तृप्ति वर्मा “अंतस”

Abstract


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तृप्ति वर्मा “अंतस”

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कामयाबी

कामयाबी

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छोटी-छोटी सी उँगलियाँ , पेंसिल के स्पर्श से मानो साँस लेने लगती थी।फिर धड़कनो की रफ़्तार थाम, सफ़ेद काग़ज़ पर इतरा-इतराकर अपनी कल्पनाओं की दुनिया में घूमती फिरती, मानो कोई शहज़ादी हो।हर कमी को संवारती , हर नक़्श को बेहतर करती , अपने पोरों से रंगो को फैलाकर ख़ालीपन को भरती,बड़ी रॉबिन हुड हुई जाती थी वो उँगलियाँ। उन उँगलियो को किसी भी त्रिकोण,त्रिज्या या परिधि की गणनाओ में उलझना कभी नही भाया। किसी रसायनशास्त्र के समीकरण  या भौतिकी की गति की विवेचना मानो सज़ा थी उनके लिए। 

पेंसिल से कुछ नया उकेरती और  रंगो में खेलती हुई आरोही को, अक्सर माँ आकर ज़ोर से डाँटते हुए बोलती,

“ पढ़ भी लिया कर कभी, ये कलाकारी काम नही आएगी।पी सी एम्/बी ले बच्चे ही कामयाब होते हैं। चल हटा ये सब।” और बेचारी आरोही , माँ की डाँट और उनके दिखाए भविष्य के चित्र से डरकर जल्दी-जल्दी अपनी दुनिया समेट , भिड़ जाती अंको से और चुनौती दे डालती हर ठोस,तरल,गैस के संज्ञान को। पूरे जोश से उतरती थी वो क्षत्राणी इस मैदान में, माँ की बात का ध्यान था उसे। पी सी एम्/बी ही जीवनदायिनी बूटी है, जैसे -तैसे इस पर विजय पानी ही है।लेकिन थोड़ी ही देर में सारा जोश, सारा जुनून ठंडा पड़ जाता और कल्पनाएँ उसे आ घेरती।अब वो अपनी कॉपी-किताबों पर नीली स्याही से कभी फूल बनाती तो कभी अक्षरों को जोड़-तोड़कर एक नया चेहरा बना उससे बातें करने लगती। बस यूँ ही चलता रहा सिलसिला। क्लास में नम्बर अच्छे आना तो अकल्पनीय था। अरे! पढ़ाई लगन से करती तो नम्बर आते ना। आरोही तो अपनी ही दुनिया में रहती। फिर भी जैसे-तैसे पास हुई। घरवालों से जो डाँट पड़नी थी सो पड़ गई , रही सही कसर वो लोग पूरा कर देते थे जिनके बच्चे अच्छे मार्क्स लाकर आई आई टी और पी एम् टी की तैयारी में लगे थे। आरोही की समझ सिर्फ़ इतनी थी कि वो बुद्धु और नालायक है जो कभी अपने परिवार को सुख नही दे पायी।पढ़ाई तो उसके लिए माउंट ऐवरेस्ट की चढ़ाई से भी ज़्यादा मुश्किल काम था। उसे अपना भविष्य अंधकारमयी सा जान पड़ता था। माँ के शब्द उसका व्यक्तित्व गढ़ चुके थे।

पी सी एम्/बी वाले बच्चे ही कामयाब होते हैं”

माँ की भी क्या गलती बेचारी की। वो हमारे कोढ़ी समाज का एक छोटा सा अंश मात्र थी जिसमें आज भी वैज्ञानिको ,गणितज्ञों या इस ज्ञान से जुड़े पेशे वाले लोगों की जो इज़्ज़तअफजाई है उसे देख, उस इज़्ज़त और पैसे को पाने की होड़ में सभी मतवाले है । फिर उन्हें अपनी अंतर्मन की आवाज़ को ही क्यों ना दबाना पड़े। और उनकी इस इच्छापूर्ति के लिए कुकुरमुत्तो की तरह उग आए टेक्निकल और मेडिकल कॉलेज उपलब्ध हैं।

ऐसे ही एक कॉलेज में आरोही को भी दाख़िला मिल गया। 4 साल अटकने-भटकने के बाद आरोही को भी एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी मिल गई। आज आरोही बहुत खुश थी। आज उसे लग रहा था कि माँ ने जीवन बर्बाद होने से बचा लिया।नौकरी प्राइवेट थी।प्राईवेट नौकरी करने वालों की हालत किसी बंधुआ मज़दूर से बस ज़रा ही बेहतर होती है। अगर मुंशी प्रेमचंद आज के समय में होते तो ना जाने कितनी ही उपन्यास और कथाएँ लिख डालते इन शोषक और शोषितों पर।

