Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Inspirational


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Vijay Kumar उपनाम "साखी"

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कायरता

कायरता

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सिंहपुर में राजा केशवर्धन का राज्य था। वह प्रजा का ख्याल अपने पुत्र के जैसे रखते थे। उनका एक ही पुत्र था। उनके पुत्र का नाम कालवर्धन था। वह अपने पिता के गुणों के विपरीत था। वह एक निदर्यी राजकुमार था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया उसके अवगुणों में और वृद्धि होती गई। धीरे -धीरे उसके पिता के दिमाग से राजकुमार उतरते गये और एकदिन राजा केशवर्धन ने तो यहां तक कह दिया की यह उनका उत्तराधिकारी नहीं होगा। अब राजकुमार अपने ही पिता को रास्ते से हटाने की सोचने लगा। जब राजकुमार 21 साल का युवक था। उस समय, उसने सेनापति को पैसे का लोभ देकर अपनी तरफ मिला लिया। एकदिन अचानक जब उसके पिता सोये हुए थे, उसने उनको ही बन्दी बना लिया। उसने ख़ुद को सिंहपुर का सम्राट घोषित कर दिया। अब दिनोंदिन प्रजा पर उसके अत्याचार बढ़ने लगे। वह हर माह एक नया कर लगाने लगा। उसी राज्य में विक्रम नाम का एक युवक रहता था। वह एक ईमानदार ,नेक दिल, सत्य पथ पर चलने वाला युवक था। उसने शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा अपने गुरु गोविन्दाचार्य से ले रखी थी। अपने गुरु को उसने वचन दे रखा था की वह सदा अन्याय और अधर्म का प्रतिकार करेगा। वह सिंहपुर की प्रजा को समझाता की अन्याय सहना,अन्याय करने से भी बड़ा पाप है। सब लोग उसे लड़ाकू कहने लगे थे। क्योंकि विक्रम छोटी-छोटी बातों पर ही लोगो से बहस कर बैठता था। एक दिन वह गाँव में किसी निरीह प्राणी के ऊपर ज़ुल्म होता देखकर सिंहपुर की सेना से उलझ गया। उस समय वो सैनिक संख्या में 24 थे। विक्रम उनसे लड़ने लगा, पर पीछे से एक सैनिक ने विक्रम के वार कर दिया, विक्रम बेहोश हो गया। उसे राजदरबार में लाया गया। सभी तथ्य उसके ख़िलाफ़ थे। राजा बने कालवर्धन ने विक्रम को देश निकाला दे दिया। उसकी इस सज़ा से सभी गाँव वाले बहुत खुश हुए। गाँव वाले कहने लगे, आया बड़ा सच का उपदेश देने,अब पड़ा रहना गाँव से बाहर। विक्रम उनकी बातें सुन रहा था। उसकी आँखों मे आँसू आ गये, में भी किन कायरों को जगाने का प्रयास कर रहा था जो की मर चुके है। विक्रम राज्य से बाहर झोपड़ी बनाकर रहने लगा। वहीं वह खेती करता, भगवान की भक्ति करता। वहीं वह मज़े से अपनी जिंदगी गुजारने लगा।

इधर सिंहपुर में लोग त्राहि त्राहि करने लगे। हर माह नया लगान, लगने से आम प्रजा की हालत बदतर होने लगी। उसी साल राज्य में भीषण अकाल पड़ गया। पर कालवर्धन ने लगान वसूलना बन्द नहीं किया। लोगों की हालत अब बद से बदतर होने लगी। अब सब को विक्रम की बातें याद आने लगी। जियो चाहे कुछ पल के लिये ही मगर शेर बनकर गीदड़ बनकर नही। सत्य पर प्राण न्यौछावर करने वाले मरते नहीं बल्कि अमर हो जाते है। अधर्म करने वाला उतना बड़ा अधर्मी नहीं है, जितना अधर्म सहनेवाला। गाँव के सभी युवा लोग एकदिन एकत्रित होकर विक्रम के पास गये, भाई विक्रम हमें उस अधर्मी राजा कालवर्धन के अत्याचारों से बचा लो। विक्रम बोला, तुम्हें मेरी क्या जरूरत है, तुम सबको तो ग़ुलामी और अत्याचार सहने की आदत पड़ी है। जियो गुलामों की तरह, मरो सुअरों की तरह। सभी नवयुवक विक्रम के चरणों मे गिर गये। प्लीज विक्रम भाई हमे माफ़ कर दो। अब से हम न अत्याचार सहेंगे,न अत्याचार होने देंगे। विक्रम उनकी बात मान गये। सबसे पहले चोरी-चोरी,चुपके-चुपके सिंहपुर के नवयुवकों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देना लगा। वह इतनी चतुराई से काम कर रहा था की उसने कालवर्धन को कानोंकान खबर नहीं होने दी। विक्रम उन्हें छापामार युद्ध की ट्रेनिंग देने लगा। विक्रम को ट्रेनिंग देते हुए 6 माह हो गये। अब उसे भरोसा हो गया की ये सब नौजवान लड़ने के क़ाबिल हो गये है,तो उसने राजमहल पर होली के दिन रात को 10 बजे हमला करने की योजना बनाई। क्योंकि इस दिन सिंहपुर में बड़ा उत्सव होता है। राजमहल के लोग सुरा और सुंदरी में खोये रहते है। विक्रम ने यही वक्त हमला करने के लिये उपयुक्त माना। होली के इसी दिन विक्रम ने राजमहल पर गोरिल्ला युद्ध प्रारंभ कर दिया। एक-एक सैनिक को विक्रम की धीरे-धीरे मारने लगी। राजमहल में पहुंचने के लिये 6 द्वार पार करने पड़ते थे। 5 वां द्वार पार करते-करते कालवर्धन को पता चल जाता है की राजमहल पर हमला हुआ है। वह अपने सैनिकों को अलर्ट करता है,तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अंत मे कालवर्धन और विक्रम के मध्य घमासान युद्ध होता है। इस युद्ध मे कालवर्धन मारा जाता है। सबसे पहले विक्रम महाराज केशवर्धन को छुड़ाता है। महाराज केशवर्धन, विक्रम को सिंहपुर का नया सम्राट घोषित करते है। विक्रम का राजा बनने से पहले उद्धबोधन होता है। वो कहता है,ग़लत काम करनेवाले से अधिक वो अधिक पापी है जो इसे सह रहा है। गलत काम का हमेशा प्रतिकार करना चाहिये। कायरता से बड़ा दुनिया मे कोई पाप नहीं है। वह आदमी उसी दिन मर जाता है,जब वह कायर बन जाता है। जिंदगी चंद पलो की हो,पर शेर सी हो। कायरता तन से नहीं मन से होती है,जिसका मन डरपोक है,वह कुछ नहीं कर सकता बेरोकटोक है। जिसका मन वीर है,वह उठाएगा अधर्म के लिये सदा शमशीर है। इसलिये कायर नहीं बहादुर बनो, इस माटी के लिये अपना वीरता का लहू दान करो।

सत्य की सदा विजय हो

असत्य का सदा नाश हो

कायर नहीं बहादुर बनो

गीदड़ नहीं शेर बनो

तुम्हारा नाम अमर होगा

जयचंद नहीं पृथ्वीराज चौहान बनो।



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