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sunayna mishra

Tragedy

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sunayna mishra

Tragedy

लाडली

लाडली

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आज यूक्रेन और रूस के मध्य युद्ध के समाचार सुनकर 14 अगस्त 1947 जो मानस पटल पर अंकित वह दिन जो नासूर की तरह सालता रहा , आज वर्षों बाद भी उसका खौफनाक मंज़र मेरी रूह को कपा जाता है, मै 12 वर्ष की अल्हड़ दुनिया की इस हकीकत से बेखबर 13 अगस्त की शाम अपनी सखी सलमा के घर अपनी गुड़िया की शादी सलमा के गुड्डे से रचा रही थी ,लगभग 7 बजे होंगे दनदनाती हुई मेरी बड़ी बहन राखी सलमा के घर आ पहुँची और तिरस्कार भरी निगाह से उन सबको देखते हुए मेरा हाथ कस कर पकड़ा और खींचते हुए अपने घर की ओर चली मेरी समझ मे कुछ नही आया मै रोती बिलखती कहती रह गयी कि मेरी गुड़िया मेरी गुड़िया----

न जाने कहाँ से जलते हुए अंगारे ने मेरे सामने मेरी दीदी को अपने मे समा लिया ,में अवाक खड़ी रह गयी और स्तब्ध रह गयी ,फिर अचानक एहसास हुआ किसी ने मुझे अपने मे छुपा रखा है ,अपने आंसू से भरी आंखे उठा कर देखा और स्वयं को सलमा के दादा की बाहों में महफूज़ पाया ,वे छिपा कर मुझे मेरी मां के पास ले आये और विडम्बना देखिए घर से निकलते ही उनको भी कत्ल कर दिया ,में बदहवास सी बेजान पुतले के समान सब देखती रह गई ,फिर न जाने कब स्यालकोट की ट्रेन अटारी पहुँची ,अटारी पर आवाज़ आईं पाकिस्तान से ट्रेन आगयी मुझे कुछ होश आया मै तो मैने अपनी माँ को तलाशने के लिए उठने का प्रयास किया ,लेकिन उठ नही पा रही थी मेरे कपड़े Bही गीले गीले चिपचिपे लग रहे थे थोड़ा ज़ोर लगा कर में बैठी तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गयी मै अपनी माँ के नीचे दबी और उनके खून से सराबोर एक बार फिर मैंने स्वयं को जगाने का प्रयास किया और संभलते हुए उठ कर ट्रेन से बाहर झाँका ,दो पुलिस वालों ने मेरी हालत देखकर मुझे गोद मे उठा लिया और रिफ्यूजी कैम्प में ले आये ,यहाँ से मेरी ज़िंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ ,जहाँ हर कोई पराया था ,मेरे साथ मेरे परिवार की मीठी यादों के साथ घुला खौफनाक मंज़र था ।,लोगो के घरों का काम करके मैने अपना पेट भरना शुरू किया ,न जाने कहाँ से एक सिख बीवी जो मेरी माँ की परछाई सी मालूम होती थी उन्होंने अपना स्नेह भरा हाथ मेरे सिर पर रखा और उन्ही के संरक्षण ने मेरा जीवन आगे बढ़ने लगा आज मै एक IPS ऑफिसर बनकर देश की सेवा कर रही हूं, फिर भी यह नही समझ पाई कि कुछ राजनैतिक फ़ैसले मानचित्र को बदल देते हैं लेकिन उन यादों का क्या जो सदैव उस स्थान के बारे में ही सोचती रहती हैं जहाँ उनकी नाल गड़ी थी।


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