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Nisha Parmar

Abstract


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Nisha Parmar

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कोरोना त्रासदी में मानव प्रण

कोरोना त्रासदी में मानव प्रण

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अनवरत् प्रवाहित जिंदगी में आया हुआ कोरोना महामारी का ये वार जिसने जीवन के प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया है तो मानव अधीर, व्याकुल और पीड़ा का अनुभव कर रहा, शीघ्र से शीघ्र घरों की कैद से आजादी प्राप्त करना चहता है। आज जब प्रकृति का ये आघात स्वयं मानव पर हुआ तो चारो तरफ त्राहि त्राहि मच गई, इस पीड़ा को सहन नहीँ कर पा रहा है।

और इस पीड़ा की आवाज चारों दिशाओं में गूँज रही है, मगर मानव द्वारा प्रकृति पर किये गये वो अत्याचार जिससे वो धीरे-धीरे तिल तिल मरती रही उसकी दर्दनाक चीख संसाधनों का अंधाधुंद दोहन करती उन मशीनों के नीचे नीचे दब गई जिसमे लोभ और स्वार्थ का शोर करता हुआ इंजन लगा था। आज मानव कोरोना वायरस के ये विष घूँट बड़े ही कडवे लग रहे हैं , किन्तु जो प्रदूषण के जहरीले विष घूँट हमने प्रकृति को सदियों से पिलाये है उस पीड़ा का अन्दाजा शायद मानव इन थोड़े दिनो की कैद से लगा सकता है जो कि कुछ ही दिन की है किंतु प्रकृति की तो सदियों की है।

आज जब हम पीड़ा में है तो कम से कम सबका साथ तो है परन्तु प्रकृति जिसका सम्पूर्ण परिवार धरती , आकाश, जल, पवन, पेड़ पौधे, पक्षी सभी स्वयं खूँन के आँसू रोते रहे कोन किसको चुप कराये।

मानव ने भेंट में वो दर्द दे दिये कि प्रकृति अपनी आँखो के सामने अपने परिवार को दम तोडते हुये देखती रही परन्तु कुछ कर ना सकी, बिलखती रही अपनी विवशता पर , वो विवशता जो मानव ने प्रकृति को उसके सच्चे समर्पण और त्याग के बदले में भेंट स्वरूप दी थी और उस भेंट में था वो कफन जिसको प्रकृती स्वयं अपनी ही लाश पर बिछाने पर मजबूर हो गयी।आज हमारे कारण हमारी अमर प्रकृति की अकाल मृत्यु हो गई।

आज छट पटाता मानव छटपटाती उस मछली से पूछे जो कि नदी के जहरीले जल में जीवन की एक साँस के लिये संघर्ष करते हुये तडप तडप कर मर जाती है, "उन पेड़ो से पुछो उनकी घुटन, जिन पर मंडराता हुआ उनकी मौत का काला धुआँ, जिस धुएँ को हम अपनी जिंदगी की चमक धमक के कल कारखानों से छोड़ते है।

मानव मानवता से सजी वो पावन मूरत है जो करुणा, त्याग, धैर्य, संयम, परोपकार से सुशोभित होती है कैसे हमने अहम्, क्रूरता, स्वार्थ जैसे अवगुणो से अपनी इस सुन्दर प्रतिमा को कुरुप बना लिया। कैसे हमनें अपनी जीवनदायनी लालन-पालन करने वाली, हमपर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली ममतामयि प्रकृति को अपने ही हाथो तहस नहस कर दिया।

क्यूँ ना हम सब फिर से अपनी इस मानवता रूपी प्रतिमा का मानवीयता से सृँगार करे, और प्रण लें कि अपनी प्रकृति के वो सभी कर्ज चुकाएं जो सदियों से हमारे ऊपर है। फिर से प्रकृति के आँसू पोंछकर उसको वो मुस्कुराहटे दें जिनकी वो हकदार हैं, लेकर उसके हाथ से विषभरें धुएँ का प्याला उसको शुद्ध हवा का अमृत पिलाये, अपनी असीमित इच्छाओ को संयम का चोला पहिनाएँ, और इतना ना खोंदे अपनी प्रकृति को कि ये अन्दर से इतनी खाली ना हो जाये कि हम बच्चों को अपने सीने में जगह ना दे पाये, बहुत क्रूरता के खन्जर गाढ़ दिये है इसकी छाती में, अब इसके घावों को भर देते है हरे भरे असंख्य पौधे रोपकर, पशु पक्षियों को लोटा दें उनकी वो प्राकृतिक धरोहर, जिसकी गोद में वो जाने कब से सुकून की नींद नहीँ सो पायें है, वापस दे दे मछली को वो सांसें जो हमारे घोले हुये जहर से जल में छटपटा के मर गयी थी।

प्राकृतिक धरोहर को सहेज कर और सरंक्षित रखने का हमारा ये प्रण सम्पूर्ण मानव जीवन को पुन जीवन्त करेगा और हमारी आने वाली पीढियाँ प्राकृतिक प्रकोप, कोरोना महामारी जैसी त्रासदी के भँवर एवंं जीवन को कैद करने वाले पीड़ादायी दंश से बची रहेगी।


अप्रकाशित एवं अप्रसारित


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