STORYMIRROR

V. Aaradhyaa

Romance Inspirational

4  

V. Aaradhyaa

Romance Inspirational

कदम बढ़ चले

कदम बढ़ चले

10 mins
462

"आज फेस्टिव कपड़ों के लिए 'निवेदिता बुटीक'

का जो इतना नाम है, उसके पीछे मम्मी की लगन और कठिन मेहनत का कमाल है। और मुझे अपनी मम्मी पर गर्व है"। रूबी अख़बार को माइक की शक्ल में मोड़करइंटरव्यू देने की नकल कर रही थी। सुनकर सब हँसने लगे। फिर अपनी बहन से अख़बार छीनकर सोमा ने अपनी मम्मी की इंटरव्यू लेने का नाटक करते हुए कहा। । । "तो निवेदिताजी ! आपकी सफलता का मूलमंत्र क्या है?"निवेदिता ने अख़बार हाथ में लेकर उसे मुँह के पास ले जाकर कहा,"सफलता कोई रातों रात हासिल नहीं होती। छोटे छोटे कदम ही बड़ी मंज़िल तय करते हैं। मुझे मेरे परिवार का भी इसमें बहुत सहयोग मिला "। "ये हुई ना पक्की तैयारी कल के इंटरव्यू की"। अनिर्बान ने ताली बजाते हुए कहा। फिर सब मिलकर हँसने लगे। सबको खुश देखकर निवेदिता रसोई में सबकी पसंद का कस्टर्ड बनाने चली गई। दूध को गाढ़ा होने के लिए गैस पर चढ़ा दिया और उसे चलाते हुए उसकी सोच उसपर हावी होने लगी। निवेदिता सोचने लगी। तीन साल पहले कौन क़ह सकता था कि संकोची सी निवेदिता कभी अपना काम शुरू करेगी और लोगों को उसका काम इतना पसंद आएगा कि उसका अपना एक बुटीक होगा। और कल 'विमेन विद विमेन' पत्रिका के लिए उसका इंटरव्यू लिया जायेगा। ये संघर्ष आसान कहाँ था निवेदिता के लिए। उसे याद आ गया वो दिन जब वो शादी के बाद कोलकाता से बिलासपुर आई थी। हर साल तो वो सब दुर्गापूजा में अपने परिजनों के साथ त्यौहार मनाने कोलकाता चले जाते थे। पर उस साल अनिर्बान को छुट्टी नहीं मिल पाने की वजह से नहीं जा पाए तो निवेदिता बिलासपुर में ही दुर्गापूजा मनाने की तैयारी करने लगी। बंगाल में दुर्गापूजा यानि दशहरा बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। निवेदिता ने सोचा यहाँ भी वैसी ही धूम होगी। पर जब उसे अपने मन लायक रेडीमेड ब्लाउज नहीं मिल पाया तो वो थोड़ी उदास हो गई। दरअसल जब निवेदिता दुर्गापूजा के लिए ली गई अपनी सुंदर तांत सिल्क की साड़ी के लिए रेडीमेड ब्लाउज ढूंढने बाजार गई थी तो उसे अपने लिए उस कट और डिज़ाइन का रेडीमेड ब्लाउज नहीं मिला जैसा वो पसंद करती थी। अव्वल तो रेडीमेड ब्लाउज की इक्का दुक्का दुकानें ही थी।