नौकरी में साल बीते , आरोही को शादी हुई उसी के जैसे किसी पी सी एम्/बी वाले से।बढ़ते परिवार और मात्रत्व की ज़िम्मेदारियों ने आरोही से उसके जीवन के सबसे कठिन और उबाऊ परिश्रम का फल, उसकी नौकरी छीन ली।अभी तक आरोही बेहोशी का जीवन जी  रही थी। ऑफ़िस जाती, पैसे कमाती, मॉल जाकर शॉपिंग करती , पार्लर से लेकर मल्टीप्लेक्स तक के जीवन में आरोही सबकुछ भूल चुकी या कहे कि उसके पास इससे कुछ इतर सोचने का वक्त ही नही था। मगर अब जब वो घर में होती, बच्चों के पीछे भागते-भागते उसे सुबह से शाम हो जाती।अपने लिए समय तो दूर, पैसा भी नही होता था तब वो बड़ी खिन्न-सी हो जाती।उसे तो ये बिल्कुल याद ही नही था कि कैनवास पर उतरी उसकी कल्पनाएँ और रंगो की दुनिया कैसे उसके काले-सफ़ेद मन को खिला दिया करती थी।

एक दिन बाज़ार में उसे उसके बचपन की सहेली शैफ़ाली मिली। शैफ़ाली और आरोही आठ क्लास तक साथ ही पढ़े थे । दोनो की बड़ी गहरी दोस्ती थी। हो भी क्यूँ ना? दोनो का शौक़ एक ही था. स्केचिंग और पेंटिंग का।8वी के बाद विषय अलग होने से दोनो की कक्षा अलग लगने लगी। आरोही को याद था कि शैफ़ाली ने आर्ट्स चुनी थी। आरोही ये सब याद कर आश्वस्त थी कि शैफ़ाली कुछ नही कर पाई होगी जीवन में। बातें खतम कर जब दोनो सहेलियाँ घर जाने लगी तब शैफ़ाली ने एक कॉल किया और थोड़ी देर में एक गाड़ी आती दिखी। आरोही ये देख शैफ़ाली को छेड़ते हुए बोली,”क्या बात है मैडम, बड़ा पैसे वाला पति मिला है तुम्हें?” शैफ़ाली हंसते हुए बोली, “ तुम जानती हो उसे, रोहित याद है ना?” 

“क्या ?रोहित???, वो जो हमारे स्कूल के चपरासी का बेटा था? जिसको फ़ीस माफ़ थी?तुमने उससे शादी की है? वो तो पढ़ाई में बेकार था। हमेशा सिर्फ़ ड्रॉइंग में ही नम्बर आते थे उसके। तुमने क्या सोचकर उससे बुद्धु से शादी की? वो भी गरीब……….”आरोही एक साँस में बोलती चली गई मानो उसे शैफ़ाली की चिंता ने आ घेरा हो, और वो शैफ़ाली की इस गलती के लिए उसे फटकारना चाहती हो।

“आरोही तुम मेरे पति के बारे में बात कर रही हो”, शैफ़ाली ने लहजे में जरा तल्ख़ी लाकर आरोही को बीच में टोकते हुए कहा।

आरोही को अब तक थोड़ा अपनी बेवक़ूफ़ी का अहसास हो गया था। वो अब चुपचाप शैफ़ाली की बात सुन रही थी।शैफ़ाली आगे बात बढ़ाती हुई बोली,” ये क्या अमीर-गरीब, होशियार-बुद्धु  बोले जा रही हो? कोई इंसान अपनी पसंद से गरीब नही होता और ग़रीबी कोई छूत का रोग भी नही है।ग़ुरबत हमारी सोच में होती है। ये बुद्धु और होशियार की बातें तुम कह रही हो? तुम कितनी अच्छी ड्रॉइंग करती थी लेकिन तुमने वो विषय लिए जिनमें तुम हमेशा बुद्धु बनती रही। ना तुमने अपने विषयों को मन से जिया ना ही तुम अपनी रंगो की दुनिया को छोड़ पायी। तुमने मेरे चुने विषयों की हंसी उड़ाई थी आज उसी विषय-ज्ञान के बूते पर मैंने और रोहित ने अपना आर्ट स्कूल खोल लिया है। हम दोनो आज भी पेंटिंग करते है और उतनी ही ख़ुशी से करते है जैसे स्कूल में किया करते थे। और हाँ ! मेरे दोनो बच्चे, हम आपसी सहयोग से सम्भाल लेते है।”

ड्राइवर ने हॉर्न बजाकर कहा,” मैडम जल्दी करिए, ट्रैफ़िक जाम होना शुरू हो गया।” 

शैफ़ाली को अचानक गाड़ी का ख़याल आया, “ओह ! अभी मुझे जाना होगा। हम फिर मिलेंगे।”वो जल्दी से आरोही के गले लगी। और भागकर गाड़ी में जाकर बैठ गयी। गाड़ी चल दी। शीशे नीचे कर शैफ़ाली ने आरोही की तरफ़ बाय बाय करते हुए हाथ हिलाया। आरोही ने भी हाथ हिलाकर शैफ़ाली को विदा किया।

आज इस बात को 2 साल बीत गए थे।शाम का वक्त था , आरोही अपनी बाल्कनी में सुकून से बैठी चाय पी रही थी और उसकी 7 साल की  बेटी सान्वी  पास ही मे कुछ ड्रॉइंग बना रही थी।हाँ ! सान्वी की ड्रॉइंग, बचपन वाली आरोही के ड्रॉइंग से कहीं ज़्यादा बेहतर थी। हो भी क्यों ना? सान्वी अपनी शैफ़ाली मौसी के आर्ट स्कूल बेस्ट स्टूडेंट जो थी।





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