जनमंच
जनमंच
भारत
वर्ष 1968
स्वतंत्रता के दो दशक बाद भी देश के एक दूरस्थ औद्योगिक नगर में श्रमिक और प्रबंधन के बीच अविश्वास गहरा था।
हर कुछ महीनों में हड़ताल होती।
कारखाने बंद हो जाते।
मज़दूरों की आय रुक जाती।
उद्योग का उत्पादन गिर जाता।
सबके पास अपने-अपने तर्क थे।
लेकिन समाधान किसी के पास नहीं था।
इसी नगर में एक युवा अध्यापक आया—
निरंजन अवस्थी।
वह इतिहास पढ़ाता था।
लेकिन उसका प्रिय विषय था—
संस्थाएँ।
वह विद्यार्थियों से कहता—
"व्यक्ति बदलते हैं।"
"विचार बदलते हैं।"
"यदि संस्थाएँ न्यायपूर्ण न हों, तो संघर्ष बार-बार लौटता है।"
एक दिन श्रमिक संघ ने उसे अपने बीच बोलने के लिए बुलाया।
अगले सप्ताह उद्योगपतियों ने भी वही आग्रह किया।
दोनों पक्षों को लगा कि वह उनकी बात का समर्थन करेगा।
लेकिन उसने किसी का पक्ष नहीं लिया।
उसने केवल प्रश्न पूछे।
"यदि आज आपको पूरी शक्ति मिल जाए..."
"...तो क्या आप अपने विरोधियों के अधिकार भी सुरक्षित रखेंगे?"
सभा में सन्नाटा छा गया।
निरंजन ने नगर के पुस्तकालय में एक खुली चर्चा-श्रृंखला शुरू की।
नाम रखा गया—
जनमंच।
यहाँ श्रमिक, अभियंता, किसान, व्यापारी, विद्यार्थी और अधिकारी एक ही गोल मेज़ पर बैठते।
न कोई ऊँचा मंच।
न कोई विशेष कुर्सी।
सिर्फ़ तर्क।
और प्रमाण।
कुछ लोगों ने उसका विरोध किया।
उन्होंने कहा—
"संवाद समय की बर्बादी है।"
"परिवर्तन केवल बल से आता है।"
दूसरों ने कहा—
"कुछ भी मत बदलो।"
"यथास्थिति ही सबसे सुरक्षित है।"
निरंजन दोनों से असहमत था।
उसने कहा—
"बल परिवर्तन ला सकता है।"
"लेकिन स्थायी विश्वास नहीं।"
"और जड़ता शांति जैसी दिख सकती है..."
"...पर भीतर असंतोष बढ़ता रहता है।"
महीनों तक बैठकों का सिलसिला चला।
धीरे-धीरे एक नया ढाँचा तैयार हुआ।
कारखाने में संयुक्त सुरक्षा समिति बनी।
उत्पादन से जुड़े आँकड़े सार्वजनिक किए गए।
लाभ का एक हिस्सा कौशल-विकास और श्रमिक कल्याण में लगाया जाने लगा।
शिकायतों के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाई गई।
पहली बार हड़ताल के बिना वेतन समझौता हुआ।
पहली बार उत्पादन भी बढ़ा।
और दुर्घटनाएँ भी कम हुईं।
वर्षों बाद एक पत्रकार ने निरंजन से पूछा—
"क्या आपने कोई नई विचारधारा बनाई?"
निरंजन मुस्कुराया।
"नहीं।"
"मैंने केवल इतना सीखा कि कोई भी विचार इतना महान नहीं हो सकता..."
"...कि मनुष्य उससे छोटा हो जाए।"
उसके निधन के बाद पुस्तकालय के बाहर एक साधारण शिलालेख लगाया गया।
उस पर लिखा था—
"विचार समाज का मार्गदर्शन करें, शासन नहीं।"
"संस्थाएँ इतनी न्यायपूर्ण बनाओ कि मतभेद संघर्ष में नहीं, संवाद में बदल जाएँ।"
और सबसे नीचे—
"किसी भी युग की सबसे बड़ी क्रांति सत्ता बदलना नहीं होती।
सबसे बड़ी क्रांति है—ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें असहमति भी सुरक्षित रह सके।"
