अपना घर
अपना घर
इंदौर
वर्ष 2030
शहर के एक पुराने मोहल्ले में रहने वाला निखिल एक मध्यम आकार की विनिर्माण कंपनी में कनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी था।
वह समय का पाबंद था।
हर कर्मचारी का सम्मान करता था।
कार्यालय के चौकीदार से लेकर निदेशक तक, सब उससे सहज होकर बात करते थे।
लेकिन घर लौटते ही उसका संसार बदल जाता।
उसके पिता मोहनलाल अक्सर कहते—
"तुम्हें जितना मिला है, उससे ज़्यादा के सपने मत देखा करो।"
निखिल कभी उत्तर नहीं देता।
उसी शहर में देश के प्रसिद्ध उद्योगपति ध्रुव प्रताप सिंह का विशाल औद्योगिक समूह था।
हजारों कर्मचारी।
कई कारखाने।
कई शिक्षण संस्थान।
लेकिन परिवार के भीतर मतभेद बढ़ते जा रहे थे।
उत्तराधिकार की चर्चा ने रिश्तों में दूरी ला दी थी।
एक दिन निखिल की कंपनी का अधिग्रहण ध्रुव प्रताप समूह ने कर लिया।
निखिल को मुख्यालय में काम करने भेजा गया।
वहाँ पहुँचकर उसने पाया कि समस्या मशीनों में नहीं, लोगों में थी।
विभाग एक-दूसरे से बात नहीं करते थे।
निर्णय ऊपर अटक जाते थे।
प्रतिभाशाली लोग निराश थे।
निखिल ने कोई बड़ा पद नहीं माँगा।
उसने छोटी-छोटी बातें बदलनी शुरू कीं।
साप्ताहिक समन्वय बैठक।
सुझाव पेटी।
श्रमिकों के साथ खुला संवाद।
हर सफल परियोजना का सामूहिक सम्मान।
कुछ महीनों में उत्पादन बढ़ गया।
दुर्घटनाएँ कम हुईं।
कर्मचारियों का विश्वास लौटने लगा।
ध्रुव प्रताप ने पहली बार उस युवक पर ध्यान दिया।
उन्होंने पूछा—
"तुम्हें यह सब किसने सिखाया?"
निखिल मुस्कुराया।
"घर में सम्मान नहीं मिला..."
"...इसलिए सीखा कि दूसरों को सम्मान कैसे दिया जाता है।"
ध्रुव प्रताप कुछ क्षण चुप रहे।
उसी दौरान परिवार के एक बुज़ुर्ग ने एक पुरानी डायरी सामने रखी।
वर्षों पहले अस्पताल में हुई एक प्रशासनिक भूल का रिकॉर्ड उसमें सुरक्षित था।
जाँच शुरू हुई।
पुराने अभिलेख मँगाए गए।
डीएनए परीक्षण हुआ।
सत्य सामने आया।
तीस वर्ष पहले अस्पताल में दो नवजात शिशुओं की पहचान बदल गई थी।
निखिल...
ध्रुव प्रताप का जैविक पुत्र था।
और ध्रुव प्रताप का पुत्र समझकर पला आर्यन वास्तव में मोहनलाल का जैविक बेटा था।
पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।
मीडिया को खबर लगने लगी।
वकीलों ने सलाह देना शुरू किया।
लेकिन सबसे कठिन प्रश्न अभी बाकी था।
अब कौन किसका बेटा है?
ध्रुव प्रताप ने निखिल से कहा—
"घर लौट आओ।"
मोहनलाल मौन थे।
उन्हें लगा, वे अपना बेटा खो देंगे।
निखिल ने दोनों की ओर देखा।
फिर शांत स्वर में बोला—
"रक्त संबंध सत्य हैं।"
"लेकिन पालन-पोषण भी सत्य है।"
"मैं अपने जन्मदाता का सम्मान करूँगा।"
"और जिसने मुझे चलना सिखाया..."
"...उसे पिता कहना कभी नहीं छोड़ूँगा।"
कुछ लोग निराश हुए।
उन्हें लगा कि अब संपत्ति का विवाद होगा।
लेकिन निखिल ने एक और निर्णय लिया।
उसने कहा—
"यदि मैं इस उद्योग समूह में कोई स्थान लूँगा..."
"...तो उत्तराधिकारी बनकर नहीं।"
"...योग्यता सिद्ध करके।"
ध्रुव प्रताप मुस्कुराए।
"आज पहली बार मुझे लगा..."
"...कि तुम सचमुच इस परिवार के योग्य हो।"
कुछ वर्षों बाद ध्रुव प्रताप सेवानिवृत्त हुए।
समूह का नेतृत्व निखिल को सौंपा गया।
क्योंकि वह उनका पुत्र था?
नहीं।
क्योंकि निदेशक मंडल ने सर्वसम्मति से माना कि वही सबसे योग्य था।
आर्यन भी उसी समूह में सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग का प्रमुख बना।
दोनों भाइयों ने मिलकर कंपनी को नई दिशा दी।
एक दिन एक पत्रकार ने निखिल से पूछा—
"आपकी सबसे बड़ी पहचान क्या है?"
निखिल ने उत्तर दिया—
"न वह घर जहाँ मेरा जन्म हुआ..."
"...न वह घर जहाँ मैं पला।"
"मेरी सबसे बड़ी पहचान यह है..."
"...कि दोनों परिवारों ने मुझे अच्छा मनुष्य बनना सिखाया।"
वर्षों बाद समूह के मुख्यालय के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख लगाया गया।
उस पर लिखा था—
"वंश तुम्हें एक नाम देता है।"
"संस्कार तुम्हें एक पहचान देते हैं।"
"और चरित्र तय करता है कि लोग तुम्हें किस सम्मान से याद करेंगे।"
