प्रथम वन
प्रथम वन
अंडमान सागर
वर्ष 2086
भारत का गहरे समुद्र का अनुसंधान यान "समुद्र-7" हिंद महासागर की सबसे गहरी समुद्री खाई का अध्ययन कर रहा था।
अचानक समुद्र के भीतर एक विशाल भूगर्भीय विस्फोट हुआ।
पूरी पनडुब्बी नियंत्रण खो बैठी।
कुछ ही क्षणों में वह एक अज्ञात भूमिगत जलगुफा में जा गिरी।
कमांडर ईशान रावत जब होश में आए, तो चारों ओर सन्नाटा था।
दल के अधिकांश सदस्य मारे जा चुके थे।
संचार प्रणाली नष्ट हो चुकी थी।
बाहर निकले तो उनके सामने एक ऐसी दुनिया थी जिसे किसी मानचित्र में नहीं दिखाया गया था।
विशाल वृक्ष।
तीस-चालीस मीटर ऊँचे फर्न।
चमकते हुए कवक।
अद्भुत जीव।
कुछ पक्षियों जैसे।
कुछ सरीसृपों जैसे।
कुछ बिल्कुल अपरिचित।
भूगर्भीय अध्ययन से स्पष्ट हुआ—
यह पृथ्वी का एक प्राचीन, पूर्णतः अलग-थलग पड़ा पारिस्थितिक क्षेत्र था, जो करोड़ों वर्षों से बाहरी दुनिया से कटा हुआ था।
जीवित बचे लोगों में केवल एक और व्यक्ति मिली—
बारह वर्ष की लड़की।
तारा।
वह समुद्री जीवविज्ञानी की बेटी थी।
उसके माता-पिता दुर्घटना में नहीं बचे।
तारा चुप थी।
लगभग बोलती नहीं थी।
लेकिन वह प्रकृति को असाधारण ध्यान से देखती थी।
ईशान ने कहा—
"हमें बाहर निकलना होगा।"
तारा ने पहली बार उत्तर दिया—
"पहले इस जंगल को समझना होगा।"
अगले कुछ दिन जीवित रहने की परीक्षा बन गए।
रात में विशाल शिकारी जीव निकलते।
दिन में जहरीले बीज हवा में उड़ते।
कुछ पौधे स्पर्श करते ही त्वचा जला देते।
कुछ बेलें चलती हुई प्रतीत होतीं।
ईशान हर समस्या का समाधान उपकरणों से खोजते।
तारा प्रकृति को देखकर।
एक दिन उन्हें एक विशाल पदचिह्न मिला।
लगभग पाँच मीटर लंबा।
ईशान ने हथियार तैयार किया।
तारा ने मिट्टी उठाकर देखी।
"यह ताज़ा नहीं है।"
"जीव यहाँ से कई घंटे पहले जा चुका है।"
ईशान मुस्कुरा दिए।
"तुम्हें कैसे पता?"
"चींटियाँ।"
"यदि वह अभी गया होता..."
"...तो ये यहाँ नहीं होतीं।"
धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे से सीखने लगे।
कई दिनों बाद उन्हें पनडुब्बी का आपातकालीन ऊर्जा-कोर मिल गया।
उससे एक बचाव संकेत भेजा जा सकता था।
लेकिन समस्या थी—
ऊर्जा-कोर उस घाटी के बीच था जहाँ सबसे विशाल शिकारी जीव अपना क्षेत्र बनाए हुए था।
ईशान ने योजना बनाई।
सीधे जाकर कोर निकालेंगे।
तारा ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"हम उसके घर में जा रहे हैं।"
"वह हमारा शत्रु नहीं है।"
"वह केवल अपने क्षेत्र की रक्षा करेगा।"
उन्होंने जीव का कई घंटे तक व्यवहार देखा।
उसे हर शाम वर्षा के समय ऊँची चट्टानों की ओर जाते पाया।
यही अवसर था।
दोनों बिना संघर्ष के ऊर्जा-कोर तक पहुँचे।
सिग्नल सक्रिय कर दिया।
लेकिन लौटते समय भूकंप शुरू हो गया।
जिस भूमिगत संसार ने करोड़ों वर्ष तक स्वयं को सुरक्षित रखा था...
वह ढहने लगा।
बाहर निकलने का केवल एक मार्ग बचा था।
एक संकरी जलसुरंग।
धारा अत्यंत तीव्र थी।
ईशान ने तारा से कहा—
"यदि मैं पीछे रह जाऊँ..."
तारा ने बीच में ही रोक दिया।
"आपने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।"
"अब मैं भी आपको नहीं छोड़ूँगी।"
दोनों जलधारा में कूद पड़े।
कई घंटे बाद भारतीय नौसेना के बचाव दल ने उन्हें समुद्र की सतह पर पाया।
जब वैज्ञानिकों ने पूछा—
"क्या वहाँ सचमुच कोई खोई हुई दुनिया थी?"
ईशान ने उत्तर दिया—
"हाँ।"
"क्या हम वहाँ फिर जाएँ?"
उन्होंने कुछ क्षण सोचा।
"अध्ययन करने के लिए..."
"...हाँ।"
"शोषण करने के लिए..."
"...कभी नहीं।"
कुछ महीनों बाद सरकार ने उस पूरे क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय संरक्षित जैविक धरोहर क्षेत्र घोषित कर दिया।
उसका सटीक स्थान गोपनीय रखा गया।
तारा, जो अब पर्यावरण वैज्ञानिक बन चुकी थी, उद्घाटन समारोह में बोली—
"हर अज्ञात स्थान संसाधन नहीं होता।"
"कुछ स्थान केवल इसलिए बचाए जाते हैं कि भविष्य भी जान सके कि पृथ्वी कभी कितनी अद्भुत थी।"
प्रवेश केंद्र के बाहर एक शिलालेख स्थापित किया गया।
उस पर लिखा था—
"खोज का सर्वोच्च उद्देश्य अधिकार नहीं, समझ है।
और समझ का सर्वोच्च रूप संरक्षण है।"
