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Anand Mishra

Action Classics

4  

Anand Mishra

Action Classics

उत्तराधिकारी

उत्तराधिकारी

4 mins
1

मदुरै
वर्ष 2090

मदुरै के पुराने हिस्से में एक नाम आज भी सम्मान से लिया जाता था—

शंकरन अय्यर।

कभी वह शहर के सबसे प्रभावशाली व्यापारिक परिवार का मुखिया था।

उसके पास जमीनें थीं।

कारखाने थे।

परिवहन नेटवर्क था।

और सबसे महत्वपूर्ण—

लोगों का विश्वास था।

लेकिन शंकरन ने अपने जीवन में एक बात कभी स्वीकार नहीं की—

कि शक्ति केवल संपत्ति से नहीं आती।

वह जिम्मेदारी से आती है।

उसका एक पुत्र था—

अर्जुन शंकरन।

अर्जुन विदेश में पला-बढ़ा था।

उच्च शिक्षा।

उच्च तकनीक।

उत्कृष्ट जीवन।

वह अपने पिता की दुनिया से दूर रहना चाहता था।

उसे लगता था कि परिवार का पुराना प्रभाव एक बोझ है।

एक दिन शंकरन ने उसे वापस बुलाया।

"मुझे तुम्हारी आवश्यकता है।"

अर्जुन ने कहा—

"मैं व्यापार संभालने नहीं आ रहा।"

शंकरन मुस्कुराया।

"मैंने व्यापार संभालने के लिए नहीं बुलाया।"

"फिर?"

"यह समझने के लिए कि लोग तुम्हें अपना क्यों मानते हैं।"

अर्जुन ने ध्यान नहीं दिया।

लेकिन उसी सप्ताह शंकरन अचानक बीमार पड़ गया।

चिकित्सकों ने बताया—

समय बहुत कम है।

शंकरन ने अपने पुत्र से केवल एक अनुरोध किया—

"मेरे जाने के बाद इस शहर को मेरे नाम की नहीं..."

"...मेरे काम की आवश्यकता होगी।"

अर्जुन ने वादा कर दिया।

उसे लगा—

यह केवल एक पिता की भावुक बात है।

शंकरन की मृत्यु के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी अर्जुन पर आ गई।

उसे पता चला कि परिवार की अधिकांश संपत्ति कानूनी रूप से उसके नाम हो सकती थी।

लेकिन एक बड़ा हिस्सा अलग था।

उसके पिता ने वर्षों पहले एक सार्वजनिक न्यास बनाया था—

जन-आधार न्यास।

इस न्यास के पास अस्पताल, विद्यालय, जल-प्रणालियाँ और आपदा राहत केंद्र थे।

अर्जुन उसका अध्यक्ष बन गया।

पहले ही महीने समस्या सामने आई।

एक बड़ी निजी कंपनी ने शहर की जल-प्रणाली को अपने नियंत्रण में लेने का प्रस्ताव दिया।

आर्थिक लाभ बहुत बड़ा था।

लेकिन कीमत भी बड़ी थी।

पानी की आपूर्ति उन क्षेत्रों में महँगी हो जाती जहाँ गरीब परिवार रहते थे।

न्यास के कई सदस्य सौदे के पक्ष में थे।

अर्जुन ने मना कर दिया।

उसने कहा—

"पानी व्यापारिक वस्तु हो सकता है।"

"लेकिन किसी शहर के जीवन का आधार केवल लाभ के हिसाब से नहीं बाँटा जा सकता।"

यहीं से उसके विरुद्ध अभियान शुरू हुआ।

परिवार के कुछ सदस्य नाराज़ हो गए।

व्यापारिक साझेदार पीछे हटने लगे।

स्थानीय राजनीतिक समूहों ने उसके खिलाफ अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं।

और सबसे खतरनाक व्यक्ति सामने आया—

देवराज।

शंकरन का पुराना सहयोगी।

वह वर्षों से परिवार के भीतर प्रभाव रखता था।

उसका मानना था कि अर्जुन कमजोर है।

देवराज ने कहा—

"तुम्हारे पिता लोगों के बीच रहते थे।"

"तुमने वह जीवन देखा ही नहीं।"

अर्जुन ने उत्तर दिया—

"इसीलिए मैं सीख रहा हूँ।"

कुछ सप्ताह बाद शहर के तीन जलाशयों में विषैले औद्योगिक पदार्थ मिलने की घटना हुई।

शहर में पानी की आपूर्ति रोकनी पड़ी।

हजारों परिवार प्रभावित हुए।

प्रारंभिक जाँच में आरोप जन-आधार न्यास की एक पुरानी जल-शोधन इकाई पर आया।

अर्जुन स्तब्ध था।

उसके पिता की संस्था पर ही आरोप था।

देवराज ने निजी तौर पर उससे कहा—

"न्यास बेच दो।"

"समस्या खत्म।"

अर्जुन ने पूछा—

"और लोगों का पानी?"