और उनमें जो ब्लाउज उसे दिखाए गए वो बहुत ही साधारण थे जो उसे बिल्कुल पसंद नहीं आए। जबकि कोलकाता में तरह तरह के खूबसूरत डिज़ाइन वाले सिले सिलाए ब्लाउज मिल जाते थे। तब दोनों बेटियाँ बहुत छोटी थी। रूबी तो बहुत छोटी थी, लगभग सात साल की और सोमा बारह साल की। दोनों बच्चियों को सँभालने स्कूल लाने ले जाने में और अनिर्बान की ज़रूरतों का ध्यान रखने में उसे अपने लिए वक़्त एकदम नहीं मिल पाता था। और इसी रोज़मर्रा के काम के तहत उस साड़ी का मैचिंग ब्लाउज बनवाना उसके दिमाग़ से एकदम उतर गया था। जब त्यौहार के दो दिन पहले उसे याद आया तो सोचा कोई नहीं रेडीमेड ब्लाउज ले लेगी। कोलकाता में तो हर तरह के ब्लाउज रेडीमेड मिल जाते हैं पर यहाँ बिलासपुर में नहीं मिलना था तो नहीं मिले। बहुत ढूंढने पर भी जब अपने मन मुताबिक ब्लाउज नहीं मिला तो निवेदिता बहुत उदास होकर घर लौटी। इतनी जल्दी कोई दर्ज़ी भी नहीं सिलकर देता। वो त्यौहार के दिन कोई और साड़ी पहनने का सोचने लगी जिसका मैचिंग ब्लाउज पहले से बना हुआ था। "साल भर का त्यौहार और निवेदिता की सुंदर तांत की साड़ी के साथ मैचिंग ब्लाउज नहीं ? ओहो, बहुत बेइंसाफी है ये "। अनिर्बान ने उसे प्यार से चिढ़ाया। उस वक़्त तो निवेदिता हँसकर टाल गई पर फिर उसके मन में आया आज क्यूँ ना खुद ब्लाउज सिला जाए। स्कूल में दसवीं क्लास में ऐच्छिक विषय होम साइंस ले रखा था उसने। उसमें कटिंग में फ्रॉक और ब्लाउज बनाना भी सिखाया गया था। बस फिर क्या था। निवेदिता में खुद अपना ब्लाउज सिलने का ऐसा जोश आ गया कि रात भर जागकर उसने लेस गोटा लगाकर एंटीक ब्लाउज तैयार कर लिया।

फिर दिन में गले और बाँह पर मोती टाँककर उसे और भी खूबसूरत बना दिया। पूरा बन जाने के बाद उसे साड़ी के साथ पहनकर फिटिंग चेक कर ही रही थी कि तभी अनिर्बान ऑफिस से आ गया। निवेदिता को थोड़ी चुहल सूझी। उसने बड़ी सी लाल बिंदी लगाई और एकदम पूजा में जाने को जैसे तैयार होते हैं वैसे ही सजधजकर अनिर्बान के पास पहुँची। तब तक बिटिया ने दरवाजा खोल दिया था। और अनिर्बान बाथरूम से फ्रेश होकर बाहर निकल ही रहा था कि सामने सजी संवरी पत्नी को देखकर उसका मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। इसी हड़बड़ाहट में अनिर्बान के हाथ से तौलिया गिर गया। उसे इस हाल में देखकर निवेदिता को हँसी आ गई। अनिर्बान ने पूछा,"अरे, कब ले आई इतनी सुंदर ब्लाउज खरीदकर?"उत्तर में मंद मंद मुस्कुराकर निवेदिता बोली,"वो आज मार्केट गई थी तो खरीद लाई।

बताओ तो कितने की होगी ?" "वाह। ।कम से कम पाँच सौ से सात सौ तक की होगी और क्या। " अनिर्बान ने कहा। "ना ना इसे मैंने खुद बनाया है जी "निवेदिता के बताने पर एकबारगी अनिर्बान को यकीन ही नहीं हुआ। फिर जब निवेदिता ने कपड़ों की कतरनें दिखाई तब वह अपनी पत्नी की इस छुपी हुई प्रतिभा का कायल हो गया। उसने उसकी बहुत तारीफ की। फिर हँसकर बोला,"अगर तुम इसे अपना बिज़नेस बना लो तो बहुत पैसे कमा सकती हो। इतनी सुंदर और एकदम अलग डिज़ाइन तो बड़े बड़े डिज़ाइनर बनाते हैँ सेलिब्रिटीज के लिए। ""अब रहने दो, मुझे ज़्यादा चने के झाड़ पर चढ़ाओ मत "उस दिन निवेदिता इतराकर बोली थी। और उस दिन अनिर्बान की मज़ाक में कही बात अब सच हो गई थी। बात अगर सिर्फ अनिर्बान की तारीफ की ही रहती तो शायद निवेदिता उसके बाद और कोई ब्लाउज सिलती की नहीं सिलती पता नहीं। पर उसके बाद दुर्गापूजा में जब वो उस तांत की साड़ी के साथ वो स्पेशल बंगाली स्टाइल की ब्लाउज पहनकर घूमने गई तो लगभग हर किसी ने उसकी तारीफ की। जो उसे जानती थी उसने उसे आकर पूछा कि ये ब्लाउज कहाँ से लिया।

