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Shalinee Pankaj

Drama Romance

3  

Shalinee Pankaj

Drama Romance

जन्मों का रिश्ता-भाग-2

जन्मों का रिश्ता-भाग-2

11 mins
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मंदिर से निकल कर, अपनी धुन में खोया। जैसे-तैसे घर पहुँचा, आज भूख भी नहीं लगी, न नींद आई। पूरी रात करवटों पे बीत गयी। मोबाईल पास ही रखा था, न जाने कितनी बार उसका नम्बर देखता रहा। शायद उसका कॉल आ जाये। मैं खुद हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि उसका नम्बर लगा कर दो टूक बात कर लूँ। क्या कहना चाह रही थी वो? क्यों फोन लगाई थी, वो भी इतने दिनों बाद। मन में कई प्रश्न उठ रहे थे। सुबह हो गयी बालकनी में खड़ा हो गया।आज इतने दिनों बाद ये सुबह इतनी हसीन लग रही थी। बिल्कुल मेरी चाँद की तरह !! आज इतने दिनों बाद सूरज को उगते देख रहा था। वैसे ही जैसे आहिस्ता-आहिस्ता मेरे जीवन में वो आ रही थी। न चाह कर भी मैं उससे मुहब्बत कर बैठा था। मन ही मन ,पर उसे कभी इस बात का पता नहीं चलने दूँगा की, मैं उससे प्यार करता हूँ। वो खुश रहे बस!! कॉफी की हर घूँट उस बारिश की बूंदों की तरह लग रही थी। जब वो उस दिन बारिश में मुँह खोल कर हर बूँद को खुद में समाहित कर रही थी। काश!! की उसका नाम ही पूछ लेता। क्या फर्क पड़ता है कि वो किसी और की पत्नी है। नहीं नहीं मेरे संस्कार ऐसे तो नहीं है।

ऑफिस जाने का समय हुआ। निकलने लगा तभी मोबाईल की घण्टी बजी। देखा तो माँ का कॉल था। "बेटा कुछ तस्वीरें भेज रही हूँ देखकर शाम तक बताना। इस बार गर्मी में तुम्हारी शादी करनी ही है।" "जी" इसके अलावा कोई जवाब भी तो नहीं था। माँ की हर बात मानना जैसे आदत बन चुकी थी और मैं क्या कहता भी क्या कि मैं किसी और का दीवाना हो चुका हूँ । जिसके बारे में तो कुछ जानता भी नहीं। ऑफिस से घर , घर से ऑफिस यही दिनचर्या थी मेरी। ऑफिस से निकल ही रहा था कि फिर कॉल आया। "सुनिए आपसे मिलना है।"वही आवाज़ अबकी बार मैंने पूछा "कहाँ?" उसने वही पता बताया जहाँ हम पहली बार मिले। मैं नियत समय में वहाँ पहुँच गया। मेरी उम्मीद से परे वो उसी पेड़ के नीचे मिली। अपनी बाइक किनारे खड़े कर उसके नज़दीक गया। उसने कुछ मेरी तरफ बढ़ाया। "ओह्ह मेरी डायरी ये...आपके पास कैसे?" मैंने कहा!


"उस दिन कैफेटेरिया में डायरी भूल गए थे आप। मेरी नजर पढ़ी और मैंने रख लिया।" उसने कहा! थैंक्स बोलते हुए मैंने उसके तरफ एक बार देखा शायद ये अंतिम मुलाकात हो। उसके माथे पे सिंदूर तो नहीं था अभी। खैर मैं निकलने ही वाला था कि बारिश शुरू हो गयी। हल्की बारिश मानो बारिश भी ये चाहता हो कि हम कुछ देर और साथ रहे। "आपका नाम" मैंने पूछने के लिए उसकी ओर देखा! तो वो फिर उस दिन की तरफ बारिश में झूमने लगी। कभी मुँह खोलकर बूंदों को मुँह में लेती, जैसे न जाने जैसे कितने जन्मों की प्यासी हो, तो कभी पेड़ की छाँव से बाहर निकल कर भीगती जैसे कोई छोटी बच्ची हो। मैं उसे देखता रहा।बारिश बंद हुई। वो चली गयी। मैं उसे देखता रहा। कितना चुलबुलापन, कितनी मासूमियत, न जाने कितने सवाल अपने पीछे छोड़ गई। घर पहुंचा तो गाँव से मम्मी पापा आये हुए थे। मैं खुशी के मारे अपने मम्मी ,पापा से लिपट गया। जब से यहाँ आया था घर नहीं जा पाया था। और आज मम्मी-पापा ने मुझे यहाँ आकर सरप्राइज दे दिया। माँ ने कॉफ़ी लाकर दी। बात करते कब 11 बज गया पता ही नहीं चला। सोने के लिए अपने कमरे में आया। तभी डायरी का ध्यान उफ्फ! पगली!!कहीं पढ़ तो नहीं ली होगी। मन ही मन बड़बड़ाया भला दूसरे की डायरी क्यों पढ़ेगी।

बिस्तर में आकर लेट गया। डायरी के पन्ने पलटने लगा और नींद लग गयी। सुबह उठा तो देर हो चुकी थी। मम्मी कई बार उठा के जा चुकी थी। जाने कैसे इतनी गहरी नींद में सो गया।


ऑफिस से आया चाय, कॉफी लेते हुए हम तीनों बैठे थे। तभी पंडित जी भी आ गए। पापा ने कहना शुरू किया "बेटा अब फोन में कितना बात करते इसलिए हम सीधे यही आ गए। तुम थोड़ा बिजी थे, थके हुए तो हम लोग टालते रहे। अब पंडित जी भी आ गए है। ये कुछ तस्वीरें है, इन्हें देख लो। अब किसी रिश्ते में आगे तो बढ़ना है।" मैं बहुत उदास,और कशमकश में फँस गया। पिता जी ने मेरी तरह देखा, मानो चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहे हो।

"क्या बात है बेटा कहीं किसी को पसन्द कर रखे हो क्या? अगर ऐसा कुछ है तो तुम्हारी ,पसंद ही हमारी पसन्द है।" मैं क्या कहता आधे घण्टे की दूसरी मुलाकात में भी मैं उस पगली!! का नाम नहीं जान पाया! उसकी बचकानी हरकत देख तो पगली ही कहूँगा। "क्या हुआ बेटा" पापा की आवाज़ सुन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया। तभी मम्मी बोली देखो "बेटा तुम्हारी पसंद, हमारी पसन्द पर अंतर्जातीय तो नहीं है।" ओह्ह! शिट मैं तो कुछ भी नहीं जानता बस वो सिंदूर देख शादीशुदा है का अंदाजा लगाया। पर क्या कहूँ मैं जिससे प्यार कर बैठा वो तो किसी ओर की है। "बोलो बेटा" पंडित जी की आवाज़ सुन के मैं बोला "नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं, बस! आपकी पसंद ही मेरी पसंद है।आप लोग देख कर पसंद कर लीजिए।" और ऑफिस के लिए निकल गया। मुँह मीठा करिए पंडित जी, मम्मी की आवाज़ जाते-जाते कानों में आई।


महीने भर रहकर शुभ मुहूर्त में सगाई, व शादी की तिथी निकलवा कर वो लोग चले गए। जब तक वो लोग थे। सुबह ऑफिस जाने की हड़बड़ी। आने के बाद देर रात तक मम्मी, पापा से बात करते कब नींद आ जाती पता ही नहीं चलता। जब तक वो लोग थे, ऐसा नहीं था कि मैं उसे भूल गया, वो तो हर सांस के साथ,याद आती थी,पर डायरी में अगली मुलाकात को लिखने का वक्त ही नहीं मिल पाया।

आज जब घर लौटा तो खुद को अकेले पाया। माँ, पिता जी तो, जा चुके थे। बहुत याद आ रही थी। तभी माँ कॉल आया। फरवरी में छुट्टी लेकर आने बोली, सगाई थी मेरी। कमरे में आया लेट गया, वो मेरे साथ नहीं, मेरे जीवन में नहीं, फिर जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। मैं जितना गंभीर स्वभाव का, वो उतनी ही चंचल। सच कहूँ तो, उससे मिलने के बाद जैसे जिंदगी बदल गयी।

मौसम तो नहीं था कि बारिश हो, फिर भी रिमझिम बारिश शुरू हो गयी। मैं टेरिस में निकल गया। भीगने लगा। मेरा रोम-रोम आज बारिश में भीग रहा था।काश!!,काश!!की फिर उससे मुलाकात हो। रात के दो बजे चुके थे,अपने पागलपन पे हँसी आई। कपड़े बदलकर एक कड़क कॉफ़ी बनाई। सोचा आज डायरी लिख लूँ तभी नजर मेज पर गयी। रिद्धि शुक्ला तस्वीर में नाम लिखा था। वही तस्वीर जिसे घर के लोगो ने पसंद किया। मैने तो देखना भी जरूरी नहीं समझा। मेरे हाथों में वो तस्वीर का पीछे भाग था। फिर भी इच्छा नहीं हुई कि भावी जीवनसाथी को देख लूँ।अचानक हवा का झोंका खिड़की से आया।तस्वीर नीचे गिर गयी। झुका उठाने के लिए तस्वीर पलट चुकी थी, सामने भाग में उसकी तस्वीर थी। बला की खूबसूरत, कितने सुंदर, नाकनक्स ,कोई देखे तो नजर न हटे, और बाल कितने लंबे। मन ही मन बुदबुदाया, वो पगली इतनी सुंदर तो नहीं पर प्यार कर बैठा उसी से। सोचा अब डायरी ,डायरी लिखने का क्या मतलब जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं। कुछ दिनों बाद मेरी सगाई, फिर शादी, मुझे भूलना होगा उसे। तस्वीर मेज़ पर ही छोड़ वही सोफे में सो गया।

बारिश में भीगने की वजह सर्दी-जुकाम फीवर आ गया। तीन दिन तक ऑफिस नहीं जा पाया। बुखार की वजह से बिस्तर से नहीं उठ पा रहा था मेरे बचपन का मित्र समीर आया हुआ था। माँ के फोन में मैने कोई जानकारी नहीं दी थी। परसों सगाई थी, पर उठा नहीं जा रहा था। मैं और समीर आज गाँव जाने वाले थे, तभी पिता जी का कॉल आया। समीर ने मेरे स्वास्थ के बारे में बता दिया। समीर बहुत अच्छे से मेरा ध्यान रख रहा था। अब मुझे भी ठीक लगने लगा था।सगाई एक हफ्ते के लिए टल गई। सच कहूँ तो दिल से मैं बहुत खुश हुआ। इरादा तो नहीं था, देवदास बन उसकी यादों के सहारे जीने का, पर ऐसे रास्ते पे चलने का कोई मतलब भी नहीं था, जिसकी कोई मंज़िल न हो। न जाने कितने विचार मेरे दिलो दिमाग में उठते ऐसा लग रहा था इस उलझन में कहीं फँस न जाऊँ, सरदर्द से फटा जा रहा था। कई बार मन करता कि उसे कॉल करूँ, अपने दिल का हाल बताऊँ।प र कदम ठहर जाता, मेरी डायरी तो उसके पास थी। उसने तो कुछ कहा भी नही। और तो और पहली मुलाकात में तो कितने अच्छे से बात की,कॉफ़ी शॉप में भी अभिवादन करते वक्त कितनी गहरी निगाह से देखी। जब डायरी लौटाने आई तो मुझसे नजर भी नहीं मिलाई। शायद न पढ़ी हो। "अवस्थी जी लीजिए अपनी फेवरेट कॉफ़ी" समीर की आवाज़ से मैं उसके ख्यालों से बाहर आया।


 समीर ने कहा "क्या हुआ गगन तेरी सगाई आगे बढ़ गयी इसलिये तू अपसेट है क्या?" नहीं नहीं अचानक से मेरे मुँह से निकल गया। "तो..."कहीं ऐसा तो नहीं की, तू किसी और को पसंद करता है। बता न यार, क्या राज है तेरा।" समीर की बात सुन मैंने कहा! "कुछ भी तो नहीं",मैं झुंझला गया। चल मुझे आज ऑफिस छोड़ दे, बाइक चलाने की हिम्मत नही।"आज रेस्ट करले" समीर ने कहा। नहीं यार आज जाना ही है। तभी आगे की छुट्टी ले पाऊंगा। ये मैंने समीर का ध्यान भटकाने के लिए कहा!"ओके" समीर ने कहा और छोड़ने निकल गया। तभी वो मोड़ आया। मैंने समीर को गाड़ी रोकने को कहा!! कुछ देर वही इत्मीनान से बैठे रहा। उस पेड़ को छूकर, उसे महसूस करने की कोशिश करने लगा। और आँखें छलछला गयी। समीर ने कहा "क्या हुआ गगन? कहीं कोई याद आ रहा है क्या" मैंने कहा! नही,नहीं चलो।" समीर ने फिर कहा! ओह्ह तू, मुझसे छुपा ले, पर तेरी आँखें सब बयाँ कर रही है।" मैंने कहा! नहीं समीर ये फीवर की वजह से है। समीर ने मेरी बात सुन कहा!"ठीक है नहीं बताना तो मत बताओ! मैं कोई दबाव नहीं डालूँगा। पर मेरे यार शायद मैं तुम्हारी कोई मदद कर पाऊँ। तुम्हारे चेहरे से साफ पता चल रहा, की तुम परेशान हो। तुम्हारी सगाई होने वाली है। मोबाइल का जमाना है अब तक तो तुम्हारी बातचीत शुरू हो जाती। तुम अपने भविष्य के सपने देखते रहते, पर तुम्हें देखकर तो ऐसा लगता है कि तुम इस शादी से खुश नहीं हो।" समीर इतना कहकर खामोश हो गया।


मेरा सच्चा दोस्त पर...मैं क्या बताता, मैं खुद उसके बारे में नहीं जानता। क्या पता वो मुझे पसंद करती है या नहीं और करेगी तो भी क्या फायदा। कहीं उसका तलाक ....नहीं नहीं मैं इतना बुरा तो नहीं सोच सकता।चलो समीर!! समीर नाराज़ था। इस संडे सगाई थी। समीर मेरी सगाई में शरीक होने आया था, और स्वास्थ्य खराब होने की वजह से रुक गया। हम दोनों आज शॉपिंग करने गए, कल के लिए। माँ ने मैरून कलर का कोट लेने कहा, शायद लड़की के ड्रेस के मैचिंग का हो।

माँ, पिता जी घर आ चुके थे,10 बजे के करीब हमलोग भी घर पहुँचे। ओह्ह रिंग...हमने ले लिया है बेटा!! बहु के अंगूठी का नाप पूछ लिए थे,और तुमने तो अपने रिंग का नम्बर बताया ही नही, कितनी बार पूछी। न जाने इस लड़के के दिमाग में क्या चल रहा, पापा बड़बड़ाने लगे। समीर मेरी तरफ देखा, पर जैसे वो भावशून्य हो चुका हो, कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। खाना खाने के बाद मम्मी, अपने साथ सगाई का सामान लेकर आई थी, वो मुझे और समीर को दिखाने लगी। मैं उठकर जाने लगा, पर समीर ने मेरा हाथ पकड़ लिया। और आँखों से बैठने का इशारा किया। बेमन से मैं सब चीज़ो को देख रहा था। माँ के कहने पर भी, मैंने किसी समान को हाथ नहीं लगाया। "बेटा क्या तुम खुश नहीं हो?",बताओ अब भी वक्त है हम सब ठीक कर लेंगे।"माँ ने कहा। "हम..हम! कुछ बहाना कर देंगे लड़की वालों से।" पापा के इतना कहते ही मैं भावुक हो गया। फिर भी खुद पर संयत करते हुए बोला, "मैं थका हूँ, कल मिलते है" बोल कर कमरे में आ गया। समीर आया तो, जाने क्यूँ उससे लिपट कर रोने लगा। "तुम्हें सच बता देना चाहिए गगन" समीर को अंदाजा हो गया था। मैंने कहा! "क्या बताता समीर किसी को पसन्द करता हूँ ,ये कह के उसकी बदनामी करवा दूँ, वो भी जब वो किसी और कि है।" "क्या?" समीर ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखा। हाँ समीर इसके अलावा मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानता, नाम तक नहीं जानता तो क्या बताता, अपने पेरेंट्स को। फिर वो कोई कल्पना तो नहीं, उसका वजूद है तो क्यो किसी के बारे में कुछ कह के उसकी छवि खराब करना। ये अलग बात है कि हम एक-दो बार मिले भी है। इसके अलावा मैंने समीर को कुछ भी नहीं बताया। "उसे भूल जाओ!" समीर ने कहा। मैंने कहा! "भूल जाऊँगा मेरे यार!!" हम सोने के लिए आ गए पर सच कहूँ तो समीर भी पूरी रात करवट लेता रहा, और मैं बस सोने का नाटक करता रहा।


सुबह घर में बहुत चहल-पहल थी, रिश्तेदार आ चुके थे। दोपहर के खाने के बाद सब रेस्ट किये और 5 बजे सब गाड़ियाँ सगाई वाली जगह के लिए रवाना हो गयी। लास्ट गाड़ी में मुझे और समीर को जाना था। समीर रेडी हो गया। मैं भी तैयार हो तो गया पर, बहुत परेशान सा फील कर रहा था, रात्रि जागरण की वजह से भी सर दर्द से फटा जा रहा था। मछली को जल से निकाल दिया जाए तो वो तड़प-तड़प कर मर जाती है, आज मेरी भी स्थिति कुछ ऐसी ही हो रही थी। मैं सीधा-साधा अन्तर्मुखीय स्वभाव का। ये इश्क-विश्क पर कभी भरोसा नहीं करने वाला। स्कूल, कॉलेज में भी लड़कियों से दूर रहने वाला। आज एक ऐसे भँवर में फँस चुका जहाँ से निकलना मुश्किल हो गया। मैं किसी को धोखा तो नहीं दे सकता, मैं भूल जाऊँगा उसे, वो डायरी अभी जला देता हूँ, तभी अपने रिश्ते में आगे बढ़ पाऊँगा। डायरी निकाला ही, की तभी समीर कमरे में आ गया। मेरे हाथ से डायरी गिर गयी। मैं हड़बड़ा सा गया। "चलो गगन अब बहुत देर हो रही दो बार अंकल जी का कॉल आ गया!" और मेरा हाथ खींचते हुए मुझे बाहर ले आया। मैं आकर गाड़ी में बैठ गया समीर भी पीछे -पीछे आया। सुनहरे रंग की शेरवानी में समीर सुंदर लग रहा था। मैं गाड़ी में बैठे सड़क के इस पार से समीर को देख रहा था। किसी से फोन में बात करते हुए आ रहा था जैसे ही सड़क पार कर रहा था कि......

क्रमशः



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