नायक
नायक
भारत
वर्ष 2098
देश का सबसे लोकप्रिय अभिनेता था—
आर्यमान देव।
उसकी एक फिल्म रिलीज़ होती और करोड़ों लोग उसे देखने पहुँचते।
उसके चेहरे पर विज्ञापन।
उसकी आवाज़ पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मनोरंजन प्रणालियाँ।
उसकी जीवनशैली पर लाखों प्रशंसक नज़र रखते।
लेकिन आर्यमान स्वयं अपने जीवन से थक चुका था।
एक सुबह उसे राजधानी में आयोजित एक राष्ट्रीय कला समारोह में पहुँचना था।
सड़क मार्ग से जाना संभव नहीं था।
इसलिए उसने पहली बार अंतर-नगर हाइपररेल चुनी।
यात्रा केवल चार घंटे की थी।
ट्रेन में चढ़ते समय उसने देखा—
एक वृद्ध साहित्यकार पुस्तक पढ़ रहे थे।
एक युवा पत्रकार लगातार नोट्स बना रही थी।
कुछ बच्चे उसे पहचानकर उत्साहित हो गए।
और कुछ यात्रियों ने उसे देखकर तुरंत अपने उपकरण निकाल लिए।
आर्यमान ने अपनी सीट पर बैठकर आँखें बंद कर लीं।
वह सोना चाहता था।
लेकिन पत्रकार ने पूछा—
"क्या मैं आपसे कुछ प्रश्न कर सकती हूँ?"
आर्यमान ने अनिच्छा से कहा—
"यदि बहुत व्यक्तिगत न हों।"
पत्रकार का नाम था—
नंदिता सेन।
"आपको सबसे अधिक किस बात का डर लगता है?"
आर्यमान ने हँसने की कोशिश की।
"फिल्म फ्लॉप होने का।"
नंदिता ने उसकी ओर देखा।
"यह उत्तर आपने कितनी बार दिया है?"
आर्यमान चुप हो गया।
ट्रेन आगे बढ़ती रही।
कुछ घंटों बाद आर्यमान ने स्वयं बातचीत शुरू की।
"आप सच जानना चाहती हैं?"
नंदिता ने सिर हिलाया।
"मुझे डर लगता है कि एक दिन लोग मुझे भूल जाएँगे।"
नंदिता ने पूछा—
"और यदि ऐसा हो गया?"
आर्यमान ने खिड़की से बाहर देखा।
"तो शायद मुझे पहली बार पता चलेगा कि मैं वास्तव में कौन हूँ।"
यात्रा के दौरान वह पहली बार अपने जीवन के उन हिस्सों के बारे में बोलने लगा जिन्हें उसने वर्षों से छिपा रखा था।
पहली स्मृतिएक छोटे शहर का लड़का।
मंच पर अभिनय करने का सपना।
पहला ऑडिशन।
अस्वीकृति।
दूसरा।
फिर अस्वीकृति।
तीसरे वर्ष उसे एक छोटी भूमिका मिली।
उसने पूरी शक्ति से अभिनय किया।
फिल्म सफल हुई।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
लेकिन सफलता के साथ उसका भय बढ़ता गया।
उसे हर नई फिल्म में स्वयं को पिछली फिल्म से बेहतर सिद्ध करना था।
हर पुरस्कार के बाद अगला पुरस्कार चाहिए था।
हर सफलता के बाद असफलता का डर।
दूसरी स्मृतिउसका सबसे अच्छा मित्र समीर।
दोनों ने साथ अभिनय शुरू किया था।
समीर अधिक प्रतिभाशाली था।
लेकिन आर्यमान को पहला बड़ा अवसर मिला।
उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
समीर धीरे-धीरे उद्योग से बाहर हो गया।
आर्यमान की आवाज़ धीमी हो गई।
"मैंने उसे धोखा नहीं दिया था।"
नंदिता ने कहा—
"लेकिन आपने उसे याद भी नहीं रखा।"
यह वाक्य उसके भीतर कहीं गहराई तक उतर गया।
तीसरी स्मृतिएक पुरस्कार समारोह।
हज़ारों लोग।
कैमरे।
तालियाँ।
आर्यमान मंच पर पुरस्कार ले रहा था।
उसी रात उसकी माँ अस्पताल में अकेली थीं।
वह उनसे मिलने नहीं गया।
अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई।
ट्रेन की खिड़की पर बारिश की बूँदें गिरने लगीं।
आर्यमान बहुत देर तक कुछ नहीं बोला।
नंदिता ने रिकॉर्डिंग बंद कर दी।
"अब यह पत्रकारिता नहीं रही।"
आर्यमान ने पूछा—
"फिर?"