कितने में लिया आदि। और जो उसे नहीं पहचानते थे उनलोगों ने भी प्रशंसात्मक नज़रों से उसके पहनावे और उसके बेहद खास ब्लाउज के डिज़ाइन को एकबार पलटकर ज़रूर देखा। बंगाल का प्रसिद्ध दुर्गापूजा अक्सर महिलाओं को अपनी सुंदर सुंदर साड़ी के प्रदर्शन का अच्छा सा अवसर ज़रूर दे देता है। और इसबार बिलासपुर के रेलवे कॉलोनी के दुर्गापूजा पंडाल में निवेदिता के उस ब्लाउज की बड़ी तारीफ हुई। और जब निवेदिता बताती कि ये ब्लाउज उसने खुद अपने हाथों से बनाया है तो सब कहती मेरे लिए भी बना दो। अनिर्बान भी लगभग हर पंडाल में निवेदिता के साथ साथ ही चल रहा था। और अपनी पत्नी की कला की तारीफ सुनकर गर्व का अनुभव कर रहा था। जिस दिन विजय दशमी की पूजा सिंदूर खेला वगैरह समाप्त हुआ उस दिन तक अनिर्बान कुछ सोच चुका था। उसने दुर्गापूजा खत्म हो जाने के बाद निवेदिता से अपना खुद का काम शुरू करने की सलाह दी। निवेदिता को बुरा ना लगे इसलिए ये भी कहा कि, सिर्फ पैसे के लिए नहीं उसे अपनी इस छुपी हुई प्रतिभा को सबके समक्ष लाने के लिए भी ऐसा करना चाहिए। पहले तो निवेदिता घर के काम की व्यस्तता और बच्चों की देखभाल का हवाला देती रही पर फिर अनिर्बान ने जब अपनी तरफ से भी पूरा सहयोग देने की बात कही तो मान गई। आज भी निवेदिता को याद है सबसे पहले उसने सहेली मिताली का ब्लाउज बनाया था।

जो बाकीसारी सहेलियों को भी बहुत पसंद आया था। वो तोएक पैसा नहीं लेना चाहती थी पर मिताली उसे ज़बरदस्ती डेढ़ सौ रूपये पकड़ा गई थी। उसकी पहली मेहनत की कमाऊ डेढ़ सौ रूपये। तब उसने उसे संभालकर मंदिर में आरती की किताब में रख दिया था। "डेढ़ सौ रूपये" याद करके एक स्मित सी मुस्कुराहट आ गई निवेदिता के चेहरे पर। और अब वो एक ब्लाउज सिलने का डेढ़ हजार से दो हज़ार रूपये तक लेती है। ज़्यादा काम हो तो किसी किसी ब्लाउज की सिलाई, डिज़ाइन वगैरह मिलाकर पाँच छः हज़ार भी चार्ज करती है। और दुल्हन का सेट बनाना हो तो तीस चालीस कभी कभी पचास हज़ार तक भी मिल जाते हैँ। थोड़ा थोड़ा काम शुरू करके उसने फिर डिज़ाइनर कपड़ों की कटिंग का कोर्स किया। फिर निवेदिता को लगा कि सिर्फ ब्लाउज की सिलाई से उसका क्षेत्र उतना विकसित नहीं हो पाएगा तब उसने लहँगा, खास मौके पर पहने जानेवाले डिज़ाइनर सलवार सूट, अंगरख्खा आदि भी बनाना शुरू किया। एक तो उसमें कुछ सीखने और नया करने की लगन बहुत थी और फिर अनिर्बान ने भी उसका बहुत साथ दिया था। उसने निवेदिता को सोशल मिडिया अकाउंट और इंस्टाग्राम पर अपने काम को सुनियोजित तरीके से पोस्ट करना सिखाया। अबतो मोती और गोटा वगैरह का रँग चुनने में बेटियाँ भी मदद करने लगी थीं। कुल मिलाकर परिवार की तरफ से भी पूर्ण सहयोग मिला था निवेदिता को और बाहर वालों की सराहना जब उसे मिलती तो वह नए उत्साह से काम में जुट जाती। उसके काम की गूंज जब दूर तक फैलने लगी तो उसे ज़्यादा समय बुटीक को देना पड़ता था तब उसने दो सहायिका और दो टेलर भी रख लिए।

