Akanksha Gupta

Drama Horror Tragedy


4.5  

Akanksha Gupta

Drama Horror Tragedy


काली परछाई

काली परछाई

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पंडित केशव शास्त्री जी अपनी कोठरी में आराम कर रहे थे। कमरे मे एक डिबियानुमा चिराग जल रहा था जिसकी मद्धम रोशनी पूरे कमरे में फैली हुई थी। कमरे में इतनी उमस भरी हुई थी कि पंडित जी सिर से पांव तक पसीने से भीगे हुए थे। हालांकि कमरे का दरवाजा खुला हुआ था लेकिन हवा का एक कतरा भी कमरे में दस्तक नहीं दे रहा था। पंडित जी चारपाई पर पड़े हुए बेचैनी से करवट बदल रहे थे। बीच- बीच में हाथ वाला पंखा उठा कर हवा करने लगते जिससे कुछ पल सुकून मिल जाता था लेकिन जब हाथ दर्द करने लगते तो पंखा रोक कर फिर से आराम करने लगते। यह सिलसिला काफी देर से चल रहा था।

पंडित जी एक बार फिर हवा करते हुए थक गए थे। उन्होंने पंखा नीचे रखा और करवट बदली। उन्होंने अनुमान लगाया कि रात का तीसरा पहर शुरू हो चुका था। जम्हाई लेते हुए उनकी नजर उस दीवार पर पड़ी जिस दीवार के सहारे डिबियानुमा चिराग रखा हुआ था। वहाँ पर उन्हें एक परछाई दिखाई दी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ पर कोई नही था। उन्होंने फिर दीवार की तरफ देखा तो परछाई गायब हो चुकी थी।

अब पंडित जी को प्यास लग आई थी। उनका गला सूख रहा था। वे उठे और सामने की मेज पर रखे हुए घड़े से पानी गिलास में निकाल कर पीने लगे। वे अभी पानी पी ही रहे थे कि तभी उन्हें गिलास के पानी में किसी लड़की की परछाई दिखाई दी जिसका शरीर जला हुआ था। इस बार पंडित जी के हाथ से गिलास छूटकर गिर गया। उनकी धड़कने तेज हो गई। उनकी आंखें बाहर निकल जाने को आतुर थी जैसे वे उस परछाई को पहचानने की कोशिश कर रही हो

पंडित जी स्तब्ध से खड़े हुए थे कि तभी गिलास गिरने की आवाज सुनकर राधे अंदर आया। राधे एक सुंदर, सुशील और समझदार लड़का था। उसने आते ही पूछा- “क्या हुआ पंडित जी, सब ठीक तो है ना?”

पंडित जी राधे को देखकर सयंमित हो गए थे। अपनी घबराहट को छुपाते हुए बोले- “कुछ नहीं हुआ, बस हाथ से गिलास छूट गया।”

राधे ने नीचे गिरा हुआ गिलास उठाते हुए कहना शुरू किया- “हम जानते है पंडित जी आपको यहां बहुत तकलीफ हो रही होगी। लेकिन क्या करें जब से आप इस गांव को छोड़कर चले गए, तब से इस गांव पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। औरतो का जीवन तो लंबा है यहां लेकिन आदमी बेवक्त मारा जाता है। बीमारी का भी कुछ पता नहीं चलता।”

पंडित जी ये बातें ध्यान से सुन रहे थे, बोले- “ कही पानी में तो कोई कमी नहीं?”

राधे कुछ चौकन्ना होकर इधर उधर देखने लगा फिर धीरे से बोला- “ अरे नही पंडित जी, अम्मा कहती है कि ये सब उस परछाई का किया धरा है जो रात में इधर से उधर भटकती है और जैसे ही कोई आदमी दिखाई दिया, उसका काम खत्म। तभी तो अम्मा ने आपका पता खोज कर आपको यहां बुलाया, कह रही थी कि आपको सिद्धि प्राप्त है। एक आप ही हो जो उस परछाई को कर सकते हो। अच्छा अब मैं चलता हूँ पंडित जी, आप थोड़ा आराम कर ले। मैं तैयार हो कर हवन की तैयारी करता हूँ।”

पंडित जी ये बातें सुनकर सोच में पड़ गए। उन्होंने अपने बारे मे अब तक जो कुछ भी भ्रांति फैलाई थी, आज उन्हीं पर भारी पड़ रही थी। उन्होंने सिद्धि प्राप्ति का ढोंग रचाकर ना जाने कितने ही लोगों को मूर्ख बनाया। कितना धन इकट्ठा किया और महलों में आलीशान जीवन जी रहे थे। इस गांव से जाने के बाद उन्होंने कभी इस ओर पलट कर नहीं देखा।

आज उनके साथ जो कुछ भी हुआ और जो कुछ भी उन्होंने देखा, उसके बाद उन्हें भी गांव वालों की बातों पर यकीन हो चला था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब वे क्या करेंगे। उनके पीछे चिराग की मद्धम रोशनी में परछाई फिर आकर ले रही थी

कुछ ही देर में सुबह हुई। गांव के मंदिर में यज्ञ हवन की तैयारियां चल रही थी। राधे ने पूरी सामग्री जुटा ली थी। गांव के अन्य लोग आसपास की सजावट और साफ सफाई में लगे हुए थे।

पंडित जी अपने कमरे में तैयार हो रहे थे। सफेद धोती, माथे पर चंदन का तिलक और जनेऊ धारण किए हुए पंडित जी कशमकश में फंसे हुए थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे इस मुसीबत से बाहर कैसे निकले। 

उनके कमरे के बाहर एक लड़की हाथ में दूध का गिलास ले कर खड़ी थी। तैयार होने के बाद जैसे ही पंडित जी बाहर निकले वैसे ही वह लड़की उनके सामने दूध का गिलास लेकर खड़ी हो गई। पंडित जी ने जैसे ही तिरछी नजर के साथ गिलास पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया वैसे ही वो काली परछाई पंडित जी के सामने आ खड़ी हुई। पंडित जी घबरा गए। वो परछाई उस लड़की के शरीर के आर-पार हो कर पंडित जी के करीब से गुजर गई। इससे पहले पंडित जी कुछ समझ पाते, वो लड़की बेहोश हो चुकी थी। उसके हाथ से दूध का गिलास भी छूट कर गिर पड़ा।

गिलास गिरने की आवाज सुनकर राधे की माँ अंदर आई। वे उस समय रसोई में प्रसाद बना रही थी। उन्होंने आते ही मेज पर रखे गिलास से पानी लेकर उस लड़की को होश में लाई और फिर उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उस लड़की को कुछ भी याद नहीं था कि वह बेहोश कैसे हो गई।

पंडित जी को यहां से भाग जाने का यह उचित अवसर जान पड़ा, बोले- “आप कहे तो यह यज्ञ हम बाद में भी कर सकते है। अभी इसकी तबियत ठीक नहीं है।”

राधे की मां घूंघट के अंदर से बोली- “आप इसकी चिंता न करें पंडित जी। यह सब तो चलता ही रहता है। वैसे भी जितनी जल्दी उस चुड़ैल से छुटकारा मिल जाए उतना अच्छा। आप चलिये मैं इसे लेकर आती हूँ।”

उनके इतना कहने पर पंडित जी बेमन से मन्दिर से पहुंचे। वहाँ पर सब तैयारियां पूरी हो चुकी थी। सब उनका ही इंतजार कर रहे थे। पंडित जी मन ही मन भगवान का नाम ले रहे थे। उन्होंने अपना आसन जमाया और यज्ञ विधि आरम्भ की।

स्थापना विधि पूरी हो जाने के बाद जब पंडित जी ने अग्नि प्रज्वलित की तभी मन्दिर की सीढ़ियों पर से आती हुई रोशनी में काली परछाई प्रकट हुई। उसे देखते ही सभी गांव वाले घबरा गए। पंडित जी तो पसीने में तरबतर हो गए थे। उन्हें काटो तो खून नही।

यह परछाई अब पंडित जी की ओर बढ़ रही थी। पंडित जी मंदिर से बाहर भाग आये। अब परछाई तेजी से उनकी ओर बढ़ रही थी। पंडित जी पीछे की ओर जा रहे थे कि तभी वे लड़खड़ा कर गिर पड़े। वे खुद को संभालते हुए खड़े हुए तो उन्होंने देखा कि वे एक आग के गोले में घिरे हुए थे। अब तक वो काली परछाई पंडित जी के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी थी।

पंडित जी उसे देखकर चिल्लाने लगे। उन्होंने परछाई से चिल्ला कर पूछा- “कौन हो तुम और क्या चाहती हो?”

