरफ कोहरा ही कोहरा छाया हुआ था। मीलों दूर तक कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। रात के करीबन आठ बजे का वक्त था जब मैं अपने ऑफिस से निकला था। बाहर आया तो ठंड के मारे काँपने लगा। तभी मैंने अपना जैकेट, मफलर सब कुछ जो सर्दी से बचने के लिए मेरे पास था, मैंने पहन लिया। ठंड इतनी ज्यादा थी कि मेरा काँपना बन्द ही नही हो रहा था। ठंड की वजह से मेरे दांत भी बजने लगे। हाथ और पैर सुन्न होने लगे थे।ऐसे में मुझे घर भी पहुँचना था पर समझ नही आ रहा था कि क्या करूँ, कैसे घर को जाऊँ। एक कदम भी आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

तभी उस कोहरे को चीरती हुई एक सुनहरी रोशनी मुझे दिखाई दी। मुझे दूर से समझ ही नहीं आ रहा था कि वो कैसी रोशनी है क्योंकि कोहरा इतना था कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अगर कुछ दिख रहा था तो वो था कोहरा। मैंने उस रोशनी का पीछा किया। उसे देखते देखते मैं उसके पास गया तो देखा वो रोशनी आग की थी। वहां जो मैंने देखा उसे देखकर मैं दंग रह गया। वो एक ऐसी जगह थी जहां कोई जाना भी पसन्द नहीं करता क्योकि वहां से बड़ी दुर्गंध आ रही थी इसलिए मैं भी वहां नही गया और उससे कुछ कदम की दूरी पर खड़ा हो गया। पर वहां एक बूढ़ी माँ और एक छोटा सा बच्चा बैठे हुए थे। वो स्थान एक कूड़े का ढेर था जहाँ सिवाय कूड़े के और कुछ नही था। वो बच्चा कूड़े में से कुछ कागज ढूंढकर लाता और वो बूढ़ी माँ उन्हें जल रही थी। मैं बहुत देर तक उन्हें ऐसे ही देखता रहा। उनके पास पहनने को कोई गर्म कपड़े नहीं थे। उस वृद्ध महिला ने एक फ़टी पुरानी साड़ी पहनी हुई थी और उस बच्चे ने बिना बाह की शर्ट और नेकर पहनी हुई थी। पैरों में पहनने के लिए उसके पास कुछ नहीं था। वह नंगे पांव इधर उधर घूम रहा था। वो बस आग के आगे बैठे अपने हाथों को सेक रहे थे। दोनो के शरीर के रोंगटे खड़े हुए थे और सर्दी से कांप रहे थे। बस आग के सामने बैठने से कुछ राहत मिल रही थी पर हवा भी इतनी तेज थी कि आग की गर्माहट भी शरीर पर लगने से पहले ठंडी पड़ जाती।

उनकी उस हालत को देखकर मुझे बहुत बुरा लग रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि भगवान भी कैसे कैसे खेल खेलते हैं। मेरे पास सर्दी से बचाव के लिए इतने कपड़े जूते होते हुए भी हाय हाय करता जा रहा हूँ, भगवान को कोसता जा रहा हूँ की आज उन्होंने इतनी ठंड कर दी पर वो बूढी माँ और बच्चा उफ्फ तक नहीं कर रहे। चुपचाप उस भीषण सर्दी को सहन कर रहे हैं और सर्दी से बचने के उपाय कर रहे हैं। मुझे खुद पर बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई।

मैं उन दोनों के पास गया और उस बच्चे को अपना जैकेट पहना दिया। जैसे ही मैं उसे जैकेट पहनाने लगा तो देखा उसका शरीर बुखार से तप रहा है। मैंने तुरन्त उसे अपनी गोद में उठाया। उसे और उसकी मां को साथ लिए घर आ गया। घर लाकर मैंने तुरन्त डॉक्टर को फ़ोन किया और उन्हें घर बुलाया। डॉक्टर ने उसे इंजेक्शन दिया और लड़का सो गया। मेने उसे अपने बिस्तर पर लिटाया और रजाई उड़ा दी। रात भर मैं उस बच्चे के पास ही बैठा रहा कि कहीं उसे किसी चीज की आवश्यकता न पड़ जाए। मैं उसके पास उसके सिराहने पर बैठा रहा। मुझे नींद भी नहीं आई। मन मे अलग ही तूफान से उमड़ पड़ा। हजारों सवाल जहन में चल रहे थे पर जवाब कुछ नहीं था।

