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Anand Mishra

Action

4  

Anand Mishra

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महायंत्र

महायंत्र

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हिंद महासागर
वर्ष 2074

सब कुछ एक समुद्री भूकंप से शुरू हुआ।

लेकिन यह सामान्य भूकंप नहीं था।

भारतीय महासागर की गहराइयों में एक विशाल ऊर्जा-द्वार खुल गया।

कुछ ही दिनों बाद समुद्र से एक ऐसा जीव निकला जिसकी ऊँचाई चालीस मंज़िला इमारत के बराबर थी।

उसका शरीर इस्पात जैसी कठोर त्वचा से ढका था।

मिसाइलें उसे केवल धीमा कर पाती थीं।

युद्धपोत उसके सामने टिक नहीं सके।

मुंबई, कोच्चि और चेन्नई के समुद्री तटों पर भारी विनाश हुआ।

विश्व के वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया—

पारंपरिक सेनाएँ पर्याप्त नहीं हैं।

भारत ने एक नई परियोजना शुरू की।

उसका नाम रखा गया—

महायंत्र।

मानव-नियंत्रित विशाल यांत्रिक रक्षक।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती मशीन बनाना नहीं थी।

उसे चलाना था।

एक महायंत्र को नियंत्रित करने के लिए एक व्यक्ति का मस्तिष्क पर्याप्त नहीं था।

निर्णयों की गति इतनी तेज़ थी कि दो मस्तिष्कों का एक साथ कार्य करना आवश्यक था।

इसे कहा गया—

द्विसंचालन।

दो संचालक।

एक चेतना।

हजारों सैनिकों, पायलटों और वैज्ञानिकों का परीक्षण हुआ।

अधिकांश असफल रहे।

दो व्यक्तियों की सोच का पूर्ण सामंजस्य दुर्लभ था।

अंततः दो नाम सामने आए।

कमांडर ईशान राठौड़।

पूर्व वायुसेना पायलट।

रणनीति में अद्वितीय।

और—

डॉ. मीरा अय्यर।

रोबोटिक्स वैज्ञानिक।

उन्होंने कभी युद्ध नहीं लड़ा था।

लेकिन महायंत्र की नियंत्रण प्रणाली उन्हीं ने विकसित की थी।

सैन्य अधिकारियों ने विरोध किया।

"एक वैज्ञानिक युद्धभूमि में?"

परियोजना प्रमुख ने उत्तर दिया—

"यदि मशीन को सबसे अच्छी तरह कोई समझता है..."

"...तो वही उसका सबसे अच्छा संचालक भी हो सकता है।"

पहला परीक्षण शुरू हुआ।

दोनों नियंत्रण-कक्ष में बैठे।

उनके सिर पर तंत्रिका-संयोजन हेलमेट लगाए गए।

कुछ क्षण बाद दोनों की स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ने लगीं।

ईशान ने अपने बचपन की झलक देखी।

मीरा ने अपने पिता को देखा, जो समुद्री वैज्ञानिक थे।

दोनों ने तुरंत संपर्क तोड़ दिया।

"यह असंभव है।"

मीरा बोलीं—

"मशीन हमारे हाथ नहीं जोड़ती..."

"...हमारी चेतना जोड़ती है।"

कई सप्ताह लगे।

धीरे-धीरे दोनों ने एक-दूसरे पर विश्वास करना सीखा।

तभी समुद्र से पहले से भी बड़ा जीव निकला।

उसका लक्ष्य किसी शहर पर हमला नहीं था।

वह सीधे उसी समुद्री ऊर्जा-द्वार की रक्षा कर रहा था।

मानो और जीवों के आने का मार्ग सुरक्षित कर रहा हो।

महायंत्र पहली बार वास्तविक युद्ध में उतरा।

विशाल लहरें उठीं।

लोहे और जल का भीषण संघर्ष शुरू हुआ।

जीव अत्यंत शक्तिशाली था।

महायंत्र बार-बार पीछे धकेला जा रहा था।

ईशान ने कहा—

"पूर्ण शक्ति से हमला करते हैं।"

मीरा ने सेंसर देखे।

"नहीं।"

"उसके सीने पर नहीं..."

"ऊर्जा-द्वार पर ध्यान दो।"

तभी दोनों को एक साथ एक बात समझ आई।

समुद्री जीव आक्रमणकारी नहीं था।

वह द्वार का प्रहरी था।

जब तक द्वार खुला रहेगा...

नए जीव आते रहेंगे।

उन्होंने अपनी पूरी शक्ति उस जीव पर नहीं...

ऊर्जा-द्वार को स्थिर रखने वाले क्रिस्टलीय स्तंभों पर केंद्रित कर दी।

भीषण प्रकाश फैला।

पूरा महासागर काँप उठा।

कुछ क्षण बाद...

ऊर्जा-द्वार स्थायी रूप से बंद हो गया।

समुद्री जीव ने संघर्ष रोक दिया।

वह धीरे-धीरे समुद्र की गहराइयों में विलीन हो गया।

युद्ध समाप्त हो गया।

दिल्ली में आयोजित वैज्ञानिक सम्मेलन में एक छात्र ने मीरा से पूछा—

"इस परियोजना की सबसे बड़ी खोज क्या थी?"

मीरा मुस्कुराईं।

"विशाल मशीन नहीं।"

"दो मनुष्यों का एक-दूसरे पर इतना विश्वास करना..."

"...कि वे कुछ समय के लिए एक ही उद्देश्य बन जाएँ।"

ईशान ने आगे कहा—

"शक्ति हमें युद्ध जीतने में सहायता करती है।"

"लेकिन विश्वास..."

"...सभ्यता को बचाता है।"

वर्षों बाद विशाखापट्टनम में महायंत्र स्मारक बनाया गया।

उसके प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख स्थापित किया गया—

"जब दो मन एक-दूसरे को समझना सीखते हैं,
 तब वे मिलकर ऐसी शक्ति बनाते हैं जिसे कोई अकेला कभी प्राप्त नहीं कर सकता।"

और उसके नीचे—

"सभ्यता की सबसे बड़ी मशीन इस्पात से नहीं बनती।
 वह विश्वास से बनती है।"


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