परछाई जोर से हंसी और बोली- “क्यो रे पंडित, तू तो बड़ा ज्ञानी है। इतना तो जानता ही होगा कि इंसान अपने किए की सजा इसी दुनिया में भुगतता है। मैं भी तेरा किया गया एक ऐसा ही कर्म हूँ जिसकी सजा तुझे आज मिलेगी।

पंडित जी सकपका गए। हकलाते हुए बोले- “क्या बकवास कर रही हो। मैने कुछ नही किया।” 

परछाई ने पंडित को नीचे गिरा दिया और बोली- अपने आप को ब्राह्मण कहने वाला जब राक्षस बन जाए तो उसे यह याद नहीं रहता कि उसके स्वार्थ के तले कितनी जिंदगी बर्बाद हो गई। मैं गुनिया हूँ। जिसकी जिंदगी तेरी वजह से खत्म हो गई।

इतना सुनते ही पंडित जी सदमे में आ गए। गांव वाले उनकी तरफ शक की निगाह से देख रहे थे। गुनिया की परछाई बोलती जा रही थी- “याद है पंद्रह साल पहले की वो दोपहर, जब तुम्हारे बाप ने इन्हीं गांव वालों के सामने अपने आप को सिद्ध पुरूष साबित करने के लिए मुझे इसी मंदिर में जिंदा जला दिया था, यह कहकर कि मुझ पर यक्षिणी का साया था। जबकि उसकी असली वजह सिर्फ मैं जानती थी। तुम दोनों की गंदी नजर मुझ पर थी लेकिन तुम्हारी यह इच्छा कभी पूरी नही हुई। एक बार तुम मेरे कमरे में घुसकर मेरे साथ बदतमीजी करने लगे, तब मैंने खुद को बचाने के लिए तुम्हें एक थप्पड़ मार दिया था। इतने में माँ के आने की आहट हुई और तुम वहां से चले गए। उस दोपहर तुम दोनों ने मुझसे इसी बात का बदला लिया। मुझे जिंदा जला दिया। मेरे माँ बाप इन गांव वालों के सामने हाथ जोड़कर मदद मांगते रहे लेकिन कोई आगे नही आया।

मेरा शरीर जितना दर्द झेल रहा था मेरे मन मे बदले की भावना उतनी ही प्रबल हो रही थी। जब तुम सब चले गए तब मेरी आत्मा मेरे जले हुए शरीर की परछाई में कैद हो गई

मैंने तय कर लिया कि जो कोई आदमी किसी औरत की इज्जत पर नजर डालेगा, उसे तो मरना ही होगा और जानते हो मेरे इस काम में मेरी मदद कौन करता था? मेरी छोटी बहन झुनकु।”

तभी राधे की माँ ने अपना घूंघट हटाया। वह झुनकु थी। उसने बोलना शुरू किया- “तुम्हें क्या लगा पंडित, इतना बड़ा कुकर्म करने के बाद कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता। तुमने मेरी बहन को जिंदा जला दिया और आगे न जाने क्या क्या किया होगा।” 

परछाई ने आगे बोलना शुरू किया- इन गांव वालों ने भी मेरी मदद नहीं की इसलिए सजा तो इन्हें भी मिलनी थी। जब भी इस गांव मे कोई आदमी किसी औरत पर बुरी रखता था और झुनकु को इस बारे मे पता लगता, वो मुझे बताती थी और फिर जिसे भी मारना होता उसे आधी रात को झुनकु किसी बहाने से बुलाती। उसके हाथ में रोशनी के लिए एक दीया रहता था जिससे कि मैं अपना मकसद पूरा कर सकूं।.......”

“लेकिन मेरा मकसद तो तुम्हारी मौत था। और तुम्हें तो ढूंढने की भी जरूरत नहीं पड़ी। तुम्हारे नाम के झूठे इश्तहार तुम्हारा पता बताने के लिए काफी था।”

फिर तुम झुनकु के बुलाने पर यहां वापस आये। उसी कमरे में ठहरे जहां तुमने मेरे साथ बदतमीजी की। मैं कमरे जल रहे चिराग की रोशनी में परछाई बनकर तुम्हें मारने भी आई थी लेकिन इससे तुम्हारा सच गांव वालों के सामने कैसे आता इसलिए तुम बच गए

फिर आज सुबह जब उस लड़की की परछाई दीवार पर पड़ी तो मैं तुमसे मिलने चली आई। तुम तो यहाँ से भागने वाले थे लेकिन...."

अब पंडित जी गिड़गिड़ाने लगे- “मुझे माफ कर दो। मैं पागल हो गया था। मुझे लगा कि तुम मुझे कैसे ठुकरा सकती हो?

अब परछाई आगे बढ़ते हुए बोली- “अपनी बोई गई फसल तो काटनी पड़ती हैं पंडित, पहले तुम्हारा बाप और अब तुम.......”

इतना कहकर परछाई ने पंडित की आखों में देखा। पंडित की धड़कनें तेज हो गई। आंखे बाहर निकल आई और शरीर जमीन पर गिर गया। पंडित मर चुका था।

अगले ही पल काली परछाई गुनिया के रूप में बदल चुकी थी। अब उसका मकसद पूरा हो गया था


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