vijay laxmi Bhatt Sharma

Inspirational


4.1  

vijay laxmi Bhatt Sharma

Inspirational


लॉक्डाउन२बारहवाँ दिन

लॉक्डाउन२बारहवाँ दिन

3 mins 248 3 mins 248

प्रिय डायरी आज इस वैश्विक महामारी कारोना की वजह से लॉक्डाउन को ३३दिन हो गए पर ये ३३दिन इतिहास मे दर्ज हो गये क्यूँकि इन दिनो मे हर उस बात का समय मिला जिसे वर्षों से करना चाहते थे... परिवार साथ मिलकर कैसे रहा करते थे वो अनुभव भी इन दिनो ने हमे कराया... जीवन में ठहराव भी जरुरी है ये भी इन दिनो की देन है.... क्या खोया क्या पाया इससे ऊपर इन दिनो हाथ ने हाथ को सहारा दिया... मुझे कोई पूछे तो मेरे लिये धरोहर हैं ये दिन .... सुख और दुःख तो जीवन के साथ चलते रहते हैं पर जो दुःख में भी सुख ढूँढ ले वही सफल हो जाता है।

खैर, इतना सबकुछ इसलिए क्यूँकि आजकल नये नये विषयों पर चर्चा करने का मन होता है कुछ विषयों पर लेखन भी चल रहा है ... कल ही मेरी कुछ बातें हुईं मेरे बड़े अच्छे परिचित हैं उनसे पसंद और प्रिय के अन्तर पर क्यूँकि ये बड़ा अहम विषय है कई रिस्तों की ग़लतफ़हमी की वजह भी ये दो शब्द हैं... जरुरी नहीं जो पसन्द हो वो आपको प्रिय भी हो... ये बहुत गहन चिंतन का विषय है।

पसन्द आपको कोई भी हो सकता है आपकी रुचि... शौक़ के मुताबिक़ यानी किसी को संगीत पसन्द है तो उसको कोई संगीतकार पसंद हो सकता है/ सकती है ऐसे ही क्रिकेट, सिनेमा कुछ भी पर सभी आपको प्रिय नहीं हो सकते पसंद को प्रिय बनने के लिये एक लम्बा सफर तय करना होता है... किसी का प्रिय होना आसान नहीं ... पसंद को आप बदल सकते हो प्रिय को नहीं।


जैसा मैने कहा पसंद से प्रिय या प्रिय बनना एक परीक्षा के समान है ।रिश्तों में डूब कई गोते खाने होते हैं... तब किनारे मिलते हैं... घने जंगल से गुजर ... पतली पगडंडी पर चल तब कहीं आप किसी के प्रिय हो सकते हैं... यानी जो प्रिय है और जिसको प्रिय है दोनो को एक दूसरे को समान रूप से समझना होता है... प्रिय व्यक्ति की अच्छाइयों और बुराइयों के साथ उसे स्वीकारा जाता है... उस रिश्ते में ठहराव होता है... छोटी छोटी बातों से ये रिस्ता नहीं डगमगाता... सबसे बड़ी बात हम अपने प्रिय व्यक्ति से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं इसलिए जो हमे प्रिय है उसके लिये हम कुछ भी करने को तैयार होते हैं... उसकी खुशी मे हँसते उसके गम मे रोते हैं... प्रिय व्यक्ति या वस्तु हमारे जीवन का हिस्सा होती है जबकि पसंद के साथ ये सब नहीं होता.., इसलिए पसन्द कभी भी बदल जाती है प्रिय कभी नहीं बदलते मन मुटाव होने पर भी वो हमारे दिल में ही घर बना रहते हैं निकलते नहीं वहाँ से.... इसकी पुष्टि आज इस बेमौसम की बरसात ने भी कर दी... जम के बरसा है आज।

प्रिय डायरी आज इतना ही ....

पसन्द प्रिय मे फर्क इतना ही

गंध बास और सुगंध नहीं एक।


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