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Anand Mishra

Action

5  

Anand Mishra

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संदेशवाहक

संदेशवाहक

3 mins
2

अरुणाचल प्रदेश
वर्ष 2044

भारत-तिब्बत सीमा के निकट एक छोटे-से पर्वतीय गाँव में सत्रह वर्षीय ईशान अपने पिता के पुराने गैराज में काम करता था।

उसे पुरानी मशीनों से विशेष लगाव था।

लोग कबाड़ समझकर जो वाहन छोड़ देते, ईशान उन्हें फिर से चलने लायक बना देता।

वह कहा करता था—

"हर मशीन की अपनी एक कहानी होती है।"

एक रात पहाड़ों में भीषण उल्कावृष्टि हुई।

लोगों ने आकाश में जलती हुई एक नीली रेखा देखी।

अगली सुबह ईशान को जंगल में एक अजीब-सी धातु की संरचना मिली।

पहली नज़र में वह किसी दुर्घटनाग्रस्त छोटे वाहन जैसी लग रही थी।

उसका कोई पहिया नहीं था।

कोई इंजन नहीं था।

लेकिन वह पूरी तरह नष्ट भी नहीं हुई थी।

ईशान उसे अपने गैराज में ले आया।

उसने कई दिन तक उसकी मरम्मत करने की कोशिश की।

लेकिन कोई भी उपकरण उस धातु को काट नहीं पाया।

सातवीं रात...

गैराज में अचानक हल्की-सी गूँज सुनाई दी।

धातु की संरचना धीरे-धीरे बदलने लगी।

उसके हिस्से घूमने लगे।

कुछ ऊपर उठे।

कुछ भीतर समा गए।

कुछ ही क्षणों में ईशान के सामने लगभग सात फुट ऊँचा एक यांत्रिक प्राणी खड़ा था।

ईशान भयभीत होकर पीछे हट गया।

उस यंत्र ने कुछ कहना चाहा।

लेकिन उसके ध्वनि तंत्र क्षतिग्रस्त थे।

शब्द नहीं निकल पाए।

सिर्फ़ टूटे हुए रेडियो संकेत सुनाई दिए।

कुछ देर बाद उसने गैराज में रखे पुराने ट्रांजिस्टर को छुआ।

उससे पुराने गीत, समाचार और आवाज़ों के छोटे-छोटे टुकड़े सुनाई देने लगे।

यही उसका संवाद का माध्यम बन गया।

ईशान ने उसका नाम रखा—

"संदेश"।

कुछ दिनों में दोनों के बीच एक अनोखी मित्रता हो गई।

संदेश बोल नहीं सकता था।

लेकिन वह संकेतों, संगीत और ध्वनियों से अपनी बात समझा देता था।

इसी बीच देशभर में अजीब घटनाएँ होने लगीं।

संचार उपग्रहों में व्यवधान।

स्वचालित प्रणालियों में त्रुटियाँ।

कुछ वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि पृथ्वी की ओर कोई अज्ञात अंतरिक्ष यान बढ़ रहा है।

एक रात संदेश ने आकाश की ओर देखा।

फिर उसने ज़मीन पर एक चित्र बनाया।

उसमें तीन वृत्त थे।

पहला—पृथ्वी।

दूसरा—उसका ग्रह।

तीसरा—एक काला चिह्न।

ईशान समझ गया।

कोई उनका पीछा कर रहा था।

कुछ दिनों बाद पहाड़ों में तीन विशाल यांत्रिक प्राणी उतरे।

वे संदेश को पकड़ने आए थे।

लेकिन वे उसे नष्ट नहीं करना चाहते थे।

वे उसके भीतर सुरक्षित एक ऊर्जा-मानचित्र चाहते थे।

उस मानचित्र में अनेक जीवन-योग्य ग्रहों की स्थिति दर्ज थी।

यदि वह गलत हाथों में चला जाता, तो अनेक शांत सभ्यताएँ खतरे में पड़ जातीं।

सेना क्षेत्र में पहुँच गई।

वैज्ञानिक भी आ गए।

सभी युद्ध की तैयारी करने लगे।

लेकिन ईशान ने संदेश के व्यवहार को ध्यान से देखा।

वह लगातार एक ही संकेत दे रहा था—

युद्ध मत करो।

ईशान ने वैज्ञानिकों से कहा—

"यदि वह लड़ना चाहता, तो पहले ही लड़ चुका होता।"

"वह किसी और कारण से पृथ्वी आया है।"

कई प्रयासों के बाद संदेश ने टूटे हुए रेडियो संकेतों से एक वाक्य बनाया—

"पृथ्वी... सुरक्षित... क्योंकि... विश्वास..."

अब सब समझ में आया।

उसने पृथ्वी को इसलिए चुना था क्योंकि उसे विश्वास था कि मनुष्य उस ज्ञान का दुरुपयोग नहीं करेंगे।

अंतिम सामना हिमालय की एक ऊँची घाटी में हुआ।

संदेश ने अपने भीतर का ऊर्जा-मानचित्र सक्रिय किया।

लेकिन उसे किसी को सौंपने के बजाय...

उसने उसे हजारों भागों में विभाजित कर दिया।

हर भाग अलग-अलग अंतरिक्ष संकेतों में बदल गया।

अब कोई भी एक शक्ति उस पूरे मानचित्र पर अधिकार नहीं कर सकती थी।

पीछा करने वाले यांत्रिक प्राणियों ने देखा—

जिस वस्तु के लिए वे आए थे...

वह अब किसी एक के नियंत्रण में रही ही नहीं।

उन्होंने पृथ्वी छोड़ दी।

विदा होने से पहले संदेश ने ईशान को एक छोटी-सी धातु की पट्टिका दी।

उस पर केवल एक प्रतीक अंकित था—

दो जुड़े हुए हाथ।

वर्षों बाद ईशान भारत का अग्रणी रोबोटिक्स अभियंता बना।

उसने ऐसे यंत्र विकसित किए जो युद्ध के लिए नहीं...

आपदा राहत, पर्वतीय बचाव और पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए।

उसके संस्थान के प्रवेश द्वार पर एक वाक्य लिखा था—

"सबसे बड़ी मशीन वह नहीं जो सबसे अधिक शक्ति रखती है।"

"सबसे बड़ी मशीन वह है जो अपने निर्माता के सर्वोत्तम गुणों को आगे बढ़ाती है।"

और उसके नीचे—

"जब कोई अजनबी तुम्हारे पास सहायता माँगने आए,
 तो पहले यह मत पूछो कि वह कहाँ से आया है।
 पहले यह पूछो कि उसे तुम्हारे विश्वास की आवश्यकता क्यों पड़ी।"



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