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Shubhra Varshney

Drama


4.5  

Shubhra Varshney

Drama


मां का बक्सा

मां का बक्सा

8 mins 202 8 mins 202

घर में खुशियों का माहौल था।

जब से नए मकान की डील पक्की हुई थी.... बच्चे तो बच्चे आरती भी बड़े घर में शिफ्ट होने की प्लानिंग को लेकर बहुत उत्साहित थी। हालांकि बच्चे अपने इस घर से ही खुश थे उन्हें पता था ...नए घर में यहां बनाए मित्र बिछड़ जाएंगे।

बड़ी पैकिंग तो मूवर्स पैकर्स को करनी थी लेकिन अपनी छोटी पैकिंग करने में सब ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। और मैं .....मैं कहां उत्साह में पीछे था ।पॉश कालोनी में बड़ा सा मकान लेने का मेरा बरसों का सपना जो साकार होने वाला था।

फाइनल पेमेंट करना बाकी रह गया था.... कल पेमेंट के साथ घर का पजेशन मिलना था।

ऐसा नहीं था मैं इस मकान में जिस में बरसों से रह रहा था उस से खुश नहीं था बल्कि अब जब मैंने प्रमोशन पर प्रमोशन पा लिए थे तो फिर यह मकान मुझे अब मेरे क्लास का नहीं लगता था।

बचपन से ही पढ़ने में मेरी जुझारू प्रवृत्ति ने मुझे ना सिर्फ उस छोटे कस्बे से इस बड़े महानगर में ला दिया था बल्कि धीरे-धीरे यहां पर जमा भी दिया था।

मिनी और गोलू आपस में झगड़ रहे थे कि कौन से खिलौने ले जाने हैं और कौन से छोड़ने हैं । मम्मी ने जो कह दिया था," नए घर में कबाड़ नहीं ले जाना है दोनों देख लो बस एक कार्टन खिलौना ही जाएगा।"

मम्मी के दिए कार्टन में अपने अपने खिलौने भरने में दोनों की होड़ लगी हुई थी।

खुद आरती भी परेशान थी पिछले दस सालों से उसमें दुनिया भर का सामान अपने इस आशियाने में जमा कर लिया था अब उस सोसाइटी में कौन सा फिट होगा कौन सा नहीं यह सोच सोच कर उसे उन्हें अलग करने में बड़ी माथापच्ची हो रही थी।

हालांकि इस सोसाइटी में उसे सालों हो गए थे रहते ...तो छोड़कर जाने का उसका भी मन नहीं था।

 दो दिन बाद गृह प्रवेश था और कल शिफ्ट करना था।

आरती बैठकर गृह प्रवेश में बुलाए जाने वाले मेहमानों की लिस्ट बना रही थी ।अपने सभी रिश्तेदार उसने लिस्ट में जोड़ लिए थे फिर कुछ सोचकर मुझसे बोली," आपके ऑफिस की कुलीग्स के अलावा मैंने आपकी कुछ फ्रेंड्स को भी लिस्ट में लिख लिया है देख लो किसी और को तो नहीं बुलाना है"

मैं समझ रहा था उसका इशारा मेरे बड़े भाई के परिवार की तरफ था जिनसे मैं पिछले तीन सालों से अपने सब संबंध खत्म कर चुका था।

"नहीं मेरे ऐसी कोई खास मित्र नहीं है इनके अलावा तुम्हें जो ठीक लगे उन्हें बुला लेना", कहता हुआ मैं नजर चुराता वहां से हट गया था।

शिफ्ट का दिन आ गया हमारी छोटी-छोटी पैकिंग को मूवर्स और पैकर्स उन्हें बड़ी पैकिंग का रूप देने लगे।

दोनों कमरों के बेड खुल गए थे, डाइनिंग टेबल भी अन-असेंबल होकर अब किनारे खड़ी थी।

किचन में आरती मूवर्स पैकर्स के आए लोगों के साथ सब सामान रख रखवाने में लगी थी।

रोज के चलते बर्तन और डिब्बे उसने एक तरफ कबाड़ के लिए रख दिए थे उसका कहना था नए घर में अब वह नई क्रोकरी निकालेगी।

मिनी और गोलू अपना खिलौनों का तैयार किया हुआ कार्टन और ढेरों कॉपी किताबों के साथ लॉबी में आ चुके थी।

एक पैकिंग मिनी की अपनी जिमनास्टिक में जीती हुई ट्रॉफी और मेडल की थी, जिसे लेकर वह बहुत उत्साहित थी कि अब नए घर में जाकर उसे फ्रेम में सजा देगी। मम्मी ने इसके लिए एक फ्रेम तैयार करा दिया था।

आखिर नई सोसाइटी में जाकर इंप्रेशन अच्छा जो पड़ना चाहिए।

पैकिंग करते करते बारी आई स्टोर रूम में पड़े भारी भरकम लोहे के बक्से की।

मां का बक्सा... ना जाने मां इसमें क्या-क्या रखती थी जब तक मां जीवित थी बच्चों का कमरा उसका था।

दोपहर को सब कामों से निबट कर जब आरती सोने जाती तब मां का बक्सा खोले खटर खटर करना उसे खिजा देता वह अक्सर मुझसे शिकायत करती तो मेरा उससे बस यह कहना होता मां के पास एंटरटेनमेंट का बस यही एक जरिया था।

पिताजी के कुछ साल पहले गुजर जाने पर मां बिल्कुल अकेली हो गई थी कस्बे में ज्यादा मेडिकल फैसिलिटी ना होने के कारण मैं भाई के पास से मां को ले आया था।

कस्बे में बनी उस पुराने मकान में मैंने अपनी दावेदारी नहीं छोड़ी थी ।

सब तरह से संपन्न और सक्षम होने के बाद भी मैं बड़ी बेशर्मी से उस मकान पर बराबर का दावा किए रहता था मां मुझे अक्सर समझाती मेरे बड़े भाई के पास पिताजी की उस दुकान, जिस पर उन्होंने पूरी जिंदगी काट दी, के अलावा सिर्फ यही मकान था।

जैसे-जैसे में प्रमोशन पाता गया मुझे अपना शहर में लिया हुआ यह मकान भी अब मेरे क्लास का नहीं लगता था, इस वजह से मैंने सब तरफ से पैसे इकट्ठा कर बड़ी सोसाइटी में मकान लेने का प्लान करना शुरू कर दिया।

इस बात के चलते एक बार जब मैं अकेला अपने उस कस्बे के मकान में पहुंचा था और यह देखते हुए भी कि भाई बड़ी मुश्किल से अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा था मैंने उसमें से आधा हिस्सा मांगा।

भाई भाभी दोनों ने मुझसे कोई बहस नहीं की .....हां जब लौटकर शहर आया तो मां ने जरूर मुझसे पूरे हफ्ते भर झगड़ा किया था।

मुझे लगता यह सब मां भाई के भड़काने पर करती थी।

रात में मां चुपचाप भाई से फोन पर बातें करती... अक्सर भाई की मां को चिट्ठी भी आती जो मां अपने पास रख लेती थी... मुझे लगता है मेरे खिलाफ दोनों प्लानिंग बनाते .... मेरी शंका में आग में घी डालने का काम करती आरती जो कहती, "देखना मां तुम्हें उस मकान में बिल्कुल भी हिस्सा नहीं देंगी।"

बस मेरी अपना हिस्सा लेने की इच्छा और भी बलवती हो जाती।

दो साल पहले जब मां गुजरी तो मैंने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी भाई के सामने मैंने शर्त रख दी थी कि जब तक वह मुझे आधा हिस्सा नहीं देगा मैं मां की क्रिया कर्म में उसे शामिल नहीं होने दूंगा। नए मकान लेने की प्रबल इच्छा ने मुझे अंधा लालची बना दिया था।

भैया आए और साथ में मेरे हिस्से की जमीन के कागजात भी।

सबसे पहला काम मैंने अपना हिस्सा बेचकर करा.... भैया को आंगन में दीवार लगानी पड़ी थी और अपनी गृहस्थी भी सिकुड़ कर छोटे हिस्से में करनी पड़ी थी।

मैं बेशर्म तो बस यही सोचता रहा कि कस्बों में ऐसे ही रहा जाता है इन्हें क्या जरूरत है शोऑफ करने की।

घर का हिस्सा बिकते ही मैंने सबसे पहले भैया से संबंध खत्म करें उन्होंने मुझे मेरा हिस्सा देने में मुझे इतना परेशान जो कर दिया था।

आज पैकिंग के वक्त मां का बक्सा एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर गया। आरती कब से बताई जा रही थी हमारे नए आशियाने में यह टाट के पैबंद का काम करेगा यह बात मैं भी अच्छी तरह से जानता था... पर मेरे पत्थर दिल में अभी भी मां के लिए जगह बची थी तो बक्से को लेकर में कोई निर्णय नहीं कर पा रहा था।

आरती ने कबाड़ी वाले को बुलवा भेजा था मैंने मूवर्स एंड पैकर्स वालों को अभी उस बक्से को छोड़ देने को कहा था।