रातभर मैं बस यही सोचता रहा कि हमारे देश मे कितने ही ऐसे लोग है जिनके पास खाने के लिए दो वक्त की रोटी नही है। पहनने के लिए कपड़े नहीं है, रहने के लिए कोई छत नहीं है। हम लोग जिनके पास सब होता है उन्हें किसी चीज की कोई कदर नहीं होती है और जिनके पास नहीं होता वो बस तरसते ही रह जाते हैं। हम लोग इतना खाने फेंकते है इससे अच्छा अगर वो खाना हम किसी गरीब को खिलाएं तो उसका पेट भर जाय। न जाने हम हर महीने कितने कपड़े खरीदते हैं और मन किया तो पहना वरना उन्हें ऐसे ही पटक देते है। इससे अच्छा तो हम किसी गरीब को वो कपड़ा दे तो उसकी ठंड से सुरक्षा हो सकती है। सारी रात इसी उधेड़बुन में निकल गयी और न जाने कब सुबह हो गयी।

सुबह नहा धोकर मैं ऑफिस के लिए निकल पड़ा तो भी रास्ते मे यही सोचता जा रहा था कि क्या करूँ ऐसा जिससे लोगो की मदद कर सकूं। ऑफिस पहुँचा तो वहां अपने साथियों से इस विषय पर चर्चा की। सभी एकदम शांत भाव से सारा मामला सुन रहे थे और भाव विभोर हो उठे। मैने उनके सामने एक प्रस्ताव रखा कि क्यो न हम घर घर जाकर लोगों से पुराना कपड़ा एकत्रित करे जिन्हें वह इस्तेमाल भी नहीं करते और एक दिन सभी गरीबों में उन्हें बांटा जाए। सभी ने कुछ देर सोचा और आखिर में सहमति दे दी।

अब हमे घर घर जाकर लोगों से मिलना था इसके लिए हमने दो दो लोगों के अलग अलग समूह बना लिए और इनटरनेट पर भी सोशल मीडिया के जरिये इस खबर का प्रचार किया कि जरूरतमंदों के लिए अधिक से अधिक संख्या में योगदान देकर सहायता करें और गरीबो की ओर बढ़ाये हमारे इस कदम को सफल बनायें। इसके लिए हमने एक स्थान निश्चित किया जहां लोग आकर स्वयं भी कपड़े देकर जाते थे। उस जगह को कपड़ा बैंक नाम दिया। कुछ दिनों तक हम घर घर जाकर लोगों से कपड़े इकट्ठे करने लगे। कुछ मन कर देते तो कुछ समझाने पर सहायता के लिए तैयार हो जाते थे। हमने सभी कपड़े एकत्रित करके उनकी अलग अलग छटनी की जैसे-बच्चो के लिए अलग, महिलाओं के लिए अलग, पुरुषों के लिए अलग आदि। कुछ कपड़े ऐसे भी थे जो थोड़े फ़टे हुए थे उन्हें हमने सिलाई कर पहनने लायक बनाये।

अब वो दिन आया जब हमे इन्हें वितरित करना था।उससे एक दिन पहले हमने गरीबो की बस्ती में जाकर उन्हें इस विषय मे सूचित किया। जिससे अधिक से अधिक संख्या में लोग पहुँच सके।देखते ही देखते वहां लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। वहाँ हमने उन लोगों के लिए खाने पीने की भी व्यवस्था की। एक एक करके बारी बारी से सभी को कपड़े दिए गए। सभी बच्चे बड़े सभी बहुत खुश थे। जो भी इंसान वहाँ आया सभी ने हमारे इस कार्य की बहुत प्रशंशा की और हमे बहुत आशीर्वाद भी दिए।

कपड़े वितरण का कार्य समाप्त कर जब मैं घर पहुँचा तो पापा ने मेरी पीठ थपथपाते हुए मुझे ढेरों आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दी और कहा- ऐसे ही समाज की सेवा करते रहना। उसके बाद मैंने और भी अलग अलग तरह से गरीबों की सहायता करने के प्रयास किये। गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए संस्कार केंद्र चलाया, जहाँ बच्चे मुफ्त में शिक्षा प्राप्त करते है। पापा भी बस्ती के गरीब बच्चों को अपने साथ घर लाते और उन सभी को खाना खिलाकर तोहफे देते।

वो रात मेरी जिंदगी की यादगार रात बन गयी जिसने मुझे इंसानियत सिखाई और एक अच्छा इंसान बनाया। जिससे मैं गरीबो के हित में कुछ कार्य कर सका। जरूरतमन्दों की सहायता करके दिल को बहुत सन्तोष प्राप्त होता है और सच्ची खुशी मिलती है।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational