दीपों की रात
दीपों की रात
उदयपुर
वर्ष 2032
दीपावली की रात थी।
पूरा शहर दीपों की रोशनी से जगमगा रहा था।
शहर से दूर एक प्राचीन हवेली में तीन पीढ़ियाँ एकत्र हुई थीं।
यह वर्षों बाद ऐसा अवसर था जब पूरा परिवार साथ था।
बुज़ुर्ग उद्योगपति जगदीशसिंह राठौड़ ने घोषणा की थी कि इस बार दीपावली पर वे परिवार के साथ-साथ अपने कर्मचारियों के परिवारों को भी सम्मानित करेंगे।
हवेली में सौ से अधिक लोग उपस्थित थे।
बच्चे।
बुज़ुर्ग।
कर्मचारी।
सुरक्षा कर्मी।
सब उत्सव में व्यस्त थे।
उसी समय पाँच काली गाड़ियाँ हवेली के बाहर आकर रुकीं।
कुछ ही मिनटों में संचार प्रणाली बंद कर दी गई।
मुख्य द्वार पर कब्ज़ा कर लिया गया।
हथियारबंद लोगों ने पूरे भवन को घेर लिया।
उनका उद्देश्य था—
तिजोरी।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि हवेली में केवल धन नहीं...
सैकड़ों निर्दोष लोग भी थे।
उसी शाम एक और व्यक्ति हवेली पहुँचा था।
उसका नाम था—
भैरव दत्त।
सफेद दाढ़ी।
साधारण धोती-कुर्ता।
कंधे पर एक छोटा-सा झोला।
उसे सबने मंदिर का वृद्ध सेवक समझा।
वह हर वर्ष लक्ष्मी-पूजन की तैयारी कराने आता था।
डकैतों ने सभी लोगों को मुख्य सभा-भवन में बंद कर दिया।
उन्होंने घोषणा की—
"जो सहयोग करेगा, सुरक्षित रहेगा।"
इसी बीच दस वर्ष की आर्या किसी तरह पीछे के मंदिर तक पहुँच गई।
वहीं उसकी मुलाकात भैरव दत्त से हुई।
आर्या ने काँपते हुए कहा—
"दादाजी... सबको बचाइए।"
भैरव ने शांत स्वर में पूछा—
"डर लग रहा है?"
आर्या ने सिर हिलाया।
उन्होंने दीपक में तेल डाला।
बाती सीधी की।
फिर बोले—
"पहला दीप हमेशा अँधेरे से नहीं लड़ता..."
"...वह केवल जलना शुरू करता है।"
इसके बाद जो हुआ, उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
भैरव हवेली के हर गुप्त मार्ग को जानते थे।
पुरानी दीवारें।
तहखाने।
घंटी की रस्सियाँ।
वर्षा जल की सुरंगें।
उन्होंने हथियारों से नहीं...
हवेली से लड़ाई लड़ी।
कहीं उन्होंने बिजली बंद कर दी।
कहीं धुएँ का मार्ग खोल दिया।
कहीं भारी लकड़ी का द्वार गिरा दिया।
कहीं घंटाघर की रस्सी से हथियार छीन लिया।
एक-एक करके डकैत भ्रमित होने लगे।
उन्हें लगा—
हवेली में दर्जनों लोग उनका सामना कर रहे हैं।
जबकि हर बार सामने वही एक वृद्ध व्यक्ति होता।
सरगना राघव कश्यप क्रोधित हो उठा।
"यह बूढ़ा है कौन?"
हवेली के सबसे पुराने प्रबंधक ने धीरे से कहा—
"बीस वर्ष पहले जब इस क्षेत्र में भीषण बाढ़ आई थी..."
"...तो इसी आदमी ने सैकड़ों लोगों को बचाया था।"
"उसके बाद उसने कभी कोई सम्मान स्वीकार नहीं किया।"
"वह कहता था—"
'त्योहार केवल दीप जलाने का दिन नहीं।
किसी का जीवन बचाने का अवसर भी है।'
अंतिम टकराव हवेली के प्राचीन मंदिर में हुआ।
राघव ने आर्या को बंधक बना लिया।
भैरव ने हथियार नीचे रख दिया।
राघव हँसा।
"अब क्या करोगे?"
भैरव मुस्कुराए।
"अब तुम्हें एक बात समझाऊँगा।"
"धन की रक्षा करने वाला पहरेदार होता है।"
"पर जीवन की रक्षा करने वाला..."
"...धर्म निभाता है।"
उसी क्षण आर्या ने मंदिर की बड़ी घंटी खींच दी।
तेज़ ध्वनि से राघव का ध्यान भटका।
भैरव ने उसे निःशस्त्र कर दिया।
उधर पीछे से सुरक्षा दल भी पहुँच गया।
पूरा गिरोह गिरफ्तार हो गया।
अगली सुबह दीपावली का सूर्योदय था।
सब लोग भैरव को खोज रहे थे।
लेकिन मंदिर खाली था।
दीप जल रहा था।
और उसके पास एक छोटा-सा कागज़ रखा था।
उस पर लिखा था—
"दीपावली की सबसे बड़ी पूजा दीप जलाना नहीं है।"
"किसी भयभीत मन में आशा का प्रकाश जला देना ही सच्चा उत्सव है।"
कई वर्षों बाद हवेली का एक भाग आपदा राहत प्रशिक्षण केंद्र में बदल दिया गया।
उसके प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख लगाया गया—
"साहस का अर्थ क्रोध नहीं।
साहस का अर्थ है—जब सब भयभीत हों, तब किसी एक का शांत रहना।"
और सबसे नीचे छोटे अक्षरों में—
"अँधेरा कभी दीप से नहीं जीतता।
वह केवल तब जीतता है जब कोई दीप जलाना छोड़ दे।"