साथ साथ घर और बच्चे हमेशा उसकी प्राथमिकता रहे, उसने घर के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी में कभी कोई कमी नहीं की। पहले अपने ड्राइंग रूम के एक कोने में सिलाई मशीन रखकर शुरू किया गया काम आज सदर बाजार के 'निवेदिता बुटीक' में तब्दील हो चुका है। और ये सफलता उसे रातों रात नहीं मिली है धीरे धीरे चलकर उसके कदम मंज़िल तक पहुँचे हैँ। उसके काम की बारीकी और विविधता उसकी पहचान बन चुके हैं। आज उसका काम और उसका विनम्र व्यवहार लोगों को इतना पसंद आता है कि त्योहारों और खास मौकों पर महिलाऐं उसके बुटीक से बने या पहले से सिले सिलाए कपड़े लेना बहुत पसंद करती हैँ। वो सिर्फ उनके दिए कपड़े सीधे सीधे नहीं सिलती बल्कि उसमें अपनी किसी साड़ी की चमकीली पाढ़ या कभी किसी दुपट्टे की मोटा गोटा या फिर कभी किसी माला का मोती टांककर एकदम अलग और बेहद खास बना देती। और उस ड्रेस की कॉपी फिर कहीं नहीं मिलती। सबको अलग और खास दिखने की जो अदम्य चाहत होती है वो निवेदिता भली भांति समझ चुकी थी, इसलिए उसका हर डिज़ाइन अलग होता और खूबसूरत भी। कई बार तो कुछ धनाढ्य महिलाएँ मुँहमांगी कीमत पर ड्रेस खरीदकर ले जातीं। कभी कभी एक साथ बहुत डिमांड हो जाती है इसलिए कुछ ड्रेस और ब्लाउज वो पहले से ही सिले सिलाए रखती है।

इस वजह से उसके बुटीक की एक अलग ही पहचान बन चुकी है। और आज वो दिन भी आ गया जब 'वीमेन विद वीमेन' पत्रिका में उसका इंटरव्यू छापने के लिए उसे कल स्टूडियो बुलाया जा रहा है। उसके काम से उसे जब अच्छे पैसे मिलने लगे तब बाजार में अपना बुटीक खोल लिया। इन वर्षों में उसकी आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ होने के साथ उसका अपना आत्मविश्वास भी काफ़ी बढ़ गया है। पता नहीं निवेदिता कस्टर्ड के दूध को अपनी सोच के साथ और कितना गाढ़ा करती कि तभी अनिर्बान उसे बुलाने रसोई में आया और प्यार से उसके गाल पर हाथ लगाया ही था कि ये क्या ? चौंक गया अनिर्बान। आँखों में आँसू और होंठों पर मुस्कान लिए निवेदिता हाथ का काम छोड़कर उससे लिपट गई। अनिर्बान के लिए अपनी पत्नी का ये रूप एकदम नया था। फिर जब निवेदिता ने उसे बड़े प्यार से देखते हुए थैंक्यू कहा तो अनिर्बान ने कहा,"ये सब तुम्हारी मेहनत और लगन का कमाल है। अब चलो कस्टर्ड खिलाकर सबका मुँह मीठा कराओ। "सबने बड़े चाव से कस्टर्ड खाया। उस रात सोते हुए निवेदिता अगले दिन इंटरव्यू में पूछे जाने वाले संभावित सवालों के बारे में सोच रही थी और मन ही मन में जवाब की भी तैयारी कर रही थी। यक़ीनन आनेवाला दिन बेहद खास था। आखिर उसने छोटे छोटे कदमों से मेहनत और लगन के साथ मंज़िल तक का रास्ता जो तय कर लिया था। सफलता पाना आसान नहीं पर नामुमकिन कुछ भी नहीं। यह सही है कि सफलता अचानक नहीं मिलती। एक बड़ी सफलता के लिए छोटे छोटे प्रयास करते रहना पड़ता है तभी हमारे ख्वाहिशों के आसमा में सितारे जगमगाते हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Romance