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कश्मकश [ भाग 6 ]

कश्मकश [ भाग 6 ]

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रिया एकदम सुन्न हो चुकी थी। उस हादसे के बाद तो जैसे न उसे कुछ दिखाई देता था न सुनाई। बस उसकी आती - जाती साँसें उसे ये अहसास दिलाती कि वह जीवित है।

रिया बहुत ही चुलबुले स्वभाव की हुआ करती थी। हर समय बस हँसना - बोलना, नाचना - गाना और हो - हल्ला करना जैसा कि काॅलेज की लड़कियाँ करती है, उसके भी यही शौक हुआ करते थे।

अब तो बस वह चुपचाप बैठी दूर कही टकटकी बाँधे देखती रहती। कब सुबह से शाम हो जाती उसे पता ही न चलता। बँगले की नौकरानी ही उसका खयाल रखती थी। अब भागने का प्रयास करना तो दूर की बात है उसे तो कमरे से बाहर निकलने से ही भी ड़र लगता था। उसे दिन में बेहोश रखने के लिए दी जाने वाली दवाएँ बंद कर दी गई थी। उनकी ज़रूरत ही न थी। उस हादसे ने उसे बदहवास तो पहले ही कर दिया था।

रिया पर उन लोगों ने पहरा भी अब कम कर दिया था। वह पूरी तरह से टूट जो चुकी थी। अब तो उसके मुँह से आवाज़ भी न निकलती थी।

पर जैसे ही रात होती, चारों तरफ का अँधेरा उसे डराने लगता। उसे वही मनहूस काली रात याद आ जाती जिसने उसके जीवन को ही एक अभिशाप बना दिया। वासना के वो घिनोने दृश्य एक बार फिर उसके सामने जीवित हो उठते।

वो हवस का पुजारी बलपूर्वक उसे निर्वस्त्र कर रहा था और वह अपनी लाज का इतना क्रूर हरण होते हुए देख विवश होकर रोने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही थी। उसके नग्न शरीर पर एक परपुरूष का अनचाहा स्पर्श यूँ प्रतीत होता था मानो उसे बिजली के कई तेज़ झटके एक साथ लग रहे हो। उसने कितनी विनतियाँ कि पर रति की वो निर्मम क्रीड़ा तो रुकने का नाम ही न लेती।

और जब वह अपनी चरम सीमा पर पँहुची तो रिया को उस भयानक पीड़ा का अहसास हुआ कि जिसने उसकी चेतना ही छीन ली। किन्तु वह वहशी उस अचेतन बालिका पर भी अपनी काम वासना के कोड़े बरसाता ही रहा। 

"आअआहहह..."

उस पीड़ा के काल्पनिक एहसास से भी रिया कराह उठती और फिर तुरन्त ही मूर्छित हो जाती। फिर उसका अबोध मन उसे एक बार फिर उन अत्याचारों की पीड़ा का अहसास कराता। सारी रात वह क्रूरता की चक्की में इसी तरह पिसती रहती।

    

रिया के जीवन के वो मनहूस 48 घण्टे तो गुज़र चुके थे पर उसका अभिशाप रिया को उसके बाद भी ताड़ित कर रहा था और शायद जीवन भर करता ही रहेगा। उस हादसे की गिरफ्त से वो अपने आप को कभी भी न निकाल पाएगी। उसे हर रात उसी हैवानियत के दर्द से गुज़रना पड़ता था। वो उस पर एक ऐसा अमिट दाग छोड़ गया था जिसे रिया के आँसू कभी नहीं धो सकते थे। वो सारी रात चीखती - चिल्लाती रहती। रिया के लिए कालचक्र तो जैसे वही रूक सा गया था। उसके साथ हुए हादसे का सदमा उस पर हर रात हावी हो जाता।

हादसा तो एक बार हुआ पर उसने उस लड़की पर ऐसा आघात किया कि वो हर रात अनचाही कामक्रीड़ा की पीड़ा से गुज़रने के लिए मजबूर हो गयी थी। उसे जीवन से घुटन होने लगी थी। उसने अपने जीवन का अन्त करने का फैसला कर लिया। रात के अँधेरे में वो बँगले से बाहर निकली। बाहर सागर उफान पर था। अब उसके जीवन में कुछ भी शेष न रह गया था। वह सागर की ओर बढ़ी और उसकी लहरों में समा गई।


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