जटायु की सद्गति
जटायु की सद्गति
जटायु ,रावण युद्ध
पात्र_जटायु,रावण,सीता।
नेपथ्य से आवाज आती है ,
बचाओ ,बचाओ,कोई तो बचाओ।
पर्दा खुलता है
(रावण रथ पर सीताजी को बिठाए आकाश मार्ग से जा रहा ।सीताजी विलाप कर रही हैं,और करुण स्वर में मदद की गुहार कर रहीं। पक्षीराज जटायु द्वारा सीताजी को पहचानना ।)
जटायु _"हे पुत्री तू विलाप न कर ,मैं इस दुष्ट राक्षस का नाश कर दूंगा।"
"रुक,रुक तूने माता सीता का हरण कर अपनी मृत्यु को आमंत्रित किया है।"
रावण(असमंजस से ये,कोई पर्वत तो नहीं बढ़ा आ रहा) _"कौन है रे ,दुष्ट जो लंकाधिपति,परक्रमी,वीर रावण को ललकारने का दुःसाहस कर रहा।"
जटायु_ (हंसते हुए)"तुझसे बड़ा डरपोक , पूरे संसार में ही न होगा । जो अकेली नारी का हरण कर आया है ,।तू तो चराचर स्वामी श्रीराम का सामना नहीं कर सकता था,इसलिए धोखे से तूने उन्हें दूर कर दिया और ,अब बड़ी बड़ी डींगे हांक रहा।अगर तू अपनी खैर चाहता है,तो माता जानकी को छोड़ दे,वरना श्री राम के क्रोध की अग्नि से तेरा वंश पतिंगा(भस्म)हो जाएगा।"
रावण _"रे वृद्ध गिद्ध ,मेरे सामने तेरी क्या औकात, हट जा मेरे रास्ते से।"
( यह सुन क्रोधित जटायु ने रावण पर वार कर उसे भूमि पर गिरा दिया। फिर चोंच मार मार कर उसके शरीर को विदीर्ण कर दिया।)
रावण (खिसियाकर)_"तू राम के बल पर इतना इतरा रहा है,अभी तेरा पंख काटता हूं।"
(और इतना कह उसने कटार से जटायु के पंख काट डाले)।
जटायु गिर पड़ता है।और मृत्यु उसके करीब है,फिर भी आंखें बंद किए राम नाम का सुमिरन करता है।
पर्दा गिरता है।
अगला दृश्य
प्रसंग_ सीता हरण के बाद,राम लक्ष्मण का व्याकुल होकर वन वन भटकना,जटायु ,राम संवाद।
पात्र परिचय_राम ,लक्ष्मण,जटायु।
पर्दा खुलता है।
नेपथ्य से आवाज आती है , सीते सीते)
और राम लक्ष्मण का प्रवेश।
राम_ "हे ,खग,मृग,भ्रमर ,तरु ,पल्लव,
आप सबने कहीं मेरी सुकुमारी सीता को देखा है।
हे प्रिय ,तुम कहां छुप गई हो,अब यह लुका छुपी का खेल बंद करो।"
इस तरह राम आम मनुष्य की तरह विलाप करते हैं।
(मंच की दूसरी ओर,जटायु की कराहने की आवाज, हे राम, हे राम।)
राम_ "लक्ष्मण वहां आगे कौन पड़ा राम राम ,कराह रहा है?"
लक्ष्मण_(पास जाकर) "भैया, ये तो पक्षीराज गृद्ध जटायु हैं।"
राम (पास जाकर,घायल जटायु का सर अपनी गोद में रखते हुए)_ "तात,आपकी यह गति किसने की।"
जटायु(आंख खोलते हुए)_"हे प्रभु आपके सुंदर मुखमंडल को देख मेरी सारी पीड़ा जाती रही।
हे गोसाईं,मेरी यह गति उस दुष्ट रावण ने की।वह माता सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया।"
जटायु _"प्रभु मैं अधम जाति का गृद्ध मैंने माता सीता को बचाने के लिए उस नीच से संघर्ष किया।लेकिन अंत में मैं हार गया उसने मेरे पंख काट मेरे शरीर को क्षत विक्षत कर दिया ।
मृत्यु मेरे सामने थी।मैंने मृत्यु से कहा_ खबरदार,मेरे सामने न आओ,मुझे अपने प्रभु को माता सीता की सुधि देनी है।"
राम _"हे तात,आप वृद्ध थे ,आप परिणाम भी जानते थे, फिर भी अपने प्राणों की परवाह किए बिना भी उस व्यभिचारी ,दुष्ट,रावण से आपने भरसक लोहा लिया ,अपनी अंतिम सांस तक लड़े,एक स्त्री की अस्मिता बचाने के लिए ।आप धन्य हैं।आप अपना शरीर बनाए रखिए।"
जटायु_ "हे प्रभु,आपने मुझे अपनी गोद में उठा लिया,जैसे एक पिता अपने पुत्र को अपनी गोद में उठा लेता है ,पिता की हर संपत्ति ,पुत्र की ही होती है।
अब मुझे क्या कमी रह गई, प्रभु।आपको पा लिया ,सब कुछ पा लिया।"
राम_"हे तात,आप मेरे लोक विराजिए।
हे तात ,अगर पिता जी आपको मिलें,तो उनसे न कहिएगा का रावण सीता को हर ले गया।
अगर मैं राम हूं तो,रावण खुद ही अपने कुटुंब सहित अपनी करनी स्वयं कहेगा।"
जटायु _"प्रभु अब मुझे आज्ञा दें।"
राम_" आपका यह बलिदान युगों युगों तक अमर हो जाएगा,जब भी नारी अस्मिता की बात होगी ,आपका नाम अग्रणी होगा।आपने अपने जान की परवाह किए बिना ये कार्य किया।
मैं आपको प्राण त्यागने की अनुमति प्रदान करता हूं,ताकि इस भौतिक शरीर के कष्ट से आप मुक्ति पाकर मेरे लोक में जा सकें।"
(श्री राम ने अपने हाथों से उसका क्रिया कर्म किया ,और उसे अपने धाम भेजा)।
पर्दा गिरता है।
और एक बार फिर पर्दा उठता हैं _
उद्घोषक द्वारा नाट्य मंचन का सार बताया जाता है।
जटायु ने अपने जीवन का बलिदान कर सीख दी कि जब आप नारी के सम्मान की रक्षा करते हैं तो आपको सद्गति प्रदान होती है,प्रभु आपको अपनी गोद में उठा लेते हैं।
भीष्म सक्षम होते हुए भी भरी सभा में नारी का तिरस्कार देखते रहे ,इच्छा मृत्यु के वरदान के बाद भी उन्हें बाणों की शय्या मिली।ईश्वर(कृष्ण) सिर्फ मुस्कुराते रहे,उन्होंने उनका वरण नहीं किया।
मनुस्मृति में कहा गया है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते
रमंते तत्र देवताः।
पर्दा गिरता है।