लंच ब्रेक में बोलो खाना खाने चले गए और आरती मेरे कहने पर बच्चों को लेकर बाहर रेस्टोरेंट में खिलाने ले गई और मैं बैठ गया उस बक्से को आखरी बार टटोलने।

जंग खाने लगा बक्सा दम लगाने पर खुला कई दिनों से बंद हो जो पड़ा था यह कह लीजिए सालों हो गए थे इसको बंद पड़े ।

बक्सा खुला और खुल गया यादों का पिटारा।

हाथ से टटोला तो देखा हाथ आई मां की हाथी दांत की बनी सिंदूर दानी जो पिताजी ने उन्हें उनके जन्मदिन भेंट करी थी , टूट जाने के बावजूद भी पिताजी का उपहार होने के कारण उन्होंने उसे अपने से अलग कभी भी नहीं किया।

हाथ में आए कुछ फोटो, जो मेले में जाकर दोनों भाइयों के मां ने खिंचवाए थे और मुझे याद दिला गए.... मेले से जब घर आकर मेरा खिलौना टूट गया था तो मुझे रोता देखकर भैया ने एक मिनट भी मुझे अपना खिलौना देने में नहीं लिया था।

और टटोला तो हाथ आई एक टूटी छड़ी जो पिताजी ने मेरे पहली बार उन्हें गलत बोलने पर उठाई थी.... कितना रोई थी माँ मुझे पिटता देखकर... कितनी देर और पिटता अगर भैया ने मुझे ना बचाया होता।

कई सारी चीजें हाथों से आती जाती रही।

तभी हाथ में आया कागजों का पुलिंदा.... भैया के मां को लिखे पत्र थे... मेरा मन कड़वाहट से भर गया।

यही तो वह थे.... जिन्होंने मां को भड़काने का काम किया था ना चाहते हुए भी मेरी आंखें उन पर लिखे शब्दों को पढ़ने लगीं ।

जितना मैं पढ़ता जाता उतनी मेरी आंखें आंसू बहाती जाती ।

हर पत्र में भैया ने मां से घर की जमीन मुझे देने की बात कही थी....अब मुझे अच्छे से समझ में आ रहा था मां शायद उन्हें समझाने की कोशिश कर रही थी कि उनके आर्थिक हालात नहीं है कि वह घर के हिस्से करें ।

पिताजी ने मुझे पढ़ाने के लिए कब कर्जा लिया हुआ था इसका पता तो मुझे भैया ने कभी लग नहीं नहीं दिया। अब वह रकम काफी बढ़ गई थी और भैया को ही चुकानी थी।

मां हर बार पत्र में शायद उन्हें इस रकम के कारण ही कह रही थी उन्हें अपने लिए यह घर सुरक्षित रखना चाहिए पर भैया के हर पत्र में मेरे समर्थन में ही शब्द थे।

न जाने कितनी देर में उन्हें लिए बैठा रहा।

आरती आ चुकी थी और साथ में आ चुका था कबाड़ी उस बक्से को वहां से उठाने के लिए।

निर्णय अब मुझे लेना था बक्से को बेचने का।

"आप यह ठीक नहीं कर रहे हैं.... सारी तैयारियां हो चुकी हैं" आरती के स्वर में नाराजगी और बच्चों के चेहरे पर छाई खुशी साफ दिखाई दे रही थी।

मेरे फोन करने के बाद ब्रोकर आधे घंटे में अब घर आ चुका था।

"क्या हुआ एकदम से आपने निर्णय कैसे बदल लिया... इतने कम दामों में इससे बढ़िया विला आपको पूरे शहर में कहीं नहीं मिलेगा" मुझे समझाने में असफल रही आरती गुस्से में बाहर निकल चुकी थी और मैं अब ब्रोकर से सिर मार रहा था।

मैंने मकान की डील कैंसिल कर दी थी.... मूवर्स और पैकर सामान खोल रहे थे.... बच्चे खुशी खुशी और आरती भुनभुनाती वापस सामान लगाने मे लग गयी।

ब्रोकर के घर से जाते ही मैं भी अपने पैतृक निवास चल पड़ा.... भैया से बात करके बचा हुआ लोन निपटाने के लिए।

नाराज आरती अब शांत थी... अपना सालों का तिनके तिनके जोड़कर बनाया आशियाना छोड़ने का उसका मन वैसे भी कम ही था।

वह बच्चों के साथ वापस सामान लगाने लगी .....उस जंग खाए बक्से को वापस कमरे में रखने के लिए उसने पेंट वाले को बुला भेजा था।


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