"अब यह आपकी कहानी है।"
कुछ देर बाद आर्यमान ने कहा—
"नहीं।"
"यह मेरी कहानी का वह हिस्सा है जिसे मैंने कभी स्वयं से नहीं कहा।"
ट्रेन अपने गंतव्य के निकट पहुँच रही थी।
अचानक ब्रेक लगे।
ट्रेन एक आपातकालीन स्टेशन पर रुक गई।
सभी यात्री घबरा गए।
आर्यमान ने पहली बार अपने आसपास देखा।
एक छोटे बच्चे को साँस लेने में कठिनाई हो रही थी।
उसकी माँ मदद के लिए चिल्ला रही थी।
आर्यमान तुरंत उठ खड़ा हुआ।
उसने ट्रेन के चिकित्सा केंद्र का आपातकालीन दल बुलाया।
बच्चे को चिकित्सा सहायता मिली।
कुछ मिनट बाद स्थिति सामान्य हो गई।
किसी कैमरे ने यह घटना रिकॉर्ड नहीं की।
कोई समाचार नहीं बना।
कोई पुरस्कार नहीं मिला।
आर्यमान वापस अपनी सीट पर आया।
नंदिता ने पूछा—
"आप ठीक हैं?"
आर्यमान ने कहा—
"हाँ।"
फिर कुछ सोचकर बोला—
"आज पहली बार मैंने कुछ ऐसा किया है..."
"...जिसे किसी दर्शक की आवश्यकता नहीं थी।"
ट्रेन गंतव्य पर पहुँची।
हज़ारों प्रशंसक आर्यमान का इंतज़ार कर रहे थे।
कैमरे चमकने लगे।
लोग उसका नाम पुकारने लगे।
वह कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने भीड़ की ओर देखा।
पहली बार उसे उन चेहरों के पीछे मनुष्य दिखाई दिए।
दर्शक नहीं।
समारोह में उसे मंच पर बुलाया गया।
संचालक ने पूछा—
"आपके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?"
आर्यमान ने तैयार उत्तर देने के बजाय कहा—
"मैंने बहुत वर्षों तक सोचा कि अभिनेता का काम लोगों को सपने दिखाना है।"
"अब समझता हूँ..."
"...कभी-कभी अपने बारे में सच देख लेना भी अभिनय से बाहर निकलने का एक तरीका है।"
सभा शांत हो गई।
उस रात उसने अपने प्रबंधक को फोन किया।
"समीर का पता ढूँढ़ो।"
प्रबंधक ने पूछा—
"किसलिए?"
आर्यमान ने उत्तर दिया—
"कुछ बातें बहुत देर से कही जानी बाकी हैं।"
दस वर्ष बादआर्यमान अब भी अभिनय करता था।
लेकिन उसने अपनी फिल्मों का चुनाव बदल दिया था।
छोटी कहानियाँ।
नए कलाकार।
अनजान लेखक।
ऐसे पात्र जिन्हें नायक बनने की आवश्यकता नहीं थी।
उसकी नई फिल्म की पहली स्क्रीनिंग में एक व्यक्ति चुपचाप पीछे बैठा था।
आर्यमान ने उसे पहचान लिया।
समीर।
फिल्म समाप्त हुई।
दर्शक खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे।
समीर अपनी सीट से नहीं उठा।
आर्यमान उसके पास गया।
दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
फिर समीर ने कहा—
"तुम आखिरकार अभिनेता बन गए।"
आर्यमान ने पूछा—
"अब तक क्या था?"
समीर मुस्कुराया।
"एक आदमी..."
"...जो बहुत अच्छा अभिनय करता था।"
दोनों हँस पड़े।
बाहर थिएटर की रोशनी जल चुकी थी।
आर्यमान ने पहली बार महसूस किया—
तालियाँ समाप्त हो जाती हैं।
छवि बदल जाती है।
प्रसिद्धि भी एक दिन पीछे छूट जाती है।
लेकिन किसी मनुष्य के जीवन में सचमुच उपस्थित होना...
शायद वही भूमिका है जिसे निभाने के बाद पर्दा गिरता नहीं।
