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Anand Mishra

Action

4  

Anand Mishra

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उड़ान

उड़ान

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1

भोपाल
वर्ष 2033

भारत की राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टीम लगातार तीन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पहले दौर से बाहर हो चुकी थी।

प्रतिभा थी।

परिश्रम था।

लेकिन आत्मविश्वास नहीं था।

हर हार के बाद एक ही वाक्य सुनाई देता—

"हम कोशिश करेंगे..."

लेकिन कोशिश कभी परिणाम में नहीं बदलती थी।

इसी समय भारतीय फुटबॉल महासंघ ने एक अप्रत्याशित निर्णय लिया।

उन्होंने टीम का मुख्य प्रशिक्षक बनाया—

अर्जुन राठौर

पूर्व अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी।

एक समय देश का सबसे तेज़ स्ट्राइकर।

लेकिन पिछले दस वर्षों से उन्होंने कोई सार्वजनिक पद स्वीकार नहीं किया था।

पहली ही बैठक में खिलाड़ियों ने सोचा कि वे उन्हें नई रणनीति सिखाएँगे।

लेकिन अर्जुन ने बोर्ड पर केवल एक प्रश्न लिखा—

"तुम खेलती किसके लिए हो?"

किसी ने कहा—

"देश के लिए।"

दूसरी ने कहा—

"परिवार के लिए।"

तीसरी बोली—

"अपने सपनों के लिए।"

अर्जुन मुस्कुराए।

"जब तक तुम्हारा उत्तर दूसरों के लिए होगा..."

"...तुम दबाव में खेलोगी।"

"जिस दिन तुम खेल से प्रेम के लिए खेलोगी..."

"...उस दिन तुम्हारा खेल बदल जाएगा।"

अगले दिन से अभ्यास शुरू हुआ।

लेकिन अभ्यास असामान्य था।

पहले सप्ताह कोई फुटबॉल नहीं।

केवल दौड़।

संतुलन।

निर्णय लेने के खेल।

टीम पर विश्वास बनाने के अभ्यास।

खिलाड़ियों ने शिकायत की।

"हम मैच कब खेलेंगे?"

अर्जुन ने उत्तर दिया—

"मैच गेंद नहीं जिताती।"

"मैच वह टीम जिताती है जो एक-दूसरे पर भरोसा करती है।"

कुछ सप्ताह बाद चयन मैच हुआ।

टीम की सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी—

मीरा

हर बार स्वयं गोल करने की कोशिश करती।

साथी खिलाड़ी निराश हो जातीं।

मैच के बाद अर्जुन ने मीरा से कहा—

"आज तुमने दो गोल किए।"

"लेकिन टीम हार गई।"

"यदि तुम एक गोल कम करती..."

"...और तीन साथियों को अवसर देती..."

"...तो शायद टीम जीत जाती।"

धीरे-धीरे खिलाड़ियों में परिवर्तन आने लगा।

वे एक-दूसरे की सफलता पर उतनी ही प्रसन्न होने लगीं जितनी अपनी सफलता पर।

राष्ट्रीय चैम्पियनशिप शुरू हुई।

भारत लगातार जीतता गया।

फाइनल में उनका सामना एशिया की सबसे मजबूत टीम से था।

पहले हाफ़ में भारत दो गोल से पीछे था।

ड्रेसिंग रूम में सन्नाटा था।

अर्जुन ने कोई भाषण नहीं दिया।

उन्होंने केवल एक वीडियो चलाया।

उसमें खिलाड़ियों के गाँव, उनके परिवार, उनकी पहली प्रैक्टिस, उनके संघर्ष और उनकी मुस्कानें थीं।

वीडियो समाप्त हुआ।

अर्जुन बोले—

"स्कोरबोर्ड तुम्हारी कहानी का फैसला नहीं करता।"

"तुम्हारा साहस करता है।"

दूसरा हाफ़ शुरू हुआ।

भारत ने एक गोल किया।

फिर दूसरा।

अंतिम दो मिनट बचे थे।

मीरा के पास गोल करने का सुनहरा अवसर था।

लेकिन उसने देखा—

दाईं ओर खड़ी नाज़िया बेहतर स्थिति में थी।

उसने पास दिया।

नाज़िया ने निर्णायक गोल कर दिया।

भारत पहली बार एशियाई चैम्पियन बना।

समारोह में पत्रकारों ने अर्जुन से पूछा—

"आज की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?"

उन्होंने ट्रॉफी की ओर नहीं देखा।

उन्होंने अपनी खिलाड़ियों की ओर देखा।

"आज किसी ने हैट्रिक नहीं बनाई।"

"लेकिन आज ग्यारह खिलाड़ियों ने एक टीम बनना सीख लिया।"

कुछ महीनों बाद अर्जुन ने पद छोड़ दिया।

महासंघ ने पूछा—

"इतनी जल्दी क्यों?"

उन्होंने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

"एक अच्छा प्रशिक्षक वह नहीं..."

"...जिसके बिना टीम जीत न सके।"

"अच्छा प्रशिक्षक वह है..."

"...जिसकी आवश्यकता धीरे-धीरे समाप्त हो जाए।"

वर्षों बाद उसी प्रशिक्षण केंद्र के प्रवेश द्वार पर एक पंक्ति लिखी गई—

"महान खिलाड़ी मैच जीतते हैं।
 महान कप्तान खिलाड़ी गढ़ते हैं।"

और उसके नीचे—

"नेतृत्व का सर्वोच्च पुरस्कार ट्रॉफी नहीं,
 अपने बाद आने वालों को स्वयं से आगे बढ़ते देखना है।"



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