देवराज ने कहा—

"नई कंपनी बेहतर व्यवस्था करेगी।"

अर्जुन को विश्वास नहीं हुआ।

उसने स्वयं जाँच शुरू की।

पुराने सेंसर रिकॉर्ड निकाले गए।

जल-प्रवाह के आँकड़े देखे गए।

परिवहन लॉग की जाँच हुई।

फिर एक पैटर्न सामने आया।

विषैले पदार्थ न्यास की इकाई से नहीं आए थे।

वे उन औद्योगिक पाइपलाइनों से आए थे जिन्हें निजी कंपनी खरीदने वाली थी।

अर्जुन समझ गया।

संकट जानबूझकर पैदा किया गया था।

उद्देश्य था—

न्यास को असफल सिद्ध करना।

फिर उसे कम कीमत पर खरीदना।

लेकिन उसके पास पर्याप्त प्रमाण नहीं था।

उसी रात उसे अपने पिता का पुराना निजी रिकॉर्ड मिला।

शंकरन की एक वीडियो रिकॉर्डिंग थी।

वह वृद्ध दिखाई दे रहे थे।

उन्होंने कैमरे की ओर देखकर कहा—

"यदि तुम यह देख रहे हो, तो शायद तुम मेरे बाद यह जिम्मेदारी संभाल रहे हो।"

"तुम्हें मेरे निर्णयों से सहमत होने की आवश्यकता नहीं।"

"लेकिन एक बात याद रखना।"

कुछ क्षण वे चुप रहे।

"जिस संस्था की रक्षा तुम कर रहे हो, वह मेरी संपत्ति नहीं है।"

"वह उन लोगों की अमानत है जिनके पास अपनी आवाज़ पहुँचाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं।"

रिकॉर्डिंग समाप्त हो गई।

अर्जुन ने अगली सुबह पूरी जाँच सार्वजनिक कर दी।

उसने सभी डेटा स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थानों को दिया।

जल-प्रणाली के सेंसर रिकॉर्ड सार्वजनिक किए।

औद्योगिक पाइपलाइन के स्वामित्व दस्तावेज़ जारी किए।

और स्वयं जाँच के लिए प्रस्तुत हो गया।

कुछ ही दिनों में सच्चाई सामने आ गई।

देवराज और उसके सहयोगियों ने जानबूझकर प्रदूषण कराया था।

उनका उद्देश्य संकट पैदा करके जल-प्रणाली खरीदना था।

उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन अर्जुन ने केवल जीत का उत्सव नहीं मनाया।

उसने जन-आधार न्यास की संरचना बदल दी।

अब उसके परिवार का कोई व्यक्ति अकेले निर्णय नहीं ले सकता था।

न्यास के बोर्ड में—

इंजीनियर।

चिकित्सक।

शिक्षक।

किसान प्रतिनिधि।

जल विशेषज्ञ।

और स्थानीय नागरिक शामिल किए गए।

एक वर्ष बाद मदुरै की नई जल-व्यवस्था पूरी हुई।

उद्घाटन के दिन अर्जुन मंच पर खड़ा था।

एक वृद्ध महिला उसके पास आई।

"तुम्हारे पिता के समय भी यहाँ पानी आता था।"

अर्जुन मुस्कुराया।

"हाँ।"

वृद्धा ने पूछा—

"तो तुमने क्या नया किया?"

अर्जुन ने कुछ क्षण सोचा।

"मैंने यह सुनिश्चित किया कि मेरे बाद भी यह पानी किसी एक परिवार का निर्णय न रहे।"

वृद्धा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

"अब तुम सच में अपने पिता के बेटे हो।"

अर्जुन ने पीछे मुड़कर शहर को देखा।

उसे पहली बार समझ आया कि उत्तराधिकार का अर्थ संपत्ति प्राप्त करना नहीं होता।

उत्तराधिकार का अर्थ है किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा बनाया गया विश्वास इस तरह संभालना कि वह आपके बाद भी जीवित रहे।

और उसी शाम उसने अपने पिता की पुरानी रिकॉर्डिंग फिर देखी।

इस बार उसने वीडियो बंद नहीं किया।

अंत तक देखा।



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